पर्यूषण महापर्व को वाणी संयम दिवस के रूप में मनाया

Updated at : 04 Sep 2024 7:12 PM (IST)
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पर्यूषण महापर्व को वाणी संयम दिवस के रूप में मनाया

मंत्रोच्चार के साथ हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

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मौन की साधना करने वाले व्यक्ति का अपने आप ही निखर जाता है व्यक्तित्व फोटो:35-मुनि श्री के गीतिका को सुनते श्रावक. प्रतिनिधि, अररिया पर्यूषण महापर्व वाणी संयम दिवस के रूप में मनाया गया. शहर के अररिया कोर्ट स्थित तेरापंथ भवन में आचार्य श्री महाश्रमण जी के शिष्य मुनि आनंद कुमार जीकालू ठाणा-2- के पावन सानिध्य में पर्यूषण महापर्व के चौथे दिन वाणी दिवस के रूप में मनाया गया. कार्यक्रम का शुभारंभ मुनि श्री के द्वारा महामंत्रोच्चार के साथ हुआ. तत्पश्चात मुनि विकास कुमार जी ने वाणी संयम दिवस पर भावपूर्ण गीतिका प्रस्तुत की. साथ ही वाणी संयम पर अपने विचार व्यक्त किये, तेरापंथ महिला मंडल कि बहनों के द्वारा पर्यूषण के वाणी संयम दिवस पर सुमधुर गीतिका की प्रस्तुति दी. ज्ञानशाला की मुख्य प्रशिक्षिका माला धाजेड़ ने वाणी संयम दिवस पर अपने विचार व्यक्त किया. इस मौके पर मुनि आनंद कुमार ने कहा कि भावपूर्ण गीतिका प्रस्तुत कर उपस्थित श्रावकों को विभोर कर दिया. कहा कि वाणी संयम के लिये मौन का प्रयोग सर्वाधिक उपयुक्त है. बोलना जितना सहज सरल है, मौन रखना उतना हीं कठिन है, जो व्यक्ति मौन की साधना कर लेता है, उस व्यक्ति का व्यक्तित्व अपने आप निखरने लग जाता है. वह व्यक्ति अपनी संयमित वाणी से सबको अपना बना सकता है. कार्यक्रम में बड़ी संख्या में तेरापंथ सभा, महिला मंडल, तेयुप व अणुव्रत समिति के सदस्य उपस्थित थे. ————— केवल न बोलना ही मौन नहीं, कलात्मक पूर्वक बोलना भी मौन है: साध्वी श्री स्वर्ण रेखा फोटो:36-गीतिका प्रस्तुत करती साध्वी श्री स्वर्ण रेखा जी. प्रतिनिधि, फारबिसगंज शहर के आरबी लेन में स्थित तेरापंथ भवन में आचार्य श्री महाश्रमण जी की विदुषी सुशिष्या साध्वी श्री स्वर्ण रेखा जी ठाणा चार की सन्निधि में बुधवार को पर्यूषण महापर्व का चतुर्थ दिन वाणी संयम दिवस के रूप में मनाया गया. पर्यूषण पर्व त्याग संयम व तपस्या का पर्व है. व्यक्ति त्याग तपस्या व संयम के द्वारा आराधना करते हुए अपने आत्मा के निकट जाने का प्रयास करता है. पर्यूषण पर्व आराधना में वाणी संयम का दिन सबसे महत्वपूर्ण दिन है. पर्युषण पर्व का चौथा दिवस वाणी संयम दिवस के रूप में मनाया जाता हैं. जब व्यक्ति अपने रसनेंद्रिय पर विजय प्राप्त करके स्वाध्याय में गोते लगाता हुआ समता की साधना करता है तब व्यक्ति को आवश्यकता पड़ती है वाणी संयम की. क्या बोले, कैसे बोले और कहां बोले यही वाणी संयम है. ऐसी ही कला को सिखाता हैं वाणी संयम दिवस. साध्वी श्री सुधांशु प्रभा जी ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि व्यक्ति अपनी वाणी से ही अमृत व विष दोनों का कार्य कर सकता है. कार्यक्रम की शुभ शुरुआत महिला मंडल के द्वारा भगवान महावीर व भगवान पार्श्वनाथ भगवान की स्तुति के साथ की गई तत्पश्चात कन्या मंडल की कन्याओं के द्वारा पर्यूषण पर्व के वाणी संयम दिवस पर एक गीतिका प्रस्तुत की गयी. कार्यक्रम का कुशल संचालन स्थानीय सभा की उपाध्यक्ष मुकेश राखेचा ने किया. पर्यूषण के चौथे दिन श्रावक श्राविकाओं की अच्छी संख्या में उपस्थिति देखी गयी. श्रावक श्राविकाओं ने अच्छी संख्या में पर्यूषण पर्व का चौथा दिन त्याग तपस्या व संयम के साथ मनाया.

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