संक्षिप्त गया श्राद्ध विधान

Updated at :10 Sep 2014 7:20 AM
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संक्षिप्त गया श्राद्ध विधान

व्यस्तता के कारण तीर्थयात्री एक दिन, तीन दिन व एक सप्ताह की अवधि में गया श्राद्ध से निवृत्त होना चाहते हैं. उनके लिए विधान है. 1. एक दिवसीय गया श्राद्ध मातृ-पितृभक्त प्रात:काल फल्गु में स्नान कर तर्पण करें. यहीं पितरों के लिए पिंडदान करें. मंदिर परिसर में 16 वेदी तीर्थ पर पिंडदान के बाद अक्षयवट […]

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व्यस्तता के कारण तीर्थयात्री एक दिन, तीन दिन व एक सप्ताह की अवधि में गया श्राद्ध से निवृत्त होना चाहते हैं. उनके लिए विधान है.

1. एक दिवसीय गया श्राद्ध

मातृ-पितृभक्त प्रात:काल फल्गु में स्नान कर तर्पण करें. यहीं पितरों के लिए पिंडदान करें. मंदिर परिसर में 16 वेदी तीर्थ पर पिंडदान के बाद अक्षयवट में पिंडदान करके पुरोहित गयावाल पंडा से सुफल लें. श्राद्ध के लिए तिल, चावल, जौ, दूध, दही व घी का उपयोग करें.

2. तीन दिवसीय गया श्राद्ध

पहले दिन फल्गु में स्नान व पिंडदान करें. तत्पश्चात विष्णुपद मंदिर में पिंडदान करें. इसके बाद रामशिला व प्रेतशिला में पिंडदान करें. दूसरे दिन फल्गु में स्नान करें. भगवान विष्णु का दर्शन, पूजन व फिर सीताकुंड में पिंडदान करें. तीसरे दिन फल्गु में स्नान, विष्णुपद में पिंडदान व अक्षयवट में पिंडदान और गयावाल पंडा से सुफल प्राप्त करें. तीन दिवसीय श्राद्ध के लिए तिल, चावल, जौ, दूध, दही, घी, सत्तू, उड़द व मूंग के दाल का उपयोग करें.

3. सात दिवसीय गया श्राद्ध-

पुनपुन तट पर श्राद्ध करके गयाधाम आकर पहले दिन फल्गु नदी में स्नान कर यहीं श्राद्ध करें. दूसरे दिन फल्गु स्नान, प्रेतशिला, रामशिला, रामकुंड व ब्रह्मकुंड में पिंडदान तथा पहाड़ी से नीचे काक, यम व श्वान (कुत्ता) बलि नामक पिंडदान करें. तीसरे दिन फल्गु स्नान, उत्तरमानस, स्नान, तर्पण व पिंडदान करें. यहां से मौन धारण कर सूर्यकुंड में उदीचि, कनखल व दणिक्ष मानस में स्नान, तर्पण व पिंडदान करें. इसके बाद, भगवान गदाधर का दर्शन-पूजन करें.

चौथे दिन फल्गु स्नान के बाद मातंगवापी, धर्मारण्य व बोधगया में स्नान पिंडदान करें. पांचवें दिन फल्गु स्नान, ब्रह्म सरोवर में स्नान, तर्पण व पिंडदान करें. छठे दिन-फल्गु स्नान, विष्णुपद, रूद्रपद, दक्षिणाग्निपद, आदि सोलहवेदी तीर्थ पर पिंडदान, गयासिर पर पिंडदान, जिह्वालोल, मधुश्रवा व मुंड पृष्ठा पर पिंडदान करें. सातवें दिन फल्गु स्नान, श्राद्ध, अश्रयवट के नीचे श्राद्ध व ब्राह्मण को भोजन करायें और यहीं गयावाल पंडा से सुफल प्राप्त करें. पिंडदान व श्राद्ध कर्म में तिल, चावल, जौ, दूध, दही, घी, मिष्ठान आदि का उपयोग करें.

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