पितृपक्ष : पद्म पुराण में वर्णित गयाजी की महिमा

Updated at :14 Sep 2014 10:23 AM
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पितृपक्ष : पद्म पुराण में वर्णित गयाजी की महिमा

18 पुराणों में पद्म पुराण में भगवान विष्णु का महात्म्य विशेष रूप से उल्लिखित रहने के कारण यह वैष्णवों को अत्यधिक प्रिय है. इस पुराण को श्रीभगवान के पुराण रूप विग्रह का स्थानीय लक्ष्य स्वीकारा गया है. जैसे-हृदयं पद्म संज्ञकार. इस पुराण में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष से जुड़ी बातों का स्पष्ट विवरण के […]

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18 पुराणों में पद्म पुराण में भगवान विष्णु का महात्म्य विशेष रूप से उल्लिखित रहने के कारण यह वैष्णवों को अत्यधिक प्रिय है. इस पुराण को श्रीभगवान के पुराण रूप विग्रह का स्थानीय लक्ष्य स्वीकारा गया है. जैसे-हृदयं पद्म संज्ञकार. इस पुराण में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष से जुड़ी बातों का स्पष्ट विवरण के साथ देवी-देवताओं, गंधर्व, नाग, दानव व राक्षसों की उत्पत्ति का विशद विवरण हुआ है. श्राद्धोपयोगी तीर्थ, श्राद्ध विधि, तर्पण की विधि, व्रत-त्योहारों का नियम, चारों आश्रम व स्वर्ग-नरक का स्पष्ट निरूपण हुआ है.

पद्म पुराण मूलत: सृष्टि खंड, भूमि खंड, स्वर्ग खंड, पाताल खंड, उत्तरा खंड रूपी पांच खंडों में विभक्त है. इसके सृष्टि खंड से ही पितरों व श्राद्ध के विभिन्न अंगों का वर्णन व आगे एकोद्दिष्ट श्राद्ध व श्राद्धोपयोगी तीर्थों का विस्तृत विवरण पठनीय है. भूमि खंड में पितृभक्तों पुत्र द्वारा विष्णुधाम प्राप्त होने की चर्चा आदि है.

स्वर्ग खंड में गया आदि तीर्थों की स्पष्ट चर्चा की गयी है. मगध प्रदेश में गया नामक पुरी में श्राद्ध की चर्चा में स्पष्ट उल्लेख है कि लोगों में यह किवदंति प्रचलित है कि एक समय में सब मनुष्य यही कहते हुए तीर्थों व मंदिरों में आये थे कि क्या हमारे कुल में ऐसा कोई पुत्र होगा, जो गया की यात्रा करेगा और सात पीढ़ी तक की होनेवाली संतानों को तार देगा. इसी में अंकित है कि गया क्षेत्र के भीतर जो धर्मष्टक ब्रह्मसर तथा गया शीर्ष वट नामक तीर्थों में पितरों को पिंडदान किया जाता है. वह अक्षय होता है.

गया तीर्थ की यात्रा करते ही नरक में पड़े स्वर्ग की ओर समस्त पितर जाने लगते हैं. पद्म पुराण के उत्तर खंड में गया व गदाधर की स्तुति की गयी है. इसमें वर्णित है कि जो श्राद्ध काल में दूर से भी स्मरण करने पर पितरों को मोक्ष प्रदान करते हैं. ऐसे गदाधर देवता को मैं प्रणाम करता हूं. उन्हें श्राद्ध के बाद घर जाने की अनुमति भी देवश्री गदाधर से प्राप्त किये जाने का शास्त्रोक्त विधान भी इसी पुराण से है, जो उपयोगी है.

।। डॉ राकेश कुमार सिन्हा ‘रवि’ ।।

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