हीरा बाहर नहीं, भीतर तलाशें

Updated at :15 Jun 2015 12:10 PM
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हीरा बाहर नहीं, भीतर तलाशें

– हरिवंश – लगभग 90 वर्ष पहले ब्रिटिश पत्रकार पॉल ब्रंटन ने भारतीय संतों-योगियों पर गहन अध्ययन किया. आप तो कई ऐसे साधकों के साथ रहे, और बड़े साधक हो गये. भारतीय संतों के बारे में आपका अनुभव कैसा रहा? अध्यात्म और ज्ञान की खोज में मैंने पूरी दुनिया की यात्रा की. मेरी यात्रा भारत […]

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– हरिवंश –

लगभग 90 वर्ष पहले ब्रिटिश पत्रकार पॉल ब्रंटन ने भारतीय संतों-योगियों पर गहन अध्ययन किया. आप तो कई ऐसे साधकों के साथ रहे, और बड़े साधक हो गये. भारतीय संतों के बारे में आपका अनुभव कैसा रहा? अध्यात्म और ज्ञान की खोज में मैंने पूरी दुनिया की यात्रा की. मेरी यात्रा भारत में आकर पूरी हुई. जहां मैं भारतीय संतों और आम लोगों से मिला, जिन्हें अध्यात्म और ईश्वर की गहरी समझ थी.
उन संन्यासियों की अपनी-अपनी परंपराएं हैं. उनमें से हर कोई या कहें कि अधिसंख्य करुणा और संवेदना से भरे हुए हैं. उन्होंने मुझे मां-बाप की तरह स्नेह दिया. उनकी जीवनशैली और उनके बेहतर ज्ञान ने मेरे हृदय को बहुत बदल दिया. मेरे गुरु वैदांतिक स्वामी श्रील प्रभुपाद हैं. उनके मार्गदर्शन और उनकी उपस्थिति में ही मैं अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सका.मौजूदा भारत को देखते हुए क्या आपको लगता है कि भारत अपना आध्यात्मिक पक्ष खो रहा है?
मेरा जो अनुभव है, उस आधार पर यह कह सकता हूं कि खोना और पाना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. लोग अब यथार्थ चीजों की ओर मुड़ रहे हैं. पश्चिम से कई चीजें आ रही हैं. इससे हम सभी खुद को दोराहे पर खड़ा पाते हैं. लेकिन वास्तव में हम उन चीजों को नहीं देख पाते, जिन्हें देखने की जरूरत है. इसे एक बहुत सुंदर उदाहरण से समझा जा सकता है.
हम सभी ने हिमालय में पाये जाने वाले कस्तूरी मृग के बारे में सुना है. उसके पूरे शरीर से एक मोहक सुगंध निकलती है. यह अत्यंत मादक होती है. मन-मस्तिष्क पर छानेवाली. कस्तूरी मृग इस सुगंध की तलाश में इधर-उधर दौड़ता है. वह उस मादक पदार्थ की तलाश में अपने जीवन को दावं पर लगाने से भी बाज नहीं आता. उसका पूरा जीवन कस्तूरी की तलाश में बीतता है. उसकी यह तलाश कभी पूरी नहीं होती. क्योंकि उसे जिस चीज की तलाश है, वह तो उसके भीतर है. भारत के समूचे अध्यात्म का सार यही है. बाहर की तलाश बेकार है.
आत्मा की भी यही स्थिति है. हम सभी के भीतर आत्मा है, जिसके कई नाम हैं. भारत में विज्ञान और संस्कृति की ऐसी समृद्ध परंपरा रही है, जिसके जरिये आप खुद की पहचान कर पाते हैं. दुर्भाग्य यह है कि लोग पश्चिम के विज्ञान-तकनीक की चकाचौंध की तरफ आकर्षित हो रहे हैं. जबकि ज्ञान वह है, जो भीतरी तत्त्व की खोज करता हो. हम हीरे की तलाश कर रहे हैं, जो हमारे भीतर है. पर हम उसे कांच के टूटे हुए टुकड़ों में खोजने की कोशिश करते हैं. मैं देख रहा हूं कि भारत में भी ये चीजें हो रही हैं. अधिक से अधिक भारतीय इस ओर मुड़ रहे हैं.
आज विज्ञान कृत्रिम जीवन की बात करता है. कृत्रिम ज्ञान, बुद्धिमता आदि. क्या जीवन वरदान है या भगवान या प्रकृति की बनायी हुई रचना या साधारण शब्दों में कहें, तो महज इत्तेफाक?
