याद आते ही छलक जाती हैं आंखें, नहीं हो सकती भरपाई

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अररिया : शहर के वार्ड संख्या 28 में रहने वाली सायका कौसर का खुशहाल परिवार है. दो बेटियां व एक बेटा अच्छी शिक्षा पा कर रहे हैं. पति मोइज आलम सरकारी शिक्षक हैं. रहने के लिए अपना मकान. जोकीहाट के बगढहरा गांव में खेती की जमीन. देखा जाये तो एक खुशहाल मध्यमवर्गीय परिवार. किसी बात […]

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अररिया : शहर के वार्ड संख्या 28 में रहने वाली सायका कौसर का खुशहाल परिवार है. दो बेटियां व एक बेटा अच्छी शिक्षा पा कर रहे हैं. पति मोइज आलम सरकारी शिक्षक हैं. रहने के लिए अपना मकान. जोकीहाट के बगढहरा गांव में खेती की जमीन. देखा जाये तो एक खुशहाल मध्यमवर्गीय परिवार. किसी बात की कमी नहीं. पर जीवन में एक ऐसी कमी, एक एेसा खालीपन जिसे पूरा नहीं किया जा सकता.

सायका के पास आज के दिन सब कुछ है. पर उनके पास जो कमी है, वो मां की है. ये दर्द इस लिये भी गहरा है कि उन्हें अपनी मां कौसर तसनीम की शक्ल तक याद नहीं. ननिहाल में उपलब्ध फोटो के जरिया पहली बार उसका अपनी मां से परिचय हो सका. अपनी मां को कभी अपनी आंखों से देखा तो नहीं. लेकिन उन्हें लगता है कि उसकी मां हमेशा उनके बहुत करीब रहती रही हैं. पूछे जाने पर वो कहती हैं कि अपनी अम्मा को याद कर अब भी उसकी आंखें छलक जाती हैं.

घंटों बेचैन रहती हैं. जितना उनके बारे में सुना है लगता है अगर वो जीवित रहती तो आदर्श मां होती. अपना दर्द बयान करते हुए सायका कहती है कि उसकी पैदाइश के साथ ही वर्ष 1973 में अम्मा का इंतकाल हो गया था. बड़े दो भाइयों को तो अम्मा की थोड़ी बहुत शक्ल याद है. पर उसे कुछ भी याद नहीं.

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