घर में किसी की मृत्यु के बाद 13 दिनों तक भोजन में हल्दी क्यों नहीं डाली जाती? जानें रहस्य

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गरुड़ पुराण की सांकेतिक तस्वीर (एआई)

गरुड़ पुराण की सांकेतिक तस्वीर (एआई)

क्या आपने कभी सोचा है कि किसी प्रियजन के निधन के बाद 13 दिनों तक भोजन में हल्दी का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? गरुड़ पुराण के अनुसार, इसके पीछे गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. जानें शुभता के प्रतीक हल्दी के वर्जित होने का कारण और इसका दोबारा उपयोग कब शुरू होता है.

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Garud Puran: सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के 16 संस्कार बताए गए हैं. इनमें अंत्येष्टि संस्कार (अंतिम संस्कार) सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है. हिंदू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में अंतिम संस्कार और उसके बाद पालन किए जाने वाले नियमों का विस्तार से वर्णन मिलता है.

अक्सर आपने देखा होगा कि घर में किसी सदस्य के निधन के बाद 13 दिनों के सूतक काल में भोजन में हल्दी का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इस दौरान घर में केवल सादा और सात्विक भोजन बनाया और खाया जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है? क्या यह सिर्फ एक परंपरा है या इसके पीछे कोई धार्मिक महत्व भी है? आइए जानते हैं इसके पीछे के महत्व और मान्यता के बारें में विस्तार से .

शुभता और मांगलिक कार्यों का प्रतीक

हिंदू धर्म में हल्दी को शुभ, पवित्र और सौभाग्य का प्रतीक माना गया है. विवाह, पूजा-पाठ, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्यों में हल्दी का विशेष महत्व होता है. वहीं, किसी परिजन की मृत्यु के बाद का समय शोक, आत्मचिंतन और वैराग्य का माना जाता है. इसलिए इस अवधि में हल्दी जैसी शुभ वस्तु का प्रयोग नहीं किया जाता. यह इस बात का भी संकेत होता है कि परिवार शोक में है और घर में कोई भी शुभ या उत्सव संबंधी कार्य नहीं हो रहे हैं.

हल्दी का उपयोग दोबारा कब शुरू होता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी व्यक्ति के निधन के बाद 13 दिनों तक सूतक काल रहता है. इस दौरान दिवंगत आत्मा की शांति के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं. तेरहवीं और शुद्धिकरण संस्कार के बाद घर में सामान्य रूप से भोजन बनाना शुरू किया जाता है. परंपरा के अनुसार, जब पहली बार सात्विक भोजन बनाकर ब्राह्मणों या पात्र व्यक्तियों को अर्पित किया जाता है, तभी से रसोई में हल्दी और अन्य मसालों का दोबारा उपयोग शुरू किया जाता है.

शोक के समय सादा और सात्विक की परंपरा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शोक की अवधि में परिवार को मानसिक शांति, संयम और आत्मिक संतुलन बनाए रखना चाहिए. इसलिए इस समय अधिक मसालेदार या स्वादिष्ट भोजन से बचने की सलाह दी जाती है. इसी वजह से हल्दी, मिर्च और अन्य मसालों का प्रयोग सीमित या पूरी तरह वर्जित रखा जाता है. इस दौरान सादा और सात्विक भोजन किया जाता है. माना जाता है कि ऐसा भोजन मन को शांत रखने और शोक की अवस्था में संयम बनाए रखने में मदद करता है.

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Neha Kumari

लेखक के बारे में

By Neha Kumari

प्रभात खबर डिजिटल के जरिए मैंने पत्रकारिता की दुनिया में अपना पहला कदम रखा है. यहां मैं धर्म और राशिफल बीट पर बतौर जूनियर कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रही हूं. इसके अलावा मुझे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विषयों पर लिखने में रुचि है.

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