जीवन सबसे बड़ा उपहार है. यह तो सूरज की किरणों के समान है, जो ग्रह से आती हैं. यह तो एक बीज है. इसी तरह हमारा जीवन भी बहुत सुंदर है. हमारी आत्मा भी. आत्मा ने इस शरीर को जीवन दिया है और इस मानव जीवन के महान लक्ष्य हैं. हम कर्म करने के लिए स्वतंत्र होते हैं. हम उन कर्मों को चुनते हैं, जिससे हमारे मन-मस्तिष्क में चेतना का संचार होता है और हम वास्तविक खुशी प्राप्त करते हैं.
हम सभी अपने-अपने तरीके से कर्म करते हैं. चाहे हम पत्रकार हों, स्वामी हों, व्यवसायी हों या किसान, माता, शिक्षक कुछ भी. हम सभी बाहरी दुनिया के प्रलोभन से बंधे होते हैं. तब हम सभी महज शरीर होते हैं. इसलिए कृष्ण ने कहा है कि कर्म से कुछ भी नहीं होता. सभी चीजों के मूल में कारण है.
डार्विन ने कहा था, सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट. संघर्ष करनेवाले ही जीवन की रेस में कामयाब होते हैं. क्या यही जीवन का सच है?
इसे इस रूप में समझ सकते हैं, जीव जीवस्म जीवनम्. हमारे इर्द-गिर्द जो चीजें हैं, वे दरअसल चीजों की उसकी समाप्ति तक बने रहने की कहानी है. बाघ, हिरण को खाते हैं. बड़े जानवर, छोटे जानवरों का शिकार करते हैं. यह पशु जीवन है. कीड़े-मकोड़े का जीवन या मछलियों का जीवन देखें.
बड़ी मछलियां, छोटी मछलियों को खा रही हैं. लेकिन मानव जीवन इन सबसे बहुत ऊपर है. भिन्न है. मानव जीवन का मतलब है, अपने आसपास के लोगों को सम्मान और प्रतिष्ठा देना. अध्यात्मवाद का उद्भव. चेतना का उद्भव. मानवता का उद्भव. लालच से आगे ज्ञान का उद्भव, घृणा से आगे प्रेम का उद्भव. अज्ञानता से आगे ज्ञान का उद्भव. अंधेरे से आगे प्रकाश का उद्भव. यही वास्तविक विकास है. हम मनुष्यों के पास चयन के लिए कई चीजें हैं.
मुझ जैसे साधारण व्यक्ति के लिए कर्म का सिद्धांत बड़ा जटिल है. क्यों अच्छे लोगों के साथ बुरी चीजें होती हैं? कर्म तो उस प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसके तहत हम जानते हैं कि क्रिया-प्रतिक्रिया का अंतरंग संबंध है. यदि आप किसी को चोट पहुंचाते हैं, तो आप भी इस चोट से बच नहीं पायेंगे. वास्तव में यह समझना बहुत आसान है. पर इसकी चर्चा बड़ी व्यापक है. (स्वामी जी ने एक प्रसंग सुनाया. यह संदर्भ, अर्थ साफ करने के लिए) एक उक्ति या उदाहरण से समझें. किसान पहले गांवों में बड़े छोड़ या खाद में (अनाज रखने की मिट्टी के बर्तन या मिट्टी में गड्ढा कर परत-दर-परत अनाज रखने का सिस्टम) अनाज रखते थे. एकतह पर एक अनाज, दूसरे पर दूसरा. इस सीढ़ीनुमा व्यवस्था में ऊपर या नीचे अच्छे-बुरे अनाज दोनों होते थे.
उसे निकालने पर पहले अच्छा अनाज (जो पहले रखा था) निकलता था, फिर पीछे रखा खराब अनाज. इसी तरह अच्छे या बुरे कर्मों का संयोग है. कभी बुरे कर्मों का परिणाम, तो कभी अच्छे कर्मों का परिणाम. यह संसार की रीति है. हां! भक्ति, कर्म के आगे (बियांड) है. अध्यात्म ही अनंत, शाश्वत व अनादि है. नित्य और निरंतर. अपरिवर्तनीय. आत्मा के साथ भी यही स्थिति है. जब हम आत्मा को इस बेहतरीन शरीर के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो हमारी समझ काफी गहरी होती है. जैसे हमारे पास एक रेखा है. मैं एक बिंदु बनाता हूं. किसी रेखा की शुरुआत कई बिंदुओं के बनने से होती है. यदि मैं सोचता हूं कि ये बिंदु ही सब कुछ हैं, तो मुझे दूसरे भिन्न-भिन्न आकारों को भी खींचना होगा. आत्मा भी इसी तरह है और हमलोग भी इस रेखा की तरह हैं.
