Tusu Parab 2026: टुसू पर्व मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों का पारंपरिक त्यौहार है, जिसमें प्रकृति के प्रति आभार और सांस्कृतिक विरासत की झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। इस अवसर पर लोकजीवन की भावनाओं से ओत-प्रोत पारंपरिक टुसू गीत गाए जाते हैं, सामूहिक लोक नृत्य किए जाते हैं और घर-घर में विशेष पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं।
टुसू पर्व: झारखंड में मकर संक्रांति का पारंपरिक स्वरूप
सूर्य के उत्तरायण होने यानी धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश को भारतीय संस्कृति में अत्यंत शुभ माना जाता है. इसी खगोलीय परिवर्तन के साथ मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है.
झारखंड में मकर संक्रांति को क्यों कहते हैं टुसू पर्व?
झारखंड में मकर संक्रांति को टुसू पर्व या मकर पर्व के नाम से जाना जाता है. यह पर्व नई फसल के स्वागत और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का प्रतीक है. जब देश के अन्य हिस्सों में लोग मकर संक्रांति को तिल-गुड़ और दान-पुण्य के रूप में मनाते हैं, तब झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी समाज टुसू मनी के बलिदान की स्मृति में यह पर्व मनाते हैं.
टुसू मनी की कथा: बलिदान और स्त्री-शक्ति का प्रतीक
लोक कथाओं के अनुसार, टुसू मनी आदिवासी समाज की एक साहसी बेटी थी, जिसने सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और बलिदान दिया. टुसू पर्व उसी त्याग, संघर्ष और स्त्री-सशक्तिकरण की स्मृति को जीवित रखता है. यही कारण है कि टुसू पर्व केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि प्रेम, आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना की गाथा है.
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आदिवासी संस्कृति और प्रकृति का उत्सव है टुसू पर्व
टुसू पर्व मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों द्वारा मनाया जाता है. इस दौरान:
- पारंपरिक टुसू गीत गाए जाते हैं
- सामूहिक लोक नृत्य किए जाते हैं
- मिट्टी, फूल और धान से सजी टुसू प्रतिमाएं बनाई जाती हैं
- विशेष पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं
- यह पर्व झारखंड के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है.
टुसू पर्व: लोकजीवन की आत्मा
भारत विविधताओं का देश है, जहां लोक संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है. टुसू पर्व खेत-खलिहानों की खुशबू, आदिवासी जीवन की सादगी और प्रकृति के साथ गहरे संबंध को दर्शाता है.

