वासंतिक नवरात्र नौवां दिन : सिद्धिदायिनी दुर्गा का ध्यान

Updated at :28 Mar 2015 6:26 AM
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वासंतिक नवरात्र नौवां दिन : सिद्धिदायिनी दुर्गा का ध्यान

सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैर सुरैरमरैरिप । सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।। सिद्धों, गंधर्वो, यक्षों, असुरों और देवों द्वारा भी सदा सेवित होनेवाली सिद्धिदायिनी दुर्गा सिद्धि प्रदान करनेवाली हों. जगत जननी महाशक्ति दुर्गा-9 मार्कण्डेय पुराण में कल्याणमयी दुर्गा देवी के लिये विद्या और अविद्या दोनों शब्दों का प्रयोग हुआ है. ब्रrा की स्तुति में महाविद्या तथा देवताओं […]

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सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैर सुरैरमरैरिप ।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

सिद्धों, गंधर्वो, यक्षों, असुरों और देवों द्वारा भी सदा सेवित होनेवाली सिद्धिदायिनी दुर्गा सिद्धि प्रदान करनेवाली हों.

जगत जननी महाशक्ति दुर्गा-9

मार्कण्डेय पुराण में कल्याणमयी दुर्गा देवी के लिये विद्या और अविद्या दोनों शब्दों का प्रयोग हुआ है. ब्रrा की स्तुति में महाविद्या तथा देवताओं की स्तुति में लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये संबोधन आये हैं. ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक पचास मातृकाएं आधारपीठ हैं, इनके भीतर स्थित शक्तियों का साक्षात्कार शक्ति-उपासना है. शक्ति से शक्तिमान का अभेद-दर्शन,जीवमें शिवभाव का उदय अर्थात शिवत्व-बोध शक्ति उपासना की चरम उपलब्धि है.

बृहन्नीलतंत्र में कहा गया है कि रक्त और कृष्ण भेद से काली ही दो रूपों में अधिष्ठित हैं. कृष्णा का नाम दक्षिणा है तो रक्तवर्णा का नाम सुंदरी—-

विद्या हि द्विविधा प्रोक्ता कृष्णा रक्ता-प्रभेदत: ।

कृष्णा तु दक्षिणा प्रोक्ता रक्ता तु सुन्दरी मता ।।

उपासना के भेद से दोनों में द्वैत है,पर तत्वदृष्टि से अद्वैत है. वास्तव में काली और भुवनेश्वरी दोनों मूल प्रकृति के अव्यक्त और व्यक्त रूप हैं. काली से कमला तक की यात्र दस सोपानों में अथवा दस स्तरों में पूर्ण होती है. दस विद्याओं का स्वरूप इसी रहस्य का परिणाम है.

इनमें काली, तारा, छिन्नमस्ता, बगलामुखी, मातंगी, धूमावती-ये रूप और विग्रह में कठोर तथा भुवनेश्वरी, षोड़शी, कमला और भैरवी अपेक्षाकृत माधुर्यमयी रूपों की अधिष्ठात्री विद्याएं हैं. करुणा और भक्तानुग्रहकांखा तो सबमें समान है. दुष्टों का दलन-हेतु एक ही महाशक्ति दुर्गा कभी रौद्र तो कभी सौम्य रूपों में विराजित होकर नाना प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं. इच्छा से अधिक वितरण करने में समर्थ इन महाविद्याओं का स्वरूप अचिन्त और शब्दातीत है. पर भक्तों के लिए इनकी कृपा हमेशा मिलता है. सभी स्त्रियों को देवी मानकर उनका सम्मान करना, काम-क्रोध-मद-मोह प्रभृति आन्तरिक तथा वा अनाचारों एवं दोषों को छोड़ना नवरात्र के अवसर पर महाशक्ति दुर्गा-उपासना के लिए अनिवार्य एवं अति उपयोगी है.

भगवान मनु ने कहा है-यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। जहां स्त्रियां पूजी जाती हैं वहां देवता रमते हैं, और जहां स्त्रियां दु:खी रहती हैं, वहां महालक्ष्मी आदि देवता नहीं बसते. कई स्थानों में यहां तक भी कहा गया है- यत्र नार्यो न पूज्यन्ते श्मशानं तन्न वै गृहम। जहां स्त्रियां के मान, सम्मान की पूजा नहीं की जाती वह तो घर नहीं है श्मशान है.

(समाप्त) प्रस्तुति: डॉ एनके बेरा

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