आत्मा उस रेखा की तरह है, जो कभी खत्म नहीं होती. (यहां स्वामी जी ने कागज पर आकृति बना कर इसे और अच्छी तरह से प्रस्तुत किया). आप जीवन को यहां देख सकते हैं. हमलोग उस पूरी रेखा में हैं. हमलोग जब जीवन को इस परिदृश्य में देखते हैं, तो पाते हैं कि हम इस आध्यात्मिक संसार में ईश्वर के लिए, कृष्ण के लिए जन्म ले रहे हैं. हमें बस इस सुंदर जीवन को देखना होता है. (जो पहला बिंदु मैंने बनाया था). लोगों के साथ घट रही चीजों का नाम ही जीवन है. हम इसे अपने ज्ञान से समझ सकते हैं. पर एक निश्चित दौर या कालक्रम में अच्छे लोगों के साथ अच्छी चीजें घटित होती ही हैं.
‘70 के दशक में जब आपकी पीढ़ी ने पैसा, पावर और पूर्वग्रह के खिलाफ पश्चिम में विद्रोह किया, जैसा कि आपकी पुस्तक में है, तब से लेकर आज तक दुनिया में किस तरह अध्यात्म का फैलाव हुआ है? आज भी पैसा, पावर और पूर्वग्रह का आधिपत्य है. लेकिन कोई विद्रोह नहीं है. आज आपके जैसे लोग नहीं दिख रहे हैं?
मुझे लगता है कि लोग अपने तक सिमटे हुए हैं. अज्ञानता से घिरे हुए हैं. लोग हमेशा बेहतर अनुभव की चाह में आगे बढ़ते हैं. यथास्थिति या हालात के खिलाफ खड़े होते रहे हैं. विद्रोह करते रहे हैं. जब 1950 के दशक में मेरा जन्म हुआ, तब टेलीविजन का आविष्कार हो चुका था.
ब्लैक एंड व्हाइट टय़ूब्स. टेलीफोन (तारवाले). उस समय के लोगों के लिए हवाई जहाज बड़ी चीज थी. आज विज्ञान और तकनीक बहुत एडवांस हो गये हैं. हम प्राय: नयी तकनीकों के बारे में सुनते हैं. लेकिन साथ ही नयी बीमारियों, अपराध, आतंकवाद, आत्महत्या आदि की खबरें आती हैं. कई सारे ऐसे नये शब्द हैं. पर मैं यह बताना चाहता हूं कि वास्तविक आविष्कार तो हमारे शरीर के भीतर ही है. सच्चाई यह है कि आंतरिक विकास तो दुर्लभ है. दरअसल, मानव मूल्यों का विकास ही अध्यात्म की बुनियाद है. यदि हम अपने शिक्षा तंत्र, विज्ञान-तकनीक आदि को इस रूप में तैयार कर सकें कि ये मानव के आध्यात्मिक मूल्यों का आधार तैयार कर सकें, तो इस प्रकार समूचे मानव जाति के विकास के लिए यह प्रयास बड़ा प्रभावकारी होगा. दुर्भाग्य से इसी चीज का दुनिया में अभाव है. विकास या प्रगति की नींव आध्यात्मिक आधार या मूल्यों पर हो, तो बात बनेगी.
व्यक्तिगत रूप से आपसे मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है. आपकी अमर कृति ‘द जर्नी होम’ ने समाज में बड़ा योगदान दिया है. यह किताब दिल और आत्मा को छूती है. यह निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. इसे पढ़ने के बाद व्यक्ति, जीवन, उसके मंतव्य, उद्देश्य, लक्ष्य आदि के बारे में सोचने-विचारने को विवश हो जाता है. लेकिन मुझ जैसे, गृहस्थ व्यक्ति के लिए जीवन में मुक्ति को किस रूप में लेना चाहिए?
