हजार माह की इबादत से बेहतर है एक रात की इबादत

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चल रहा है रमजान का आखिरी अशरा लैलतुल कद्र में इबादत की है खास अहमियत केवल भूखे प्यासे रहने का नाम रोजा नहीं फितरा अदा करना भी है जरूरी अररिया : माहे रमजान अब कमोबेश समाप्त होने को है. पर मुसलिम समाज व घरों में इबादतों का सिलसिला लगातार जारी है. रमजान के महीना का […]

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चल रहा है रमजान का आखिरी अशरा

लैलतुल कद्र में इबादत की है खास अहमियत
केवल भूखे प्यासे रहने का नाम रोजा नहीं
फितरा अदा करना भी है जरूरी
अररिया : माहे रमजान अब कमोबेश समाप्त होने को है. पर मुसलिम समाज व घरों में इबादतों का सिलसिला लगातार जारी है. रमजान के महीना का आखिरी दस दिन यानी आखिरी अशरा शुरू हो चुका है. मुसलमानों की मान्यता के अनुसार आखिरी अशरा जहन्नुम से आजादी का है. जबकि पहला अशरा रहमत व दूसरा मगफिरत का माना जाता है. आखिरी अशरा में ही लैलतुल कद्र यानी शबे कदर पड़ता है.
रमाजन व शबे कदर की अहमियत की जानकारी देते हुए मौलाना कारी नियाज अहमद के साथ-साथ इमाम व खतीब मौलाना नवाजिश सिद्दीकी व मीर शिकार टोला मसजिद के पूर्व इमाम अब्दु गनी लबीब ने कहा कि रमजान का महीना दरहकीकत खुदा का इनाम है. इस माह का पवित्र कुरआन के साथ खास रिश्ता है. क्योंकि कुरआन रमजान के महीना में पड़ने वाले शबे कदर को ही अवतरित किया गया था. मौलाना सिद्दीकी ने कहा कि रमजान की रातों में से एक रात शबे कदर कहलाती है. पवित्र कुरआन में इसे हजार महीनों से अफजल बताया गया है.
बताया गया कि शबे कदर की तलाश आखरी 10 रमजानों की ताक रातों यानी 21 वीं, 23 वीं, 25 वीं, 27 वीं व 29 वीं रमजान से पहले वाली रातों में तलाशना चाहिए. इन रातों में इबादत का खास हुक्म है. बताया गया कि शबे कदर में एक रात की इबादत को हजार महीनों की इबादत से बेहतर माना गया है. इसी क्रम में श्री अब्दुल गनी ने बताया कि रमजान के महीने में केवल खुद को खाने पीने से रोक देने से ही रोजा मुकम्मल नहीं हो जाता है.
दूसरे बुरे कामों से भी बचना जरूरी है. जिस तरह खाने पीने से परहेज किया जाता है, उसी प्रकार अपने शरीर के दूसरे अंगों पर भी कंट्रोल रखने का हुक्म आया है. वहीं उन्होंने ये भी कहा कि रमजान के आखरी 10 दिन की एक इबादत सदका-ए-फित्र भी है. आर्थिक रूप से सामर्थ्यवान मुसलमानों पर निर्धारित फितरा की राशि ईद की नमाज से कबल अदा कर दिया जाना जरूरी है.
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