100 साल बाद भी ब्रिटिश हुकूमत की याद दिलाती है बिस्टोरिया की 'नील कोठी', जाने एनी पाइन और मेरीगंज की ऐतिहासिक दास्तान

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मेरीगंज उपडाकघर | Prabhat Khabar Network

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अररिया के बिस्टोरिया में स्थित 'नील कोठी' आज भी ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों की गवाही देती है. यहां मजदूरों से जानवरों की तरह काम लिया जाता था. यह कोठी एनी पाइन और मेरी की प्रेम कहानी से भी जुड़ी है, जिसके कारण डाकघर का नाम 'मेरीगंज' आज भी जीवित है.

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अररिया जिले के रानीगंज प्रखंड अंतर्गत बिस्टोरिया पंचायत के वार्ड संख्या 18 में स्थित ऐतिहासिक 'नील कोठी' आज भी ब्रिटिश हुकूमत और भारतीय मजदूरों पर हुए अत्याचारों का जीवंत साक्ष्य प्रस्तुत करती है. सैकड़ों वर्ष पूर्व अंग्रेज अफसर एनी पाइन द्वारा बनवाई गई यह कोठी आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में सरकारी देख-रेख और संरक्षण का इंतजार कर रही है.

जहां तैयार होता था नील, आज भी मौजूद है वो ऐतिहासिक हौदी

रानीगंज मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बिस्टोरिया में ब्रिटिश काल में बड़े पैमाने पर नील की खेती और प्रसंस्करण (Processing) होता था:

  • मजदूरों का शोषण: इस नील कोठी में कोल्हू से नील तैयार किया जाता था. इस कोल्हू को चलाने के लिए बैलों की जगह भारतीय मजदूरों से जानवरों की तरह काम लिया जाता था.
  • 52 कोठी का इतिहास: कहा जाता है कि कभी यहां एक खंभे पर ही 52 कोठियां बनी हुई थीं, जो समय के साथ नष्ट हो गईं. हालांकि, जहां नील तैयार किया जाता था, वह हौदी आज भी जर्जर अवस्था में मौजूद है.
  • 'साहब की कोठी': ब्रिटिश काल में रानीगंज, परवाहा और मिर्जापुर क्षेत्र के नील बागानों की देख-रेख का जिम्मा एनी पाइन के पास था और स्थानीय लोग इसे 'साहब की कोठी' कहते थे.

एनी पाइन और मेरी की प्रेम कहानी: ऐसे पड़ा 'मेरीगंज' नाम

एनी पाइन का इतिहास केवल नील की खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनकी प्रेम कहानी भी इस क्षेत्र में काफी चर्चित रही:

  • भारतीय लड़की से विवाह: एनी पाइन ने त्रिवेणीगंज (सुपौल) के लतौना निवासी एक भारतीय लड़की मेरी (Mary) से प्रेम विवाह किया था.
  • रानीगंज को मेरीगंज बनाने की कोशिश: एनी पाइन अपनी पत्नी मेरी से इतना प्रेम करते थे कि उन्होंने रानी इंद्रावती के नाम पर बसे इस शहर 'रानीगंज' का नाम बदलकर अपनी पत्नी के नाम पर 'मेरीगंज' करने का प्रयास किया था. हालांकि, रानी इंद्रावती के प्रति क्षेत्रवासियों के सम्मान के कारण शहर का नाम रानीगंज ही रहा.
  • आज भी जीवित है मेरीगंज उप डाकघर: भले ही शहर का नाम न बदला हो, लेकिन रानीगंज स्थित उप डाकघर (Sub Post Office) का नाम आज भी 'मेरीगंज डाकघर' ही है, जो अंग्रेजी हुकूमत और इस ऐतिहासिक प्रेम कहानी की यादों को आज भी ताजा रखता है.

बिस्टोरिया में ही रह रहे हैं एनी पाइन के वंशज

समय बदलने के साथ एनी पाइन के वंशज आज पूरी तरह भारतीय बनकर बिस्टोरिया गांव में ही निवास कर रहे हैं. वे सभी भारतीय नागरिकों की तरह सरकारी सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं. उनके कुछ वंशज ईसाई धर्म का पालन कर रहे हैं, तो कुछ उत्तराधिकारियों ने सनातन (हिंदू) धर्म अपना लिया है.

संरक्षण की आस में ऐतिहासिक धरोहर

स्थानीय ग्रामीणों और पर्यटकों का कहना है कि ब्रिटिश काल के इस दुर्लभ इतिहास और नील कोठी को यदि पर्यटन या पुरातात्विक विभाग द्वारा संरक्षित किया जाए, तो यह भावी पीढ़ियों के लिए इतिहास को समझने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.


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रविंद्र यादव

लेखक के बारे में

By रविंद्र यादव

रविंद्र यादव प्रिंट माध्यम में 08 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. रानीगंज (अररिया) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक कार्यों, शिक्षा, राजनीति व खेल में रुचि रखते हैं.

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