साधना, संकल्प और नियति!

Updated at :13 Jun 2015 12:02 PM
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साधना, संकल्प और नियति!

– हरिवंश – संदर्भ : कलाम की नयी पुस्तक ‘माइ जर्नी- ट्रांसफार्मिंग ड्रीम्स इंटू एक्शंस’ कलाम की यह नयी पुस्तक उन एक करोड़ साठ लाख बच्चों को समर्पित है, जिनसे वह पिछले दो दशकों में मिले हैं. बातचीत की है. पर यह पुस्तक महज छात्रों या युवाओं के लिए ही नहीं है. लगभग डेढ़ सौ […]

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– हरिवंश –

संदर्भ : कलाम की नयी पुस्तक ‘माइ जर्नी- ट्रांसफार्मिंग ड्रीम्स इंटू एक्शंस’

कलाम की यह नयी पुस्तक उन एक करोड़ साठ लाख बच्चों को समर्पित है, जिनसे वह पिछले दो दशकों में मिले हैं. बातचीत की है. पर यह पुस्तक महज छात्रों या युवाओं के लिए ही नहीं है. लगभग डेढ़ सौ पेजों की यह किताब (कीमत 195 रुपये, रूपा प्रकाशन) हर एक इनसान के लिए अनिवार्य है. खासतौर से आज के भारत में, जहां आस्था या उम्मीद के बिंदु सार्वजनिक जीवन या समाज से लगभग गायब हैं. सत्ता में बैठे लोग, कुछ भी करने पर आमादा हैं. बेधड़क. निर्ल्लज हो कर. सार्वजनिक जीवन में कोई लोकलाज या शर्म बची नहीं. कोयला घोटाले की जांच होती है, तो कहते हैं, फाइल चोरी चली गयी. संबंधित अफसरों से पूछताछ की बारी आती है, तो कहते हैं प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरों से पूछताछ कैसे हो सकती है? मूल्य, सिद्धांत, नीति, आदर्श या विचार, आज सबसे बुरी स्थिति में हैं.

पतन के धरातल से भी नीचे जाने के लिए अग्रसर. दूसरी तरफ बाजार की ताकतें हैं, जहां सिर्फ स्पर्द्धा है. पैसे की कीमत है. अरबपति या महाअरबपति अपराधियों की पूजा-आरती होती है. उस व्यवस्था में जीने के स्रोत ढूंढ़ना चुनौती है. खासतौर से सही लोगों के लिए. कलाम की इस पुस्तक में अनेक प्रसंग हैं, जो अध्यापकों से लेकर अध्यात्म से जुड़े हैं, पर जीने की ताकत देते हैं. महज दो प्रसंग जान लें. तीन दिन पहले ही शिक्षक दिवस गुजरा है. इस अवसर के लिए कलाम का उदाहरण अत्यंत सामयिक और सटीक है.

अध्यापकों और बच्चों, दोनों के लिए. कलाम अत्यंत गरीब घर के थे. पढ़ने में प्रतिभाशाली थे. परिवार और समाज से संस्कार-मूल्य मिले थे. छात्रवृत्ति पाकर वह मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलोजी (अब आइआइटी) पहुंचे थे. एरोनाटिक्स के विद्यार्थी थे. तब वहां डिजाइन के अध्यापक थे, प्रोफेसर श्रीनिवासन. एक बार उन्होंने छात्रों को काम सौंपा. चार-चार छात्रों का एक समूह बना कर. कलाम जिस समूह में थे, उस समूह को जिम्मेदारी मिली ‘लो लेवल अटैक एयरक्राफ्ट’ (कम ऊंचाई पर मारक युद्ध विमान) डिजाइन करने की. यह एयरो-डायनमिक डिजाइन था. इन चारों बच्चों के समूह (जिसमें कलाम भी थे) ने दिन-रात लग कर यह डिजाइन बनाया. जिस दिन प्रोफेसर श्रीनिवासन देखने आये, बच्चों का समूह सांस रोक कर प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करता रहा. खासतौर से कलाम.

