Jivitputrika Vrat katha: जब अश्वत्थामा ने गर्भ में पल रहे बच्चे की हत्या के लिए चलाया था ब्रह्मास्त्र, यहां पढ़े जितिया व्रत कथा और देखे Video

Updated at : 10 Sep 2020 10:50 AM (IST)
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Jivitputrika Vrat katha: जब अश्वत्थामा ने गर्भ में पल रहे बच्चे की हत्या के लिए चलाया था ब्रह्मास्त्र, यहां पढ़े जितिया व्रत कथा और देखे Video

Jivitputrika Vrat 2020, Jitiya puja vidhi, Jitiya Vrat Katha, Jivitputrika Vrat katha, shubh muhurt, Jivitputrika Vrat katha Video: आज जीवित्पुत्रिका व्रत मताएं रखी है. यह व्रत अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है. जीवित्पुत्रिका व्रत अष्टमी तिथि को रखा जाता है. संतान के सुख और सौभाग्य के लिये रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत है. पुत्र की दीर्घ, आरोग्य और सुखमयी जीवन के लिए इस दिन माताएं व्रत रखती हैं.

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Jivitputrika Vrat 2020, Jitiya puja vidhi, Jitiya Vrat Katha, Jivitputrika Vrat katha, shubh muhurt, Jivitputrika Vrat katha Video: आज जीवित्पुत्रिका व्रत मताएं रखी है. यह व्रत अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है. जीवित्पुत्रिका व्रत अष्टमी तिथि को रखा जाता है. संतान के सुख और सौभाग्य के लिये रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत है. पुत्र की दीर्घ, आरोग्य और सुखमयी जीवन के लिए इस दिन माताएं व्रत रखती हैं. तीज की तरह यह व्रत भी बिना आहार और निर्जला रखना पड़ता है. अष्टमी तिथि को महिलाएं बच्चों की समृद्धि और उन्नत के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. इसके बाद नवमी तिथि यानी अगले दिन व्रत का पारण किया जाता है यानी व्रत खोला जाता है. पूजा के बाद जितिया व्रत की पौराणिक कथा सुनने की मान्यता है. मान्यता है कि इस कथा को सुनने बिना पूजा और व्रत अधूरी मानी जाती है…

ये कथा है प्रचलित

जितिया व्रत के महत्व को लेकर एक कथा काफी प्रचलित है. एक समय की बात है, एक जंगल में चील और लोमड़ी घूम रहे थे. तभी उन्होंने मनुष्य जाति को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवं कथा सुनी. उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वही लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था. चील के संतानों एवं उनकी संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुंची, लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बची. इसलिए इस व्रत को हर माता अपनी संतान की रक्षा के लिए करती है.

व्रत का इतिहास

महाभारत के युद्ध में पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज हो गये थे. सीने में बदले की भावना लिए वह पांडवों के शिविर में घुस गए और शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे. अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार डाला. कहा जाता है कि सभी द्रौपदी की पांच संतानें थीं. अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली. क्रोध में आकर अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में पल रहे बच्चे को भी ब्रह्मास्त्र से मार डाला.

ऐसे में भगवान कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को पुन: जीवित कर दिया. भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से जीवित होने वाले इस बच्चे को जीवित्पुत्रिका नाम दिया गया. तभी से संतान की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए हर साल जितिया व्रत रखने की परंपरा को निभाया जाता है. इस दिन माताएं अपने संतान की लंबी उम्र की कामना करती है.

News posted by : Radheshyam kushwaha

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