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कालजयी इतिहास और आस्था का संगम है भृगुरारी धाम

Updated at : 27 Nov 2025 4:23 PM (IST)
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कालजयी इतिहास और आस्था का संगम है भृगुरारी धाम

पुनपुन-मदार संगम पर त्रेता युग से बह रही ज्ञान की गंगा

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गोह. औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड की मिट्टी में समाया भृगुरारी धाम. जिसे स्थानीय रूप से भरारी भी कहा जाता है. यह सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि भारतीय ज्योतिष और सनातन इतिहास की वह गौरवशाली धरोहर है जिसकी जड़ें त्रेता युग तक फैली हुई हैं. यही वह पावन भूमि है जहां महर्षि भृगु ने मानव कल्याण के लिए कालजयी ग्रंथ भृगु-संहिता की रचना की थी. यहां आज भी पुनपुन और मदार नदी का पवित्र संगम सदियों पुरानी आस्था और इतिहास का साक्षी है. इस धाम का नामकरण सीधे तौर पर महर्षि भृगु के आश्रम से जुड़ा है और इसकी विशेषता है यहां विराजित नकटी भवानी का प्राचीन विग्रह.

तपोभूमि जहां लिखी गयी भृगु-संहिता

महर्षि भृगु सप्तऋषियों में से एक थे. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उन्होंने इस शांत व एकांत स्थल को कठोर तपस्या और ध्यान के लिए चुना था. कहा जाता है कि यहां समाधि लगाकर उन्होंने करोड़ों जन्मपत्रियों का फलित एक साथ संकलित किया और भृगु-संहिता की रचना की. ज्योतिष की दृष्टि से यह धाम अत्यंत ऊर्जा केंद्र माना जाता है.

वनवास के दौरान यहां पहुंचे थे भगवान श्रीराम

स्थानीय जनमान्यताओं के अनुसार वनवास के दौरान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम. माता सीता और लक्ष्मण के साथ यहां पधारे थे. उन्होंने महर्षि भृगु के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लिया था. इसी संगम पर स्नान करते हुए उन्होंने मंदारेश्वर महादेव की स्थापना की थी. कहा जाता है कि यह शिवलिंग स्वयं श्रीराम के हाथों स्थापित होने के कारण अत्यंत चमत्कारी और सिद्ध है.

नकटी भवानी : कटे मस्तक वाली देवी का रहस्य

भृगुरारी धाम से निकट स्थित मां नकटी भवानी का मंदिर भक्तों की श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है. यहां देवी का विग्रह बिना मस्तक के स्वरूप में है. इसलिए इन्हें नकटी कहा जाता है. लोक कथाओं के अनुसार इसका संबंध महर्षि भृगु के पुत्र और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से है. उनकी माता पुलोमा भगवान विष्णु के चक्र से कट गई थीं. मां के कटे हुए धड़ की भक्तिभाव से पूजा कर उन्होंने उन्हें पुनर्जीवन प्राप्त कराया था. इसी कारण यह स्थल एक जागृत शक्ति पीठ माना जाता है.

संगम का महत्व और कार्तिक पूर्णिमा का विराट मेला

यहां पुनपुन और मदार नदी का संगम इसे एक महातीर्थ का दर्जा देता है. मान्यता है कि इस संगम में स्नान का पुण्य प्रयाग के संगम के समान है. विशेषकर कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. लोग स्नान कर मंदारेश्वर महादेव को जल अर्पित करते हैं और नकटी भवानी से मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं. आचार्य पंडित लाल मोहन शास्त्री ने कहा कि भृगुरारी धाम अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा, पौराणिक इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम है. यह गोह प्रखंड का गौरव है जिसे सदियों से आस्था और सम्मान के साथ संरक्षित कर रखा गया है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SUJIT KUMAR

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