यह भविष्य से जुड़ा परीक्षण था. अंदर गहमागहमी, बेचैनी व प्रतीक्षा थी. अपने डिजाइन के बारे में प्रोफेसर श्रीनिवासन की राय सुनने की. श्रीनिवासन ने शांत, आहिस्ता और साफ शब्दों में कहा, दिस इज जस्ट नाट गुड इनफ कलाम (कलाम, यह अच्छा है ही नहीं). फिर श्रीनिवासन ने कहा, जिसका अर्थ था, यह निराश करनेवाला काम है. मैं निराश हुआ. खासतौर से इस बात से कि तुम्हारी प्रतिभा का कोई छात्र इस स्तर का काम करे. कलाम स्तब्ध खड़े थे. काटो तो खून नहीं. पूरा भविष्य और सामने का संसार बिखरा हुआ दावं पर दिखाई दे रहा था.

श्रीनिवासन ने एक और मौका दिया. रिडिजाइन करने का. महज तीन दिन का समय. वह शुक्रवार को दोपहर में कह रहे थे कि मैं सोमवार शाम तक फ्लॉलेस कन्फिग्रेशन ड्राइंग (त्रुटिरहित डिजाइन) देखना चाहूंगा. श्रीनिवासन ने कलाम से खासतौर पर कहा, अगर तुम इसमें भी विफल रहे, तो तुम्हारी स्कालरशिप बंद हो जायेगी. कलाम को लगा, उनका संसार उनकी आंखों के सामने टूट रहा है. लगा, सामने कोई रास्ता नहीं. पर उसी क्षण उनके मन में निश्चय की बिजली भी कौंधी कि नहीं, मुझे खुद को साबित करना है. शाम हो चुकी थी.

कलाम ने हल्का खाना खाया. पूरी रात ड्राइंग बोर्ड से चिपके रहे. कलाम ने लिखा है, आइ वाज वर्किंग लाइक ए मैन पोजेस्ड (मैं ऐसे काम कर रहा था, जैसे किसी के वश में हूं). सुबह फ्रेश हुआ. हल्का नाश्ता किया. फिर काम पर. रविवार शाम तक वह काम में ही डूबे रहे. बिना सोये. अनथक, अनिद्रा, खाने की सुध-बुध भूल कर. काम लगभग खत्म हो चुका था. उन्हीं के शब्दो में नये संशोधित डिजाइन को फाइनल टच (अंतिम रूप) दे रहा था, तभी लगा कि कमरे में कोई मौजूद है. देखा, तो प्रो श्रीनिवासन खड़े थे. टेनिस खेलने के कपड़े पहने. वह कितनी देर से खड़े थे, इसका पता नहीं. नजरें मिलीं, श्रीनिवासन पास आये, मुस्कुराये और मुझे गले लगा लिया. फिर कहा, मुझे मालूम था.

मैं तुम्हें मैक्सिमम प्रेशर (अधिकतम दबाव) में डाल रहा हूं. जब मैंने तुम्हारे पहले डिजाइन को अस्वीकृत किया. तुम्हारे सामने एक इंपासिबुल डेडलाइन (असंभव समयसीमा) तय की. फिर भी तुमने काम कर लिया. इस नये डिजाइन के लिए महज एक शब्द कहूंगा, आउटस्टैंडिंग (अत्यंत उम्दा). तुम्हारे शिक्षक के रूप में मुझे, तुम्हें उस सीमा तक पहुंचाना था, जहां तुम्हें खुद अपनी क्षमता का एहसास हो सके. यह मैंने किया.

यह मामूली घटना अद्भुत है. शिक्षकों और छात्रों के बीच कैसा रिश्ता था? आज की राजनीति ने इस रिश्ते के बीच में जाति, धर्म वगैरह को खड़ा कर दिया है. अब अभिभावक भी अपने बच्चों की भूलों या गलतियों पर निगाह नहीं डालते. वे अध्यापकों के पीछे पड़ते हैं.