श्री चैतन्य कहते हैं कि आप चाहें गृहस्थ हों, ब्रह्मचारी हों, संन्यासी हों या फिर शिक्षक, राजनीतिज्ञ, व्यवसायी, उद्योगपति या आम आदमी हों या जो भी आपका पेशा हो, समाज में जो भी स्थान हो, वस्तुत: पूरी व्यवस्था इवोल्यूशन या ज्ञान की ओर सक्रिय है. आपका किसी भी पेशे से ताल्लुक हो, लेकिन आप समाज के प्रति, व्यक्ति के प्रति, संस्था के प्रति पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ काम करते हैं, तो यही इवोल्यूशन है. यही बोध है. आप किसी संगठन या कंपनी में काम करते हैं और उसे अपना मानते हैं, आप समझते हैं कि यही मेरा परिवार है और आप इस परिवार की देखभाल करने की भूमिका में हैं, यह भगवान का काम है.
तब कृष्ण की भी आप पर कृपा रहेगी. अपने परिवार की देखभाल और संपोषण करना ही सनातन धर्म है. यह अपने काम को बेहतर तरीके से पूरा करने की कला है. यह आपका प्रोफेशन है. यही बोध है. आपके अंदर सेवा का बोध होता है. दूसरों के लिए कुछ करने का बोध. वस्तुत: चेतना का संचार ही बोध का सार है. आपके भीतर सेवा का भाव होना चाहिए. यह कलियुग एक ऐसा महासागर है, जिसमें लोग गिरते चले जाते हैं. पर ऊपर उठने और परम सत्ता का आशीर्वाद लेने का मार्ग है, कृष्ण नाम का स्मरण. (यहां स्वामी जी ने बांग्ला भाषा में एक गीत गाया, बहुत सुंदर शब्दों में, पर यह स्पष्ट नहीं सुनायी दे रहा है).
आप चाहें, गृहस्थ हों या स्वामी, क्या फर्क पड़ता है? हर कोई, जो बोध चाहता है, ज्ञान के मार्ग पर चलना चाहता है, वह हरिनाम ले. हरिनाम लेने से आप वैसी खुशी से दूर होंगे, जो क्षणभंगुर है. आप उस ओर मुड़ेंगे, जहां अनंत खुशी है. सभी अपने भीतर की मिठास और स्वाद चख सकेंगे. यही सही मायनों में मुक्ति है.
42 वर्षों पहले आपके मित्र गैरी ने एक बार आपसे पूछा था (संभवत: इटली में) कि आप इस बारे में क्या राय रखते हैं कि जीवन में सभी चीजों के पीछे कुछ कारण हैं? यहां तक कि छोटी-छोटी घटनाएं भी आपके जीवन में पूर्व निर्धारित हैं, आज इतने वर्षों बाद, क्या अनुभव करते हैं?
हर चीज के पीछे कारण है. हर परिस्थिति बनने के पीछे कारण इसलिए है कि आप सीख सकें. विकसित-प्रस्फुटित हो सकें. आगे बढ़ सकें. उन चीजों की ओर मुड़ सकें, जो आपको बेहतर दिशा में ले जा सके. किसी भी चीज के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारण होता है. ज्ञान-बोध की दिशा में बढ़ना, भक्ति मार्ग पर चलना, विनम्र होना, भक्ति का उदय, यही संदेश है.
जब मेरी ‘द जर्नी होम’ की शुरुआत हुई, तब मैं यह जानने-समझने की कोशिश कर रहा था कि ये चीजें मेरे साथ ही क्यों हो रही हैं? तब मैंने पाया कि यह ईश्वर के साथ मेरे जुड़ाव के कारण है. कारण यह था कि मैं ईश्वर की तरफ झुक रहा था. आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं, तो पाता हूं कि सारी परिस्थितियां इस तरह बनीं कि मैं ईश्वर की ओर खिंचता चला जाऊं. इसलिए यह जो संसार बना है, उसका कारण यह है कि आप अनंत खुशी की तलाश कर सकें, जो आपको ईश्वर की भक्ति, उसके प्रति निष्ठा से मिल सकती है.
जब आप अपने भीतर मन की आंखों से देखेंगे, तो आप उस अतिरेक आनंद की अनुभूति कर सकेंगे. उस दर्द और पीड़ा की संवेदना को भी जान पायेंगे. जन्म-मृत्यु के भेद को जान पायेंगे. महत्वपूर्ण यह है कि यह आपको चीजों के चयन में मदद करे.
