संघर्ष के घाव

आकाश के युग्म नक्षत्र को यदि पास से देखा जाये, तो बीच के व्यवधान उन्हें अलग कर देते हैं; लेकिन नक्षत्रों का जोड़ा दूर से स्पष्ट दिखायी देता है. राष्ट्रीय इतिहास के आकाश में भी इस तरह के अनेक युग्म नक्षत्र हैं. काल-व्यवधान की दृष्टि से देखने पर उनका ऐक्य ओझल हो जाता है, लेकिन […]
आकाश के युग्म नक्षत्र को यदि पास से देखा जाये, तो बीच के व्यवधान उन्हें अलग कर देते हैं; लेकिन नक्षत्रों का जोड़ा दूर से स्पष्ट दिखायी देता है. राष्ट्रीय इतिहास के आकाश में भी इस तरह के अनेक युग्म नक्षत्र हैं.
काल-व्यवधान की दृष्टि से देखने पर उनका ऐक्य ओझल हो जाता है, लेकिन एक आंतरिक योग का आकर्षण उन्हें मिलाये रखता है. इसलिए जनक-विश्वामित्र-रामचंद्र में काल का योग न होते हुए भी भाव का योग हो, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है.
भागवत-इतिहास में व्यक्ति धीरे-धीरे भाव का स्थान ग्रहण करता है. ब्रिटिश पुराण कथा में राजा ऑर्थर ऐसे ही व्यक्ति हैं. राष्ट्रीय चित्त में उन्होंने व्यक्ति-रूप त्याग कर भाव-रूप धारण किया है. वैसे ही जनक और विश्वामित्र आर्य इतिहास से उत्पन्न एक विशेष भाव के प्रतीक बन गये हैं. मध्ययुगीन यूरोप में क्षत्रियों के सामने जो एक विशेष आदर्श था, उसी से प्रेरित होकर राजा ऑर्थर प्रतिपक्ष के विरुद्ध लड़ते हैं.
भारतीय इतिहास में दीर्घकाल तक किये गये उस घोर संग्राम का आभास मिलता है, जिसके लिए क्षत्रियों को धर्माचरण के विशेष आदर्श ने प्रोत्साहित किया था.
इस संग्राम में ब्राह्मण ही उनके मुख्य विरोधी थे, इस बात का प्रमाण है. जय-पराजय के बाद जब सभी पक्षों में समझौता हो गया तब समाज के बीच विरोध के विषय पृथक नहीं रहे. संघर्ष के घाव जल्द भर जायें, यही सभी करने लगे.
रबींद्रनाथ टैगोर
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