अगर अध्यापन के संसार में श्रीनिवासन जैसे लोग समाज में बढ़ेंगे, तो छात्रों में कलामों की संख्या बढ़ेगी. अन्यथा इन दिनों किस तरह के छात्रों की संख्या बढ़ रही है. इसका एक नमूना जान लीजिए. टाइम्स ऑफ इंडिया (पटना – 06.09.2013) की लीड खबर है, जुवेनाइल किलर रिलीज्ड, थ्रीटेन विक्टिम सिस्टर (बच्ची से रेप के बाद उसकी हत्या करनेवाला किशोर अपराधी जेल से छूटा, अब वह उस बच्ची की बहन को धमका रहा है). यह घटना भी दिल्ली की है. रोहिणी (दिल्ली) में छह साल की एक बच्ची के साथ पड़ोस के ही एक बच्चे ने रेप किया. फिर उसे टुकड़े-टुकड़े काट दिया. निचली अदालत ने उसे रेप और हत्या के लिए मौत की सजा दी. हाइकोर्ट ने 2007 में आरोपी की उम्र कम देख कर सजा कम कर दी.

पांच वर्ष जेल में रह कर वह बाहर आ गया है. पड़ोस में रहनेवाले उस परिवार के घर जाकर उसने खुलेआम धमकी दी है कि अब लड़की की बड़ी बहन के साथ भी वही घटना दोहराऊंगा. पूरा परिवार भयग्रस्त है. घर में कैद. पुलिस प्रशासन-व्यवस्था सब देख रहे हैं. कम उम्र के अपराधी बच्चों के अधिकार के लिए फैशनेबुल ह्यूमन राइट्स के हिमायती भी यह सब देख रहे हैं. इन कथित मानवाधिकार प्रेमियों से कोई पूछे कि आपके घर में ऐसा हो, तो आप क्या करेंगे? यह वैसा ही मामला है, जैसा आतंकवाद का प्रसंग है.

आतंकवाद या दंगों में मारे तो निर्दोष जाते हैं, ऊपर बैठे नेताओं या शासकों के घर का कोई नहीं मारा जाता. एकाध अपवाद हो सकते हैं. कैसे रुकेंगे ये अपराध या आतंकवाद या दंगे, जब राजनीति या प्रभावी लोग ही समाज में फर्क उत्पन्न या मनभेद करें, राजनीति, सिर्फ सत्ता और गद्दी के लिए? बहरहाल यह विषयांतर है.

कलाम की ही पुस्तक के दूसरे प्रसंग पर लौटें. पहला प्रसंग तो छात्रों के लिए भी बहुत कुछ कहता है. विपरीत परिस्थितियों में छात्रों के बीच कैसा धैर्य चाहिए? तप, ध्यान, तपस्या, साधना से ही पढ़ाई या ज्ञान अर्जन संभव है. कैसे कलाम ने दो रात तक रिडिजाइन करने के लिए सब कुछ भुला दिया. पर तत्काल रिजल्ट चाहनेवाली यह पीढ़ी इससे सबक लेगी?

दूसरी घटना भी मन को स्पर्श करती है. विफलता या असफलता से उकताए लोग, जो बात-बात में आत्महत्या, तलाक, हिंसा या अन्य वारदात के रास्ते पर चले जाते हैं, उनके लिए कलाम का यह अनुभव प्रेरक और जीवन मोड़नेवाली घटना है. कलाम के जीवन का सपना था, उड़ान में कैरियर बनाने का. देहरादून से एयरफोर्स ने उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया. उत्तर की उनकी यह पहली यात्रा थी. आत्मविश्वास था, चयन निश्चित होगा. इंटरव्यू भी अच्छा हुआ. कलाम ने उल्लेख किया है, मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ सामने रखा था (आइ गेव इट माइ बेस्ट). 25 सफल लोगों की सूची निकली, उनमें कलाम नौवें स्थान पर थे. महज आठ लोगों का ही चयन होना था. सूची देखते ही कलाम स्तब्ध. यह जीवन का सबसे बड़ा झटका था. कलाम ने लिखा है कि एयरफोर्स में पायलट बनने के अपने सपने को पूरा करने में मैं फेल हो चुका था.

