अलौकिक, पर सच!

Updated at :15 Jun 2015 12:05 PM
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अलौकिक, पर सच!

-हरिवंश- मौनी अमावस्या के दिन कुंभ स्नान न भूलनेवाली स्मृति है. एक शहर में एक साथ तकरीबन तीन करोड़ लोग. बिना बुलाये. यह कौन-सी प्रेरणा है, जो लोगों को यहां पहुंचाती है? याद आयी शंकर दा (शंकर राय) की बात. वह मेरे प्रिय हैं या मैं उनका प्रिय हूं या दोनों हैं, नहीं पता. पर […]

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-हरिवंश-

मौनी अमावस्या के दिन कुंभ स्नान न भूलनेवाली स्मृति है. एक शहर में एक साथ तकरीबन तीन करोड़ लोग. बिना बुलाये. यह कौन-सी प्रेरणा है, जो लोगों को यहां पहुंचाती है? याद आयी शंकर दा (शंकर राय) की बात. वह मेरे प्रिय हैं या मैं उनका प्रिय हूं या दोनों हैं, नहीं पता. पर उनका सात्विक स्नेह है.
जब भी हम दोनों मिले, तो निजी बातें नहीं हुईं. सिर्फ सार्वजनिक, सामाजिक, अध्यात्मिक, तप, त्याग, सादगी, सात्विकता या जीने की राह पर. एक बार उन्होंने कहा, मनुष्य के जीने की सबसे प्रेरक शक्ति (ड्राइविंग फोर्स) क्या है? मार्क्‍स ने माना कि मनुष्य के जीवन की सबसे प्रेरक ताकत पैसा है. सिग्मंड फ्रायड सहमत नहीं हुए. उन्होंने कहा, नहीं, मनुष्य के जीवन का सबसे प्रेरक तत्व है, सेक्स. यह हमारी सारी गतिविधियों को नियंत्रित करता है.
बट्रेड रसेल एक कदम और आगे बढ़े. उन्होंने फरमाया, अपनी-अपनी जगह दोनों ठीक हैं. मार्क्‍स भी, फ्रायड भी. पर इन दोनों से ऊपर भी एक शक्ति और ताकत है, वह है, पावर (सत्ता). हमारे यहां भी कहा गया है, सत्ता मद सबसे भारी होता है. अगर सत्ता यानी पावर है, तो फिर सेक्स और पैसा दोनों उपलब्ध हैं. मौजूदा भारतीय समाज के चरित्र को समझने के लिए इससे प्रासंगिक कोई दूसरी अवधारणा नहीं.
ये तीनों चीजें- पैसा, सेक्स और सत्ता जीवन के प्रेरक तत्व हैं. ड्राइविंग फोर्स या जीवन संचालन के इंजन. पर भारतीय मनीषी कह गये हैं कि भौतिक जीवन का अल्टीमेट हाइट (चरम उत्कर्ष) है, अध्यात्म. भारतीय अध्यात्म मानता है कि ये तीन चीजें ‘इनफीरियर क्वालिटी एचीवमेंट’ (घटिया दर्जे की उपलब्धियां) हैं. इससे ऊपर जाने के लिए आपको भौतिक जगत छोड़ना होगा.
अध्यात्मिक जगत में प्रवेश करना होगा. भारतीय अध्यात्म में इस आनंद की अलग-अलग कल्पनाएं हैं. तुरीयानंद, दिव्यानंद, ब्रह्मनंद आदि. अलग-अलग ऊंचाई. इसका मूल मंत्र त्याग है. भौतिक संसार से मन का टूटना है. राम, कृष्ण, बुद्ध से लेकर गांधी तक की परंपरा. यह अध्यात्म की ताकत है.
कुंभ जैसे आयोजनों के पीछे अध्यात्म की यही पृष्ठभूमि है. कुंभ तो प्रतीक है, मूल आनंद का उत्स जानने के क्रम का एक रिचुअल (कर्मकांड). साधुओं के दर्शन के लिए कड़कड़ाती ठंड में रात-रात भर बैठे लोग. पांच-दस लाख की संख्या में नहीं. इससे कई गुना अधिक. साधु और संत भी इसी त्याग परंपरा पर चलनेवाले लोग रहे हैं. सब कुछ छोड़ कर समाज को राह दिखानेवाले. जनसामान्य को मुक्ति और आनंद की नयी सीढ़ी दिखानेवाले. पर वैसे सही संत आज कितने हैं?
इस बार कुंभ में दस लाख से अधिक विदेशी आये. इस संत परंपरा को देखने, समझने और सीखने. अनेक ने संन्यास लिया, जीवन में परमानंद पाने के लिए. पश्चिमी ‘परमानंद’ की गति चाहता है. पर हम ‘पैसा, सेक्स और पावर’ के पीछे पागल हैं. इन्हें ठुकरा कर पश्चिम के लोग साधना और तप के लिए जिस कठोर राह पर चल कर अध्यात्मिक ऊंचाई पर पहुंच रहे हैं, वह अविश्वसनीय है. इसी संदर्भ में कुंभ आकर स्वामी राधानाथ जी की याद आयी.
दिनांक : 23.02.13
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