रोजगार के लिए अब भी हो रहा पलायन
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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समस्या. सरकार बदली, बदले जनप्रतिनिधि, लेकिन नहीं बदली जिले की तसवीर इस जिले से तस्लीमउद्दीन और शाहनवाज हुसैन जैसे सांसद व केंद्रीय मंत्री का नाता रहा है, लेकिन औद्योगिक नजरिये से देखें तो क्षेत्र को जनप्रतिनिधि कुछ भी नहीं दे पाये. अररिया : भौगोलिक दृष्टिकोण से नेपाल की सीमा पर अवस्थित अररिया जिला काफी समृद्ध […]
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समस्या. सरकार बदली, बदले जनप्रतिनिधि, लेकिन नहीं बदली जिले की तसवीर
इस जिले से तस्लीमउद्दीन और शाहनवाज हुसैन जैसे सांसद व केंद्रीय मंत्री का नाता रहा है, लेकिन औद्योगिक नजरिये से देखें तो क्षेत्र को जनप्रतिनिधि कुछ भी नहीं दे पाये.
अररिया : भौगोलिक दृष्टिकोण से नेपाल की सीमा पर अवस्थित अररिया जिला काफी समृद्ध माना जा सकता है. यहां पर विभिन्न प्रकार के उद्योगों की असीम संभावना भी है. कालांतर में कई प्रकार के उद्योगों के लिए अररिया जाना भी जाता रहा है.
साथ ही विभिन्न प्रकार के उद्योगों को स्थापित करने के प्रयास भी किये गये. लेकिन अररिया में दो हाथों को काम आज भी यहां की बड़ी समस्या है. हालातों पर गौर किया जाये तो, औद्योगिक विकास के लिए बातें तो होती रहीं, लेकिन यह कामयाब नहीं हो पाया. सीमांचल के इस जिले का दुर्भाग्य कहे कि नये उद्योग तो यहां नहीं लगे, जो थे वह भी समयानुसार बंद होते चले गये. पीछे जोड़ गये तो ढही सी इबारत. नतीजतन काम की तलाश में जिले के लोगों का अन्य राज्यों की तरफ पलायन कभी रूक नहीं सका. समय और जनप्रतिनिधि बदलते रहे लेकिन अररिया की तसवीर नहीं बदली.
लोगों के अरमान हुए खाक
वर्ष 1970 से वर्ष 1998 के बीच कई उद्योगों की स्थापना की जगी थी आस
फारबिसगंज में व अररिया आरएस में उद्योग की संभावना तलाशी जाती रही. प्रयास तो हुए लेकिन नतीजा सामने नहीं आये. अगर संभावित उद्योग स्थापित हो जाते तो जिले के लोगों को काम की तलाश में अन्य राज्यों की तरफ पलायन नहीं करना पड़ता. फारबिसगंज में बैजनाथ पेपर मिल और क्राफ्ट उद्योग चला करता था. 70 के दशक में यह बंद हो गये. वर्ष 1976 में फारबिसगंज में ही संजय गांधी ने जूट मिल का शिलान्यास किया. इसके बाद लोग राह तकते रहे लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी. वर्ष 1998 में फारबिसगंज में ही सूत मिल लगाने की बात परवान चढ़ी. इसके लिए लगभग 26 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किये जाने की बात भी कही जा रही है. तत्कालीन सांसद डुमरलाल बैठा ने इस मामले में रुचि भी दिखायी, लेकिन सूत मिल मूर्त रूप नहीं ले पायी. पोठिया के ग्रामीण भूपेंद्र यादव की माने तो वर्ष 1984 में अररिया के कोशियार व फारबिसगंज के पोठिया में गत्ता और कूट उद्योग की स्थापना हुई. जिले के लोगों को लगा कि अब उन्हें काम मिलेगा. भवनों का भी निर्माण हुआ. भवन खंडहर में तब्दील हो गयी. लोगों के अरमान भी खाक हो गये.
लोगों की नजर अब फारबिसगंज में निर्माणाधीन ग्लूकोज फैक्टरी पर टिकी हुई है. लगभग छह वर्षों से इसका निर्माण कार्य चल रहा है. जिले में बड़े पैमाने पर मक्का की खेती की संभावना को देखते हुए किसानों को इस बात का भरोसा है कि उन्हें उनकी फसल का उचित दाम मिल पायेगा. मेसर्स ओरो सुंदरम इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड़ की देख-रेख में फैक्टरी का निर्माण कराया जा रहा है. जानकारी के अनुसार फैक्टरी के शुरू हो जाने के बाद लगभग 300 टन मक्के की खपत रोजाना होगी,
जबकि लगभग तीन हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार प्राप्त हो पायेगा. हालांकि यह बातें भी लंबे समय से कही जा रही है लेकिन फैक्टरी का संचालन कब से होगा यह जवाब आज भी कोई देने की स्थिति में नहीं है. इस जिले से सांसद तस्लीमउद्दीन और शाहनवाज जैसे सांसद व केंद्रीय मंत्री का नाता रहा है. लेकिन औद्योगिक नजरिये से देखें तो इस जिले को जनप्रतिनिधि कुछ भी नहीं दे पाये. जिसे लोग अपने जेहन में याद रख सके.
कई बड़े उद्योगों की स्थापना के लिए कई बड़े नेताओं का हुआ जिले में पदार्पण, उनमें संजय गांधी का भी है नाम
मक्का किसानों के लिए ग्लूकोज फैक्टरी की स्थापना आज भी है अंतिम उम्मीद
उद्योगों की स्थापना आज भी है कोरी कल्पना
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