रवि प्रदोष व्रत कथा: मां की श्रद्धा से बची बेटे की जान, भगवान शिव ने ऐसे बदली भक्त की किस्मत

व्रत कथा का पाठ करती हुई महिला की सांकेतिक तस्वीर (एआई)
आषाढ़ माह का रवि प्रदोष व्रत 12 जुलाई को है। इस व्रत कथा में जानें कैसे एक गरीब ब्राह्मण परिवार की भक्ति और प्रदोष व्रत ने उनका भाग्य बदल दिया।
Ravi Pradosh Vrat katha: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है. जिस दिन यह व्रत पड़ता है, उसी के आधार पर इसका नाम रखा जाता है. इस दिन श्रद्धालु भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और व्रत कर सुख-समृद्धि तथा शांति की कामना करते हैं. इस वर्ष आषाढ़ माह का रवि प्रदोष व्रत 12 जुलाई, रविवार को रखा जा रहा है. जब प्रदोष व्रत रविवार के दिन पड़ता है, तो उसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा के साथ प्रदोष व्रत कथा पाठ करने से व्रत का पूर्ण फल बढता है और सुख, शांति व समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.
रवि प्रदोष व्रत कथा
बहुत समय पहले एक छोटे से गांव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था. परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था, लेकिन ब्राह्मण की पत्नी भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं. वह हर महीने पूरे श्रद्धा-भाव से प्रदोष व्रत रखती और भगवान शिव की पूजा करती थीं. उनका एक पुत्र था, जिससे दोनों माता-पिता बहुत प्रेम करते थे.
डाकुओं से हुआ सामना
एक दिन उनका पुत्र अकेले गंगा स्नान के लिए घर से निकला. रास्ते में कुछ डाकुओं ने उसे रोक लिया और धमकाते हुए कहा, "अगर अपनी जान बचाना चाहते हो, तो बताओ तुम्हारे पिता ने अपना धन और खजाना कहां छिपाया है."मासूम बालक ने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा, "हम बहुत गरीब हैं. हमारे पास छिपाने के लिए कोई धन-दौलत नहीं है."
डाकुओं को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने उसके हाथ में बंधी पोटली की ओर इशारा करते हुए पूछा, "अगर तुम गरीब हो, तो इस पोटली में क्या है?" बालक ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "मेरी मां ने रास्ते में खाने के लिए इसमें रोटियां बांध दी हैं." यह सुनकर डाकुओं को यकीन हो गया कि वह सच बोल रहा है. उन्होंने उसे बिना कोई नुकसान पहुंचाए वहां से जाने दिया.
निर्दोष होकर भी पहुंचा जेल
आगे चलते-चलते बालक एक दूसरे नगर में पहुंच गया. लंबी यात्रा की थकान के कारण वह नगर के बाहर एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे सो गया. उसी समय नगर के सैनिक कुछ चोरों का पीछा करते हुए वहां पहुंचे. पेड़ के नीचे अकेले सो रहे बालक को देखकर उन्हें संदेह हुआ कि यही चोर है. बिना जांच-पड़ताल किए सैनिक उसे पकड़कर राजा के दरबार में ले गए. राजा ने भी बिना सत्य जाने उसे कारागार में डालने का आदेश दे दिया.
भगवान शिव ने राजा को दिया संकेत
उधर गांव में बालक की मां प्रदोष व्रत की पूजा कर भगवान शिव से अपने पुत्र की कुशलता की प्रार्थना कर रही थीं. उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर उसी रात भगवान शिव राजा के स्वप्न में प्रकट हुए. भगवान शिव ने राजा से कहा, "जिस बालक को तुमने जेल में डाला है, वह पूरी तरह निर्दोष है. यदि सुबह होते ही उसे मुक्त नहीं किया, तो तुम्हारा राज्य और वैभव नष्ट हो जाएगा."
बदल गई ब्राह्मण परिवार की किस्मत
सुबह होते ही राजा भयभीत हो गया. उसने तुरंत बालक को अपने सामने बुलाकर पूरी घटना पूछी. बालक ने सच्चाई बता दी. राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने तुरंत उसे रिहा कर दिया.
इसके बाद राजा ने सैनिकों को भेजकर बालक के माता-पिता को सम्मानपूर्वक दरबार में बुलवाया. उनके आने पर राजा ने कहा, "घबराइए नहीं. आपका पुत्र निर्दोष है. भगवान शिव की कृपा से उसकी रक्षा हुई है और मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ."
राजा ने अपनी भूल का प्रायश्चित करते हुए उस गरीब ब्राह्मण परिवार को रहने और आजीविका के लिए पांच गांव दान में दे दिए. तभी से यह मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रदोष व्रत करने तथा भगवान शिव की आराधना करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है.
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By Neha Kumari
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