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कोसी संगम में स्नान करने के लिए उमड़ा भक्तों का सैलाब

सात नदियों से हुआ है कोसी नदी का उदगम

कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर नेपाल स्थित वराह क्षेत्र में जुटते हैं श्रद्धालु, विशाल मेले का होता है आयोजन फोटो:31- वराह क्षेत्र धाम में उमड़ी भीड़.

फोटो:32-सप्तकोसी में स्नान करते श्रद्धालु.

फोटो:33-वराह मंदिर में लगी श्रद्धालुओं की भीड़.

प्रतिनिधि, अररिया

पड़ोसी देश नेपाल के कोसी प्रांत अंतर्गत सुनसरी जिले के धरान से 15 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम दिशा में पहाड़ पर स्थित वराह क्षेत्र मंदिर हिंदू धर्मावलंबियों के लिए प्राचीन समय से ही आस्था का केंद्र बना हुआ है. यह धर्मस्थल नेपाल के सबसे पुराने तीर्थ स्थलों में से एक है. यहां पर भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह की पूजा की जाती है. उनके वराह अवतार की बातें पौराणिक ग्रंथों में कही गयी हैं. यह मंदिर उस जगह पर है जहां हिमालय से कोसी नदी धरती पर उतरती है. वराह क्षेत्र का वर्णन स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण व वराह पुराण में किया गया है. वराह क्षेत्र का उल्लेख व महिमा का वर्णन महाभारत में भी किया गया है. यहां मुख्य रूप से भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा की जाती है. हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार यह तीर्थ स्थल नेपाल के चार धामों में से एक है. इसलिए वराह क्षेत्र की यात्रा काफी पवित्र है. वराह क्षेत्र के मूल मंदिर का आखिरी बार 1934 में प्रलयकारी भूकंप के बाद पुनर्निर्माण किया गया था. यहां पर लक्ष्मी पंचायन, गुरु वराह, सूर्य वराह, कोक वराह, नागेश्वर सहित 09 मंदिर हैं. यहां पर 1500 वर्ष से अधिक पुरानी अद्भुत पत्थरों की आकर्षक मूर्तियां भी अवस्थित हैं.

सात नदियों से मिल कर वराह क्षेत्र से ही हुआ है कोसी नदी का उदग्म

इस स्थान को कोसी के उद्गम स्थल भी माना जाता है. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार विश्वमित्र ने इसी नदी के किनारे ऋषि का दर्जा प्राप्त किया था, वे कुशक ऋषि के शिष्य थे व उन्हें ऋगवेद में कौशिकी भी कहा गया है. सात धाराओं से मिल कर सप्तकोसी नदी बनती है. इनमें पूर्व में कंचनजंगा क्षेत्र से निकलने वाली तमूर नदी व तिब्बत से अरुण नदी व सन कोसी शामिल हैं. पूर्व से पश्चिम तक सन कोसी की सहायक नदियां दूध कोसी, लिखू खोला, तमकोसी, भोटे कोसी व इंद्रावती नदी शामिल हैं. तीर्थयात्री सभी अवसरों पर वराह क्षेत्र जाते हैं. कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्रांति के अवसरों पर विशेष त्योहार का आयोजन किया जाता है. इसके अलावा ऋषि पंचमी, ब्यास पंचमी, फागु पूर्णिमा व अन्य एकादशियों या अन्य व्रतों व त्योहारों के दिनों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री पहुंचते हैं. पुराणों में वर्णित है कि भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर अपने लंबे दांतों से पृथ्वी को पाताल में डूबने से बचाया था. इसके बाद से हीं भगवान विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ हिमालय व पहाड़ियों की गोद में कोसी नदी के तट पर बैठे.

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Prabhat Khabar News Desk
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