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Jivitputrika Vrat 2020 Date: आज 32 घंटे से अधिक का निर्जला जिउतिया व्रत करेंगी महिलाएं, जानिए व्रत नियम और पारण करने का शुभ समय...

By Prabhat khabar Digital
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Jivitputrika Vrat 2020 Date
Jivitputrika Vrat 2020 Date

Jivitputrika Vrat 2020 Date: वंश वृद्धि व संतान की लंबी आयु के लिए महिलाएं आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को जिउतिया (जीमूतवाहन) का व्रत रखेंगी. महिलाएं इस बार जिउतिया व्रत आज 10 सितंबर को रखेंगी. 24 घंटे के इस व्रत में व्रती निर्जला और निराहार रहती हैं. सनातन धर्मावलंबियों में इस व्रत का खास महत्व है. जिउतिया व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को रखा जाता है.

जानें तिथि और शुभ मुहूर्त 

इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि 9 सितंबर की रात में 9 बजकर 46 मिनट पर प्रारंभ होगा और 10 सितंबर की रात 10 बजकर 47 मिनट तक रहेगा. 10 सितंबर को अष्टमी में चंद्रोदय का अभाव है, इसी दिन जिउतिया पर्व मनाया जाएगा. व्रत से एक दिन पहले सप्तमी 9 सितंबर की रात महिलाएं नहाय-खाए करेंगी. गंगा सहित अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने के बाद मड़ुआ रोटी, नोनी का साग, कंदा, झिमनी आदि का सेवन करेंगी. व्रती स्नान- भोजन के बाद पितरों की पूजा भी करेंगी.

नहाय-खाय की सभी प्रक्रिया 9 सितंबर की रात 9 बजकर 47 मिनट से पहले ही करना होगा. क्योंकि 9 बजकर 47 मिनट के बाद अष्टमी तिथि शुरू हो जाएगी. सूर्योदय से पहले सरगही-ओठगन करके इस कठिन व्रत का संकल्प लिया जाएगा. जिउतिया व्रत का पारण करने का शुभ समय 11 सितम्बर की सुबह सूर्योदय से लेकर दोपहर 12 बजे तक रहेगा. व्रती महिलाओं को जिउतिया व्रत के अगले दिन 11 सितंबर को 12 बजे से पहले पारण करना होगा.

नहाय खाय

इस दिन जीवित्पुत्रिका व्रत का पहला दिन कहलाता है, इस दिन से व्रत शुरू होता हैं. इस दिन महिलायें नहाने के बाद एक बार भोजन करती हैं. इस व्रत को करते समय केवल सूर्योदय से पहले ही खाया-पिया जाता है. सूर्योदय के बाद आपको कुछ भी खाने-पीने की सख्त मनाही होती है.

इस व्रत से पहले केवल मीठा भोजन ही किया जाता है तीखा भोजन करना अच्छा नहीं होता. इस दिन कई लोग बहुत सी चीजे खाते हैं, लेकिन खासतौर पर इस दिन झोर भात, नोनी का साग एवम मडुआ की रोटी अथवा मडुआ की रोटी दिन के पहले भोजन में ली जाती हैं. फिर दिन भर कुछ नहीं खाती.

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा

जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं. महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी, जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी. उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली.

जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, जिसे निष्फल करना नामुमकिन था. उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी, जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया. गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना. तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं.

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