हर कदम पर हम सीखने के दौर से गुजरते हैं. बाइबल कहता है कि सकारात्मक चीजों की तलाश हमें बेहतर दिशा में ले जाती है. हम हर परिस्थिति में एक अवसर प्राप्त करते हैं, वह अवसर है, ईश्वर के साथ एकबद्ध होने का. यहां तक कि जब हमारा पूरा शरीर भी साथ न दे रहा हो, तब भी हम ईश्वर के साथ जुड़ सकते हैं. आप इस अवसर का इस्तेमाल आगे बढ़ने के लिए कर सकते हैं या फिर नीचे गिरने के लिए.
जानी-अनजानी चीजों से भय, सुरक्षा, भविष्य व परिवार के भरण-पोषण की चिंता, ये सब चीजें एक आम व्यक्ति की गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं. इन चीजों से कैसे छुटकारा संभव है?
मैं आपको फाउंडेशन (नींव) के एक उदाहरण से बताना चाहता हूं कि इसका (फाउंडेशन) महत्व क्या है. यदि किसी इमारत की नींव कमजोर होगी, वह बालू या रेत पर आधारित होगी, तो इमारत का गिरना तय है. यदि लोगों की बुनियाद (फाउंडेशन) मजबूत होगी, तो कोई भी तूफान उसे उसकी नींव या बुनियाद पर चोट नहीं कर सकेगा. वह मुश्किल परिस्थितियों में भी डट कर खड़ा रह सकेगा.
चाहे परिस्थितियां उसके अनुकूल हों या फिर विपरीत. यह फाउंडेशन तैयार होता है, सत्संग से, सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वहन से, साधना से, आध्यात्मिक क्रिया-कलापों से, भगवद्गीता के बताये मार्ग पर चलने से, संतों-भक्तों के साहचर्य से, ध्यान से, ईश्वर के नाम का स्मरण (जाप) करने से. ये कुछ रास्ते हैं, जिस पर चल कर व्यक्ति अपने जीवन की बुनियाद को मजबूत कर सकता है. अपने जीवन के आध्यात्मिक पक्ष को उभार सकता है. बिना जुनून के आप ऐसा नहीं कर सकते हैं. इस तरह आप स्वार्थ की भावना से ऊपर उठ जायेंगे. सांसारिक बंधनों का जो जाल है, वह आप पर कभी हावी नहीं होगा. मजबूत बुनियाद (फाउंडेशन) स्वत: नहीं आती. इसे हमें प्राप्त करना होता है.
यह हम तभी प्राप्त करते हैं, जब हमारा चयन सही होता है. नियमित आध्यात्मिक गतिविधियां, ध्यान, कीर्तन, सत्संग, ईश्वर के नाम का जाप, जब हम अपने जीवन में गंभीरता से इन्हें उतारते हैं, तो हमारी नींव मजबूत होते जाती है. ऐसा होने पर हम आध्यात्मिक ऊंचाई का अनुभव करते हैं, जो हमारी आत्मा को ओत-प्रोत (इटरनिटी ऑफ द सोल) करते हैं और यह अनुभव ही आपको वह मजबूती प्रदान करता है, ताकि किसी भी स्थिति में आप खड़े रह सकें. आज के संदर्भ में इनसान ठीक इसके विपरीत है. ऐसी स्थिति में नींव कमजोर हो सकती है. हमें यह जानना-समझना होगा कि अध्यात्म के बल हम अपने फाउंडेशन को मजबूत कर सकते हैं. मन पर नियंत्रण के रास्ते क्या हैं? मन तो बड़ा चंचल है?
हां, इस रास्ते मन पर नियंत्रण भी किया जा सकता है. बशर्ते मन को थोड़ी खुराक दी जाये. यदि आप किसी बच्चे को दवा खाने को दें और दूसरे बच्चे को प्रसाद दें, तो निश्चित रूप से दूसरा बच्चा प्रसाद खाने में दिलचस्पी दिखायेगा. इसी तरह दर्शन, अध्यात्म, सत्संग, पवित्र नामों का उच्चरण आपके मन-मस्तिष्क को संतुष्टि देते हैं. आपको बोध (एनलाइटनमेंट) का एहसास कराते हैं. मन पर नियंत्रण पाना बहुत कठिन है. पर यह पाया जा सकता है, जब आपके हृदय में ईश्वर के प्रति नि:स्वार्थ प्रेम बसा हो. साधना-सत्संग, आंतरिक मूल्य ही सब कुछ हैं.
