ePaper

Meaning of True Bhakti: सिर्फ गंगास्नान नहीं, मन का स्नान भी जरूरी, जानिए क्या है सच्ची भक्ति का अर्थ

9 Nov, 2025 8:49 am
विज्ञापन
True Bhakti

जानिए क्या है सच्ची भक्ति का अर्थ

Meaning of True Bhakti: क्या सिर्फ गंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं? क्या केवल पूजा-पाठ और दान करने से आत्मा पवित्र हो जाती है? आइए इस आर्टिकल में जानते हैं कि रामायण के अनुसार “सच्ची भक्ति” क्या है.

विज्ञापन

Meaning of True Bhakti: श्रीरामचरितमानस और अन्य धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि जब तक मन भीतर से निर्मल नहीं होगा, तब तक कोई भी कर्म सफल नहीं हो सकता. शरीर नहीं, मन की शुद्धि ही सच्ची भक्ति है यही संदेश रामायण और तुलसीदास जी के दोहों में बार-बार दोहराया गया है.

बाहरी पूजा नहीं, भीतरी भावना है असली भक्ति

कहा गया है कि एक व्यक्ति शरीर से तो गंगास्नान करता है, पर मन में द्वेष, अहंकार या छल रखता है तो वह केवल शरीर को शुद्ध करता है, आत्मा को नहीं.  जहाँ पाप-वृत्ति रहती है, वहाँ शुद्धता नहीं ठहरती. यानी जब तक मन से अशुद्धि नहीं जाएगी, तब तक गंगा का जल भी भीतर के दोषों को नहीं धो सकता.

ईश्वर-भक्ति के बिना कर्म अधूरा

श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है

 “वारी भये होय घृत, सिक्तत ते बन तेल,

बिनु हरि भजन न भवतरै, नहि स्रवण करि मेल.

इस दोहे का अर्थ है- जैसे जल में तेल नहीं ठहरता, वैसे ही बिना हरि-भक्ति के मन में शांति नहीं टिकती. सिर्फ कर्म करने से मुक्ति नहीं मिलती, जब तक मन से हरि-नाम की भावना न जुड़ी हो.

तुलसीदास जी के अनुसार

“ईश्वर-भक्ति के बिना किया गया कर्म केवल शरीर की क्रिया है, आत्मा की नहीं.”

रामायण के अनुसार, माया के तीन गुण हैं

सात्त्विक, राजस, और तामस

इन्हीं तीन गुणों से तीन प्रकार के कर्म उत्पन्न होते हैं

सात्त्विक कर्म- निःस्वार्थ, प्रेम और सत्य पर आधारित. इससे पुण्य और स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है.

राजस कर्म- स्वार्थ, अहंकार और लोभ से प्रेरित. इससे केवल अस्थायी सुख मिलता है.

तामस कर्म- अज्ञान, क्रोध और आलस्य से प्रेरित. इससे पतन और दुख की प्राप्ति होती है.

रामायण में कहा गया है कि

 “जिमि थल बिनु जल रहि न सके, कोटि भांति कोउ करि उपाई.”

अर्थात, जैसे धरती बिना जल के नहीं रह सकती, वैसे ही भक्ति बिना कर्म व्यर्थ है.

सच्ची भक्ति क्या है

  • रामायण और तुलसीदास जी दोनों कहते हैं कि भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि मन की शुद्धि है.
  • जब मन शांत, विचार निर्मल और कर्म निष्काम होते हैं- तभी भक्ति सच्ची मानी जाती है.
  • सच्ची भक्ति वही है जिसमें व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार को मिटाकर, प्रेम और सेवा से भगवान का स्मरण करता है.

सोर्स- प्रेम रस सिद्धांत किताब (श्री कृपालु जी महाराज)

क्या सच्चा भक्त कभी दुखी हो सकता है?

बाहरी रूप से शायद हाँ, लेकिन भीतर से नहीं. सच्चा भक्त हर परिस्थिति को प्रभु की इच्छा मानकर शांत रहता है.

क्या भक्ति के लिए गुरु जरूरी है?

हाँ, गुरु मार्गदर्शन का स्रोत हैं. रामायण में भी कहा गया है “बिनु सत्संग विवेक न होई.” सच्ची भक्ति के लिए सत्संग और गुरु का आशीर्वाद बहुत जरूरी है.

क्या केवल मंदिर जाने से भक्ति पूरी होती है?

नहीं, मंदिर जाना एक माध्यम है. सच्ची भक्ति तब होती है जब भगवान आपके विचारों, कर्मों और व्यवहार में बसते हैं.

क्या गरीब व्यक्ति भी सच्चा भक्त बन सकता है?

हाँ, भक्ति का कोई आर्थिक मापदंड नहीं है। श्रीराम ने स्वयं शबरी जैसी भक्तिन को सबसे प्रिय माना, जिसने केवल प्रेम से जूठे बेर अर्पित किए थे.

ये भी पढ़ें: Importance of Applying Sindoor to Lord Hanuman: सिंदूर चढ़ाने से क्यों प्रसन्न होते हैं बजरंगबली? जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा

विज्ञापन
JayshreeAnand

लेखक के बारे में

By JayshreeAnand

कहानियों को पढ़ने और लिखने की रुचि ने मुझे पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. सीखने और समझने की इस यात्रा में मैं लगातार नए अनुभवों को अपनाते हुए खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करती हूं. वर्तमान मे मैं धार्मिक और सामाजिक पहलुओं को नजदीक से समझने और लोगों तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हूं.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola

अपने पसंदीदा शहर चुनें

ऐप पर पढ़ें