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...जब पिता के एक फैसले ने सचिन और भारतीय क्रिकेट की तकदीर बदल दी

Updated at : 18 Apr 2018 8:50 PM (IST)
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...जब पिता के एक फैसले ने सचिन और भारतीय क्रिकेट की तकदीर बदल दी

नयी दिल्ली : वह 1984 की गर्मियों का समय था जब प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर के एक फैसले ने ‘मास्टर ब्लास्टर’ सचिन तेंदुलकर का जीवन बदल दिया. यह फैसला सचिन का स्कूल बदलने के बारे में था , जिसने उनकी तकदीर बदल कर रख दी. इस वाकये का उल्लेख एक नयी पुस्तक ‘ विनिंग लाइक सचिन […]

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नयी दिल्ली : वह 1984 की गर्मियों का समय था जब प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर के एक फैसले ने ‘मास्टर ब्लास्टर’ सचिन तेंदुलकर का जीवन बदल दिया.

यह फैसला सचिन का स्कूल बदलने के बारे में था , जिसने उनकी तकदीर बदल कर रख दी. इस वाकये का उल्लेख एक नयी पुस्तक ‘ विनिंग लाइक सचिन : थिंक एंड सक्सीड लाइक तेंदुलकर ‘ नाम की पुस्तक में किया गया है. इसके लेखक हैं देवेंद्र प्रभुदेसाई.

सचिन महज 11 साल के थे जब उनके बड़े भाई अजित उन्हें कोच रमाकांत आचरेकर के पास ले गये. आचरेकर की राय थी कि सचिन खेल में काफी आगे जा सकते हैं और इसलिये बेहतर होगा कि उन्हें प्रतिस्पर्धी क्रिकेट तक पहुंच मुहैया कराई जाये. पुस्तक के अनुसार , हालांकि , समस्या यह थी कि मुंबई के जिस अंग्रेजी माध्यम के स्कूल आईईएस में सचिन पढ़ते थे , उसमें क्रिकेट टीम नहीं थी.

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आचरेकर ने सलाह दी कि सचिन का नाम शारदाश्रम विद्यामंदिर स्कूल में लिखा दिया जाये. आचरेकर इस स्कूल की अंग्रेजी और मराठी माध्यम की क्रिकेट टीम को कोचिंग देते थे. सचिन का बांद्रा में साहित्य सहवास स्थित आवास दादर में शारदाश्रम से अच्छी खासी दूरी पर था.

ऐसी कोई बस नहीं थी जो इन दोनों स्थानों के लिये सीधी चलती हो. इसका मतलब था कि सचिन को रास्ते में बस बदलनी पड़ती , वह भी सुबह में क्योंकि स्कूल सुबह सात बजे खुलता था. उनकी उम्र के लड़के को आम तौर पर अंतर – स्कूल क्रिकेट टीम में शामिल किया जाता था , जब वे सातवीं या आठवीं कक्षा में पढ़ते थे.

सचिन को छठी कक्षा से शुरुआत करनी थी। घर से शारदाश्रम आने और जाने में उनका विश्राम करने और पढ़ने का समय चला जाता था. पुस्तक में कहा गया है , प्रोफेसर तेंदुलकर आसान उपाय चुन सकते थे. वह अपने बेटे को छुट्टियों के दौरान क्रिकेट खेलने और साल के शेष समय में पढ़ाई पर ध्यान लगाने को कह सकते थे.

वह स्कूल बदलने के विचार से अपने कदम पीछे खींच सकते थे. हालांकि , उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने और परिवार के शेष सदस्यों ने अंतिम फैसला सचिन पर ही छोड़ दिया. परिवार के सदस्यों ने सचिन को आश्वस्त किया कि वह जो भी फैसला करेंगे , वे उनका समर्थन करेंगे.

पुस्तक में कहा गया है कि वे नहीं जानते थे कि यह लड़के की जिंदगी को बदलने वाला क्षण होगा और भारतीय क्रिकेट के इतिहास में अनपेक्षित मोड़ लेगा. परिवार के सबसे युवा सदस्य जिसपर उन्होंने फैसले का दारोमदार छोड़ दिया था , उसने उन्हें सूचित किया कि वह स्कूल बदलने और चुनौती के लिये तैयार हैं.

सचिन को उनके जीवन का उद्देश्य मिल गया और क्रिकेट के प्रति प्रेम को उन्होंने आगे बढ़ाने का फैसला किया. आचरेकर के कुशल मार्गदर्शन में इसने जुनून का रूप ले लिया और यही उनके जीवन में सबकुछ हो गया. इस पुस्तक को रूपा पब्लिकेशंस ने प्रकाशित किया है. इसमें सचिन के जीवन से जीतने के गुण और अन्य सबक लोगों को बताए गए हैं.

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