उन्हें अब भी याद है कि वह सूची देख कर उनके दिल में कैसी पीड़ा या कसक हुई थी? वह कहते हैं कि जब आपका सबसे प्रिय सपना टूटने लगता है, तब जो निराशा या अंदर से जो खालीपन पैदा होता है, वह एहसास हो सकता है. उसे कहना, समझाना, व्यक्त करना या किसी को एहसास कराना संभव नहीं. अगली सुबह वह ऋषिकेश पहुंचे. गंगा को पहली बार देखा. नहाया. फिर वह शिवानंद आश्रम गये. जीवन में पहली बार उन्होंने इस आश्रम को देखा. वहां प्रवेश करते ही कलाम ने स्ट्रेंज वाइब्रेशन (विचित्र तरंगें) महसूस किया. आश्रम में जाकर ए सेंस ऑफ ट्रेंक्वेलिटी (प्रशांति) का बोध हुआ.

कलाम के ही शब्दों में, आश्रम में होना ही मेरे लिए ‘बाम टू माइ रेस्टलेस सोल’ (मेरी बेचैन आत्मा को राहत देनेवाला मरहम) लगा. उन्होंने देखा, साधु गहरे ध्यान में डूबे हैं. कलाम को लगा कि यहां कोई तो होगा, जो मेरे सवालों के जवाब देगा. संयोग से शिवानंद जी से ही उनकी मुलाकात हो गयी. कलाम कहते हैं, मैं मुसलमान था. पर यहां कोई फर्क या भेदभाव नहीं पाया (यह है, असल भारतीय मनीषा, सनातन धर्म या संस्कृति और असल अध्यात्म. जहां मनुष्य में जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र के आधार पर फर्क या भेदभाव न हो. पर आज की राजनीति तो अपनी गद्दी, निजी स्वार्थों और लूट के लिए इसी फर्क और भेदभाव को बढ़ाने में जुटी है).

स्वामी शिवानंद ने कलाम को देखते ही पूछा. कलाम के कुछ कहने से पहले. इतना दुखी क्यों हो? कलाम हतप्रभ कि स्वामी शिवानंद को मेरे मनोभाव की झलक कैसे मिली? फिर बहुत शांति से, धैर्य से, चित्त लगा कर शिवानंद जी ने कलाम की बातें सुनीं. इसके बाद स्वामी शिवानंद ने जो बातें कहीं, उनके बारे में कलाम कहते हैं कि मैंने वो शब्द सुने, जो जीवन में पहले कभी नहीं सुना था. उन गहरे, गहन और गंभीर शब्दों को मैंने सुना. जब भी मैं उनके बारे में सोचता हूं, तो उनकी गहरी व धीमी आवाज, अब भी मेरे मस्तिष्क या अंत:करण में गूंजते हैं.

महर्षि शिवानंद ने कहा कि अपनी नियति को स्वीकारो और जिंदगी में आगे बढ़ो. तुम्हारे जीवन में एयरफोर्स पायलट बनना नहीं लिखा है. तुम्हें जो बनना है, वो आज तुम्हारे सामने स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह पूर्व निर्धारित है. इस विफलता को भूल जाओ. क्योंकि यह जरूरी था. ताकि नियति ने तुम्हारे लिए जो रास्ता या मंजिल तय की है, तुम वहां इसी विफलता की सीढ़ी से आगे जा सको. अपने होने या अपने वजूद का सही अर्थ खोजो. ईश्वर की इच्छा के आगे खुद को समर्पित कर दो.

कलाम कहते हैं कि इस उपदेश ने मेरे जीवन पर गहरा असर डाला. प्रगतिवादी, मार्क्सवादी, बौद्धिक विचारक सब नियति-भाग्य वगैरह शब्दों पर वैचारिक द्वंद्व खड़ा करेंगे. ऐसे वैचारिक पूर्वग्रहों में फंसने की जरूरत नहीं. न इसमें डूबने की जरूरत है कि भाग्य है या नहीं? या सबकुछ पूर्व निर्धारित है या नहीं? कलाम के इस अनुभव का साफ संदेश है कि जीवन का सबसे प्रिय सपना भी जब टूट जाये, तब भी निराश न हों. संभव है, जीवन में कोई बड़ा अवसर या अनुभव मिलनेवाला हो.

ऐसे अनेक प्रसंग हैं, इस पुस्तक में, जो भारत के बच्चों और अध्यापकों को तो पढ़ने ही चाहिए. सिर्फ अपने लिए, अपने कारण और अपने जीवन हित के लिए.

दिनांक‍ : 07.09.2013

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