कड़ाके की ठंड ने दिहाड़ी मजदूरों को नहीं मिल रहा काम

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मजदूरों की जिंदगी को बनाया संघर्षपूर्ण, काम व राहत दोनों का संकट
दाउदनगर. कड़ाके की ठंड ने दिहाड़ी मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी को और अधिक संघर्षपूर्ण बना दिया है. ठंड के मौसम में तापमान लगातार गिर रहा है़ मजदूरों के लिए काम के अवसर भी सिमटते जा रहे हैं. हालांकि, शनिवार को धूप निकलने से कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन हालात ऐसे हैं कि सुबह-सुबह काम की तलाश में निकलने वाले मजदूर घंटों इंतजार करने के बाद भी कई बार बिना काम मिले ही मायूस होकर घर लौटने को मजबूर हो जाते हैं. ठंड के कारण मजदूरों के हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं और शरीर साथ नहीं देता, लेकिन पेट की आग बुझाने की मजबूरी उन्हें रोज घर से बाहर निकलने पर विवश करती है. अगर किसी दिन काम मिल गया तो परिवार का दिन किसी तरह कट जाता है, लेकिन काम नहीं मिला तो घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना भारी पड़ जाता है. कई परिवार ऐसे हैं, जो सिर्फ उम्मीद के सहारे दिन गुजार रहे हैं. मजदूरों का कहना है कि ठंड के मौसम में काम के अवसर पहले से ही कम हो जाते हैं. गांवों में खेती-बाड़ी का काम भी सीमित हो जाता है, जिससे दिहाड़ी मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. मनरेगा के स्थान पर अब मजदूर बीवी जी राम जी योजना पर निर्भर हैं, लेकिन गांवों में इस समय इस योजना के तहत भी काम की स्थिति बेहद खराब है. दिहाड़ी मजदूर इंद्रदेव सिंह बताते हैं कि ठंड के कारण काम लगभग ठप हो गया है. मजदूरी नहीं मिल पा रही है. ऐसे में घर का खर्च चलाना बेहद मुश्किल हो गया है. अनिलेष कुमार का कहना है कि कार्ड बनने के बाद भी उन्हें काम नहीं मिल रहा है. मजबूरी में उधार लेकर बच्चों का पेट भरना पड़ता है और स्कूल की फीस को लेकर लगातार दबाव बना रहता है. हरिद्वार पांडेय बताते हैं कि ठंड के मौसम में शरीर साथ नहीं देता, फिर भी परिवार की जिम्मेदारियों के चलते काम की तलाश में निकलना पड़ता है. बिंदेश्वरी प्रसाद का कहना है कि बीवी जी राम जी योजना में काम करने के बाद भी समय पर मजदूरी नहीं मिलती, जिससे घर का आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है और उधारी बढ़ती जा रही है. कुछ मजदूरों ने व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े किये हैं. जितेंद्र कुमार और जयराम साव सहित अन्य मजदूरों का कहना है कि ठंड के साथ-साथ बीमारी का खतरा भी उनकी चिंता बढ़ा रहा है. दिहाड़ी मजदूर ललन राम बताते हैं कि ठंड के दिनों में सर्दी, खांसी और बुखार जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन इलाज कराना भी अब खर्चीला हो गया है. कई बार बीमारी के बावजूद मजदूर काम की तलाश में निकलने को मजबूर होते हैं. हनुमान साव का कहना है कि रोज काम नहीं मिलता और न ही किसी तरह की काम की गारंटी है, फिर भी मजदूर उम्मीद लगाये बैठे हैं. उनका कहना है कि इस समय ठंड से बचाव के लिए अलाव और रोजगार दोनों की सबसे ज्यादा जरूरत है.
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