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बिना अनुमति कॉम्बाइन हार्वेस्टर चलाना होगा महंगा

Updated at : 27 Nov 2025 4:04 PM (IST)
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बिना अनुमति कॉम्बाइन हार्वेस्टर चलाना होगा महंगा

पराली जलाने पर किसानों को योजनाओं से वंचित किया जायेगा : डीएओ, कृषि को-ऑर्डिनेटर सलाहकार व हार्वेस्टर संचालको के विरुद्ध होगी सख्ती से कार्रवाई

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औरंगाबाद/कुटुंबा. खेतों में कॉम्बाइन हार्वेस्टर चलाने के लिए संचालकों को कृषि विभाग से परमिशन लेना होगा. बगैर अनुमति के वे फसल की हार्वेस्टिंग नहीं कर सकते हैं. इसके लिए जिला प्रशासन पूरी तरह सख्त है. यह बातें डीएओ संदीप राज ने कहीं. वे इ-किसान भवन अंबा में कर्मियों को निर्देशित कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने रबी बीज वितरण और डीसीएस कार्यों की भी समीक्षा की. उन्होंने कहा कि बीज वितरण में पूरी पारदर्शिता बरती जानी चाहिए. डीएओ ने बताया कि जिस किसान के खेत में हार्वेस्टर चलेगा, उससे भी संचालकों को सहमति लेनी होगी कि किसी भी स्थिति में पराली नहीं जलायेंगे. इसके बावजूद भी अगर किसान पराली जलाते हैं तो उन्हें भविष्य में कृषि से संबंधित कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जायेगा. पराली जलाकर वातावरण को प्रदूषित करना उचित नहीं है. इस बार पटना से सैटेलाइट के माध्यम से निरीक्षण किया जाना है. उन्होंने कर्मियों को निर्देश दिया कि अगर किसान पराली जलाते हैं, तो उस क्षेत्र के किसान सलाहकार व कृषि कोऑर्डिनेटर के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई करने के लिए विभाग को लिखा जायेगा. हार्वेस्टर संचालक पर भी कार्रवाई होगी और उन्हें एमवीआइ का सामना करना पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि खेतों में पराली जलाने से होने वाले नुकसान की जानकारी खेतिहर किसानों को होना आवश्यक है. हार्वेस्टर से कटाई के बाद पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति घटती है व पर्यावरण को भारी नुकसान होता है. पराली जलाने से वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं. किसान इसका वैज्ञानिक प्रबंधन करें, तो पराली से खाद बनाकर मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है.

किसानों में जागरूकता फैलाने की जरूरत

धान की कटाई के लिए मजदूर न मिलना और रबी की बुआई में देर न हो, यह किसानों द्वारा पराली जलाने के प्रमुख कारण हैं. लेकिन इससे मिट्टी की जैविक संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और वायु प्रदूषण बढ़ रहा है. किसानों की यह गलत सोच है कि पराली जलाने से खरपतवार और दीमक जैसे हानिकारक कीट स्वतः समाप्त हो जायेंगे. कटाई के बाद फसल अवशेष जलाने से मृदा स्वास्थ्य खराब होता है. इसलिए किसानों के बीच जागरूकता फैलाना अत्यंत आवश्यक है. किसी भी परिस्थिति में फसल अवशेषों को नहीं जलाना चाहिए. पर्यावरण प्रदूषण से जलवायु परिवर्तन में अनिश्चितता बढ़ रही है. बेमौसम बारिश और तूफान का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है. उत्पादन में ह्रास हो रहा है और पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराना भी कठिन हो जाता है. हार्वेस्टिंग के बाद खेतों से अवशेष हटाना किसानों के लिए बड़ी चुनौती है. स्थानीय किसानों संजय कुमार सिंह एवं मंटू सिंह ने बताया कि मनरेगा किसान के लिए अभिशाप साबित हो रहा है. पराली जलाना किसानों को आसान और सस्ता तरीका लगता है और रबी की बुआई प्रभावित न हो इसलिए जल्दीबाजी में पराली जला देते हैं. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाना पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक है. इंसान प्रकृति के साथ जितना खिलवाड़ करेगा, उसका परिणाम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसानों को भुगतना पड़ेगा. मौके पर बीएओ दीपक, कोऑर्डिनेटर परशुराम पासवान, योगेंद्र कुमार, संजीव कुमार, सलाहकार रमेश शर्मा, चितरंजन कुमार, रंजीत, मुरारी राम और आकाश कुमार आदि उपस्थित थे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SUJIT KUMAR

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SUJIT KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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