स्वयं को नियंत्रित करना

Updated at :03 Jun 2015 5:08 AM
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स्वयं को नियंत्रित करना

मानव जीवन को विसंगतियों से बचाये रखने के लिए और विशुद्ध जीवन निर्वाह के लिए हमारे वेद, पुराण, उपनिषदों और धार्मिक शास्त्रों में अनेक अच्छी बातें कही गयी हैं. आज हम वेद की बात करते हैं. वेदों के अनुसार, धर्म के पथ पर चलनेवाले मनुष्य में धर्म के दस लक्षण होते हैं. पहला लक्षण है […]

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मानव जीवन को विसंगतियों से बचाये रखने के लिए और विशुद्ध जीवन निर्वाह के लिए हमारे वेद, पुराण, उपनिषदों और धार्मिक शास्त्रों में अनेक अच्छी बातें कही गयी हैं. आज हम वेद की बात करते हैं. वेदों के अनुसार, धर्म के पथ पर चलनेवाले मनुष्य में धर्म के दस लक्षण होते हैं.
पहला लक्षण है धृति, जिसका अर्थ है- धैर्य. मनुष्य के लिए किसी भी अवस्था में विचलित होना उचित नहीं है. उसे सदैव शांत रहना चाहिए और भविष्य की चुनौतियों के लिए भी तैयार रहना चाहिए. विपत्ति के समय सबसे बड़ी योग्यता है- धैर्य. धार्मिक व्यक्ति का प्रधान लक्षण धैर्य है. दूसरा लक्षण है- क्षमा. क्षमा क्या है? किसी के लिए प्रतिशोध की भावना नहीं रखना ही क्षमा है.
किसी ने कभी हमारे साथ शत्रुता की है, इसलिए उससे बदला लेने की भावना ठीक नहीं है. धार्मिक व्यक्ति इस तरह की भावना से ऊपर उठ जाते हैं. जब वे देखते हैं कि अन्यायी का स्वभाव सुधर गया है, तो उसे वे क्षमा कर देते हैं. दमन का अर्थ है स्वयं पर शासन करना और शमन का अर्थ है दूसरों पर शासन करना. जो स्वयं पर शासन करते हैं- वही आत्मानुशासन या आत्मदमन कर सकते हैं.
जो स्वयं को नियंत्रित करते हैं, वे अपने किसी भी भावना को नियंत्रित कर सकते हैं. मसलन, मन में यदि किसी को क्षति पहुंचाने की इच्छा हो, तो उस इच्छा का वे अपने मन की शक्ति से दमन कर सकते हैं.
श्री श्री आनंदमूर्ति
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