ब्रह्म ज्ञान के सागर
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :17 Jun 2015 5:17 AM
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लोग भगवान को प्रेम करने में झिझकते हैं. वे सोचते हैं कि उससे हमें कोई वैसा प्रत्युत्तर नहीं मिलता, जैसा कि इन काल्पनिक संसार के प्रेम पात्रों से मिलता है. यही अज्ञान उन्हें भ्रमित किये रहता है. ऐ प्यारे, देखो तो, उसका हृदय राम की श्वास-प्रश्वास के स्वर में तुरंत ही नहीं साथ ही साथ […]
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लोग भगवान को प्रेम करने में झिझकते हैं. वे सोचते हैं कि उससे हमें कोई वैसा प्रत्युत्तर नहीं मिलता, जैसा कि इन काल्पनिक संसार के प्रेम पात्रों से मिलता है. यही अज्ञान उन्हें भ्रमित किये रहता है.
ऐ प्यारे, देखो तो, उसका हृदय राम की श्वास-प्रश्वास के स्वर में तुरंत ही नहीं साथ ही साथ प्रत्युत्तर के रूप में किस प्रकार बराबर गिरता-उठता है. अपने दिखावटी मित्रों और शत्रुओं में उनके व्यवहार का कारण ढूंढ़ने की चेष्टा मत करो. वास्तविक कार्य-कारण तो तुम्हारी वास्तविक आत्मा में प्रतिष्ठित है.
जब चिड़िया उड़ना सीखती है, तो पहले वह एक से दूसरे पत्थर पर, एक डाली से दूसरी डाली पर सहारा लेती है, किंतु सहसा ही वह नभमंडल में उन्मुक्त होकर विचरण नहीं कर पाती. उसी प्रकार ब्रह्म ज्ञान का शिशु किसी एक विशेष पदार्थ से अपनी हार्दिक आसक्ति हटा कर तुरंत किसी दूसरे पर अवलंबित हो जाता है. अनुभवी ब्रह्म ज्ञानी जगत के एक ही पदार्थ की असारता का निश्चय कर लेता है और मार्ग का पत्थर समझ कर उस पर से छलांग मार कर ब्रह्म ज्ञान के सागर में कूद जाता है.
धर्म की कला इसी बात में है कि हम अपने प्रत्येक छोटे से अनुभव को उस अनंत में निमग्न होने का साधन बना लें. बाहरी वस्तुएं सब एक ही सूत्र में पिरोयी हुई हैं. एक वस्तु का बाह्यत: त्याग करते समय ज्ञानी अपने हृदय में उसे अन्य सब कुछ त्यागने का चिह्न् और प्रतीक बना लेता है.
स्वामी रामतीर्थ
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