मजदूरी कर की अल्ट्रा मैराथन की तैयारी, बचपन में छूटा माता-पिता का साथ; संघर्ष से सफलता तक; जानिए आरा के बेटे की कहानी

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सात साल में अनाथ,मजदूरी कर बिहार का प्रतिनिधित्व कर रहा अल्ट्रा रनर मनीष

प्रतियोगिता में विजेता मेडल के साथ मनीष

देवरियां गांव के मनीष सिंह ने कठिन परिस्थितियों को पार कर अल्ट्रा मैराथन में अपना नाम रोशन किया है. मजदूरी कर अपने खर्च पर प्रतियोगिताएं जीतने वाले मनीष की कहानी संघर्ष और हौसले की मिसाल है.

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Arrah Runner Success Story : भोजपुर जिले के कोइलवर प्रखंड के एक छोटे से गांव देवरियां से निकलकर मनीष सिंह आज संघर्ष, जुनून और हौसले की मिसाल बन चुके हैं. बेहद कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े मनीष आज अल्ट्रा मैराथन जैसे चुनौतीपूर्ण खेल में अपनी पहचान बना लिया. आर्थिक तंगी के बावजूद वह मजदूरी कर अपने खर्च पर देश और विदेश की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं और बिहार का नाम रोशन करने का सपना देख रहे हैं.

Arrah News : बचपन में ही सिर से उठा माता-पिता का साया

मनीष सिंह का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा है. महज सात साल की उम्र में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया. इस हादसे के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया. परिवार का सहारा भी धीरे-धीरे छूटता गया और वे अकेले पड़ गए. ऐसे कठिन समय में उनके फूफा, जो भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं, उनके जीवन में सहारा बनकर सामने आए. उन्होंने मनीष को अपने साथ रखकर उनका पालन-पोषण किया और पढ़ाई जारी रखने में मदद की.

Labour : मजदूरी कर पूरा करते हैं सपना

पढ़ाई के बाद मनीष को रोजी-रोटी के लिए बाहर जाना पड़ा. वे पाइप फिटर और वेल्डर का काम करते हैं और उसी कमाई से अपनी दौड़ की तैयारी और प्रतियोगिताओं का खर्च उठाते हैं. महंगे डाइट और ट्रेनिंग सुविधाओं से दूर, वे साधारण भोजन के सहारे ही रोजाना कड़ी मेहनत करते हैं.

Ultra Marathon : 2019 से शुरू हुई दौड़, बना जुनून

मनीष ने वर्ष 2019 से नियमित रूप से दौड़ना शुरू किया. शुरुआत में लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और उन्हें पागल तक कहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने हर नकारात्मक बात को चुनौती के रूप में लिया और रोज 20 से 35 किलोमीटर तक अभ्यास करना शुरू कर दिया. वे सड़कों, खेतों और यहां तक कि सोन नदी की रेत पर भी दौड़ लगाकर खुद को मजबूत बनाते रहे.

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Success Story : अल्ट्रा मैराथन में बनाई पहचान

मनीष अब तक देश के कई बड़े आयोजनों में हिस्सा ले चुके हैं. इनमें हिमाचल प्रदेश के सोलंग वैली की 60 किमी स्काई अल्ट्रा, बेंगलुरु की 24 घंटे की अल्ट्रा रन, इंदौर की 12 घंटे तिरंगा रन और नासिक की टाटा अल्ट्रा जैसी प्रतियोगिताएं शामिल हैं. उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में पहला, दूसरा और तीसरा स्थान हासिल किया है. खास बात यह है कि उन्होंने अब तक किसी भी दौड़ को बीच में नहीं छोड़ा और हमेशा टॉप टेन में जगह बनाई.

प्रेरणा और संघर्ष साथ-साथ

मनीष महान धावक मिल्खा सिंह को अपना आदर्श मानते हैं. उनका कहना है कि मिल्खा सिंह की कहानी उन्हें हर दिन आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. हालांकि, उनके जीवन में कई कड़वे अनुभव भी आए. उन्होंने बताया कि एक बार मदद मांगने गए तो उनकी उपलब्धियों से पहले उनकी जाति पूछी गई, जिससे उन्हें गहरा आघात पहुंचा.

भविष्य का बड़ा लक्ष्य

मनीष का अगला लक्ष्य 17,500 फीट की ऊंचाई पर होने वाली कुंजुम ला अल्ट्रा मैराथन में भाग लेना है. इसके लिए उन्हें विशेष प्रशिक्षण की जरूरत है, जिसमें करीब एक लाख रुपये तक का खर्च आएगा.

मनीष सिंह की कहानी यह बताती है कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी मुश्किल रास्ता रोक नहीं सकता. हालांकि संसाधनों की कमी उनके सफर को कठिन बना रही है, लेकिन उनका जज्बा आज भी कायम है. अब जरूरत है कि सरकार और समाज ऐसे खिलाड़ियों का साथ दें, ताकि वे न सिर्फ अपने सपनों को पूरा कर सकें, बल्कि देश और बिहार का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर रोशन कर सकें.

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Deepak Kumar Gupt

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