पांच हजार सालों से भारतीय सभ्यता फल-फूल रही है, कैसे और क्यों? क्या इसके सरवाइवल (टिकने) में आध्यात्मिक तत्वों ने अधिक भूमिका निभायी है? आप इतिहास देख सकते हैं. भारत में सदियों से ऋषियों, महात्माओं में ज्ञान की परंपरा रही है. भारत की असल ताकत यही रही है. यहां कई विदेशी शासकों का आधिपत्य रहा. दो सौ सालों तक ब्रिटिश साम्राज्य रहा. एक बार मेरे गुरु श्रील प्रभुपाद लंदन में थे. उनसे किसी ने पूछा कि आप भारत से यहां क्यों आये हैं? प्रभुपाद जी ने कहा कि आप अंगरेज लोग भारत में दो सौ साल तक रहे.
आपने भारत से सारी बेशकीमती चीजें लेकर लंदन भेज दीं. जो भी चीज आपके उपयोग लायक थी, आपने उसे छीन लिया. लेकिन भारत में जो सबसे कीमती चीज थी, आध्यात्मिक तत्व, उसे ले जाना आप भूल गये.
उन्होंने कहा कि आप इसे ले जाना भूल गये थे, इसलिए मैं यही देने लंदन आया हूं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के लोग अपने आध्यात्मिक मूल्यों के बारे में जानते हैं, समझते हैं. एक चीज हमें जानना-समझना या याद रखना चाहिए कि चाहे पूरी दुनिया हो या भारत के लोग, आप पश्चिम के अर्थशास्त्र का अनुसरण करें, तकनीक का इस्तेमाल करें, जो भी चीजें नये आविष्कार से पैदा हुई हैं, उनका इस्तेमाल करें, पर आपको अपने फाउंडेशन (नींव) को नहीं भूलना चाहिए. मूल्य, धर्म ही तो भारत की धरोहर या नींव हैं. भारत पूरी दुनिया में इस परिप्रेक्ष्य में बहुमूल्य योगदान दे सकता है. आज पूरी दुनिया में भारत के लोगों ने अपनी छाप छोड़ी है.
सॉफ्टवेयर इंजीनियर, डॉक्टर, उद्योगपति, राजनीतिज्ञों ने अपनी पहचान बनायी है. उन्होंने बड़े ओहदे हासिल किये हैं, अपनी प्रतिभा के बलबूते. जैसा कि पहले कभी नहीं हुआ था. इस भारतीय प्रतिभा की नींव में भारत के सनातन मूल्य रहे, यह आज दुनिया की जरूरत है. भारत के पास उसकी वास्तविक शक्ति या ताकत अध्यात्म है. पूरे विश्व को आज इसकी जरूरत है. अविलंब. भारत के पास तो इसका खजाना है. इस खजाने को पूरी दुनिया में लुटाया जाना चाहिए. चैतन्य कहते हैं कि यदि आपका जन्म भारत में हुआ है, तो आपकी सबसे बड़ी जिम्मेवारी है कि आप अपनी संस्कृति को समझें और पूरी दुनिया के साथ इसे साझा करें.
स्वामी जी, आपने कई बार मौत का सामना किया है या मौत बार-बार आपको छू कर निकल गयी. इस्तांबुल में जानलेवा हमला, इलाहाबाद में तैरते समय डूबते-डूबते बच जाना, नेपाल में कुत्तों के हमले के समय और कई दूसरे मौकों पर भी आप बच निकले. क्या यह प्रार्थना का प्रभाव या चमत्कार था?
हां, ये सब चीजें हुई थीं. मेरे पास कोई विशेष शक्ति नहीं थी. मेरे पास कोई प्रभावी शारीरिक बल नहीं था. मेरी बुद्धिमता तीक्ष्ण नहीं थी. मेरे पास बस ईश्वर का आशीर्वाद था. जब आपके पास ईश्वर का आशीर्वाद हो, तो आप किसी भी परिस्थिति में रहें, उससे उबर सकते हैं.
हमारे निजी जीवन में बहुत सारी समस्याएं हैं, जिनका हम सब सामना करते हैं. आप हमें कौन-सा रास्ता बताना चाहेंगे? हमारे लिए क्या संदेश है, जिससे हम भी जीवन का मर्म जान सकें? मुक्ति पा सकें?
आप पहले से ही इन लोगों को जानते हैं. उनके प्रवचनों को सुनें. गीता के उपदेशों का अनुसरण करें. ईश्वर को महसूस करें, उनके प्रति अपने प्रेम को मन में बसायें. स्वामी जी संस्कृत में एक मोहक -सुंदर मंत्र का उच्चारण करते हुए बातचीत खत्म करते हैं.
दिनांक : 16.03.13
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