दाउदनगर में नहर किनारे झोपड़ियों में रहने को मजबूर महादलित परिवार, दो माह में डूबने से दो की मौत
झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं महादलित परिवार
दाउदनगर में नहर किनारे झोपड़ी में रह रहे महादलित परिवारों की स्थिति दयनीय है. दो महीने में दो लोगों की डूबने से मौत के बाद अब पुनर्वास की मांग तेज हो गई है.
Aurangabad News : औरंगाबाद. दाउदनगर शहर के मौलाबाग नहर पुल के समीप पटना मेन कैनाल के चार्ट पर दर्जनों महादलित परिवार लंबे समय से झोपड़ी बनाकर असुरक्षित हालात में रहने को मजबूर हैं. नहर के किनारे बसे इन परिवारों के सामने एक तरफ सुरक्षित आवास और जमीन का संकट है, तो दूसरी ओर रोजमर्रा की जरूरतों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव बना हुआ है. पिछले करीब डेढ़ से दो महीने के दौरान नहर में डूबने से दो लोगों की मौत ने यहां रहने वाले परिवारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं.
करीब डेढ़ से दो महीने पहले नहर में नहाने के दौरान आठ वर्षीय बच्ची छोटी कुमारी की डूबने से मौत हो गयी थी. इसके बाद पिछले गुरुवार की रात 22 वर्षीय धीरज कुमार शौच के दौरान नहर में फिसलकर गिर गये और तेज पानी में डूब गये. काफी तलाश के बाद शुक्रवार की शाम अरवल जिले के मेहंदिया थाना क्षेत्र में उनका शव बरामद किया गया. लगातार दो हादसों के बाद नहर के चार्ट पर रहने वाले परिवारों के सुरक्षित पुनर्वास की मांग फिर तेज हो गयी है.
दूसरे जिलों से आकर नहर किनारे बसे हैं परिवार
स्थानीय लोगों के अनुसार, मौलाबाग नहर पुल के पास झोपड़ी बनाकर रहने वाले अधिकांश महादलित परिवार जहानाबाद, डेहरी और गया जिले से आकर यहां बसे हैं. वर्षों से रहने के बावजूद इन परिवारों के पास अपना सुरक्षित आवास और स्थायी जमीन नहीं है.
इन परिवारों में कई लोग नगर पर्षद की सफाई व्यवस्था में भी योगदान देते हैं. सफाई एजेंसी के माध्यम से ये लोग शहर की साफ-सफाई से जुड़े काम करते हैं. इसके बावजूद इनके रहने के लिए सुरक्षित जमीन और स्थायी आवास की व्यवस्था नहीं हो सकी है.
नहर के किनारे झोपड़ियों में रहने के कारण इन परिवारों के बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर हर समय खतरा बना रहता है. बारिश के मौसम में नहर में पानी बढ़ने के साथ यह खतरा और बढ़ जाता है.
दो मौतों के बाद पुनर्वास की मांग तेज
नहर में डूबने से छोटी कुमारी और धीरज कुमार की मौत के बाद भाकपा माले ने इन परिवारों के स्थायी पुनर्वास की मांग उठायी है. माले के टाउन सचिव सह निर्माण मजदूर यूनियन के जिलाध्यक्ष बिरजू चौधरी ने प्रेस बयान जारी कर प्रशासन और नगर पर्षद से इस दिशा में ठोस पहल करने की मांग की है.
उन्होंने धीरज कुमार के आश्रितों को आपदा राहत कोष से सहायता देने के साथ नगर पर्षद की ओर से 10 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की है. बिरजू चौधरी का कहना है कि आजादी के 80 वर्ष बाद भी दलित, महादलित और गरीब भूमिहीन परिवारों को रहने के लिए पांच डिसमिल तो दूर, एक डिसमिल जमीन तक उपलब्ध नहीं हो सकी है.
उनके अनुसार, जमीन के अभाव में गरीब परिवार सड़क और नहर के चार्ट पर झोपड़ी बनाकर रहने को मजबूर हैं. ऐसी स्थिति में हादसों का खतरा लगातार बना रहता है.
नहर का पानी ही रोजमर्रा के काम का सहारा
नहर किनारे बसे इन परिवारों के सामने केवल आवास का संकट नहीं है, बल्कि मूलभूत सुविधाओं की भी भारी कमी है. बताया जाता है कि पूरे इलाके में महज एक चापाकल है. इतने परिवारों के लिए एक ही चापाकल होने के कारण पानी की समस्या बनी रहती है.
कपड़े धोने से लेकर रोजमर्रा के कई कामों के लिए लोग नहर के पानी पर निर्भर हैं. पर्याप्त पेयजल और शौचालय की सुविधा नहीं होने से लोगों की परेशानी और बढ़ जाती है. शौच के लिए बाहर जाने की मजबूरी भी कई बार हादसे का कारण बन रही है, जैसा कि धीरज कुमार के मामले में सामने आया.
सड़क किनारे भी बनी रहती है दुर्घटना की आशंका
नहर के किनारे से मौलाबाग होते हुए बम रोड, चौरम और बारुण की ओर जाने वाला मुख्य मार्ग गुजरता है. इस सड़क पर दिनभर वाहनों की आवाजाही बनी रहती है. सड़क के घुमावदार होने के कारण हादसे की आशंका भी बनी रहती है.
नहर और सड़क के बीच झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों के लिए यह स्थिति दोहरी परेशानी पैदा करती है. एक तरफ गहरे पानी का खतरा है, तो दूसरी तरफ तेज रफ्तार वाहनों की आवाजाही से दुर्घटना का डर बना रहता है. बच्चों और बुजुर्गों के लिए स्थिति और अधिक संवेदनशील है.
सुरक्षित जमीन देकर पुनर्वास की मांग
भाकपा माले ने नहर के दोनों छोर पर बसे महादलित परिवारों को स्थायी जमीन उपलब्ध कराने और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पुनर्वासित करने की मांग की है. पार्टी का कहना है कि इन परिवारों को केवल अस्थायी राहत देने के बजाय स्थायी समाधान की जरूरत है.
दो लोगों की मौत के बाद एक बार फिर यह सवाल सामने है कि वर्षों से नहर किनारे असुरक्षित परिस्थितियों में रह रहे इन परिवारों को सुरक्षित आवास कब मिलेगा. अब लोगों की नजर प्रशासन, नगर पर्षद, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की पहल पर है.
लगातार दो मौतों ने इस समस्या की गंभीरता को सामने ला दिया है. ऐसे में जरूरत है कि प्रशासन केवल हादसे के बाद राहत और मुआवजे तक सीमित न रहे, बल्कि नहर किनारे रहने वाले परिवारों का सर्वे कराकर उनके स्थायी पुनर्वास की दिशा में ठोस कदम उठाये. सुरक्षित जमीन और बुनियादी सुविधाएं मिलने से ही इन परिवारों को वर्षों से चले आ रहे असुरक्षित जीवन से राहत मिल सकेगी.
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