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मानव की मर्मस्थली में पैठ बनातीं डॉ अनामिका अनु की ये कविताएं..

Updated at : 14 Oct 2019 7:59 PM (IST)
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मानव की मर्मस्थली में पैठ बनातीं डॉ अनामिका अनु की ये कविताएं..

रांची : अनामिका अनु. एक कवयित्री, जो दक्षिण भारतीय राज्य केरल के तिरुअनंतपुरम में रहती हैं, लेकिन हिंदी के पठन-पाठन के साथ-साथ रचनाधर्मिता में भी प्रगाढ़ आस्था है. एक रचनाकार के रूप में उन्होंने काव्यात्मक तरीके से मानव जीवन के उन विषयों पर लेखनी और शब्दों के माध्यम से ऐसे चित्रण पेश किये हैं, जो […]

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रांची : अनामिका अनु. एक कवयित्री, जो दक्षिण भारतीय राज्य केरल के तिरुअनंतपुरम में रहती हैं, लेकिन हिंदी के पठन-पाठन के साथ-साथ रचनाधर्मिता में भी प्रगाढ़ आस्था है. एक रचनाकार के रूप में उन्होंने काव्यात्मक तरीके से मानव जीवन के उन विषयों पर लेखनी और शब्दों के माध्यम से ऐसे चित्रण पेश किये हैं, जो हर व्यक्ति के मर्मस्थली को झिंझोड़ देते हैं. आइए हम रूबरू होते हैं अनामिका अनु की ऐसी ही कुछ कविताओं से…

विचारक

मैं विचारक
नयी सोचों विचारों के पिटारे खोलूंगा,
‘एक-एक विचार’ चमकते नये,
तुम्हारे अशर्फियों को चुनौती देंगे,
तुम घबरा जाओगे,
उनकी अप्रतिम चमक देखकर तुम्हें लगेगा
कहीं तुम्हारी अनगिनत अशर्फियों की चमक
फीकी न पड़ जाए ,
नये विचारों की नयी चमक के सामने.
तुम डर जाओगे अशर्फी के गिरते भाव
और
विचारों के गर्म बाजार से.
तुम षड्यंत्र करोगे
ताकि विचार लोगों तक न पहुंचे,
तुम विचार के पिटारे को सीलबंद करोगे,
समुद्र में फेंक दोगे,जला दोगे,
पर मस्तिष्क के विचार विद्युत
घर-घर में ज्ञान के तार के साथ जायेंगी,
और फक्क से जला देंगी अंधेरे घर में
100 वाट का बल्ब!

मैं नहीं करती वे बातें, जो पुल नहीं होतीं

मैं नहीं करना चाहती वे बातें
जो पुल नहीं होतीं
उन संवादों को नहीं देती रास्ता
जो एकांत में हुए
हमारे सबसे आत्मीय संवाद के पुल को
अपने पदचाप से कोलाहल में तब्दील कर दे.

मुझे पसंद है तुम्हारी चुप्पी
घंटों फोन पर पास होते हुए भी
एक दूसरे की सांसों को महसूस करना
कुछ न कहने सा कहना
और अंत में रखता हूं कहकर
बड़ी देर तक फोन नहीं काटना
मुझे पसंद है तुम्हारे वे जंगली उन्मुक्त ठहाके
जो तुम फोन पर लगाती हो
और तुम्हारे गंभीर चेहरे को
देखकर मेरे सिवा कोई नहीं जानता
कि ये लड़की हंसती भी हैं.

कितनी बार हम मिले
कॉफी की बड़ी-बड़ी मगों को खत्म किया घंटों में
पर बिना कहे एक शब्द
वह मौन संवाद आखिर उस बिंदु पर पहुंच ही जाता था
जो पुल गढ़ती थी
आंखों से आंखों के बीच
दिल से दिल को जाती.

कोच्चि फोर्ट से

काम और अध्यात्म के बीच लटका क्रूस हूं
बजती घंटी के भीतरी दीवार का घर्षण हूं
कड़क से टूट कर चूर हुई धूप का बिखरा, टूटा फैलाव हूं.

नारियल के पत्ते की फटी छांव,
चर्चगीत,
कोच्चि फोर्ट की शांत सुबह के बीच
बेचैन मानसिक आंदोलन
करूण कैरोल मेरे अंदर
उम्मीद के शिशु/येशु का जन्म
आमीन इस तरह से कहा जाता है
कि
मेरा येशु/शिशु खिलखिला उठता है.

कोच्चि फोर्ट में बिनाले,
एसपिन हॉल के पास
मेरा येसु/शिशु जन्म लेता है
येशु की जन्मस्थली मेरी आत्मा
चर्च से आती प्रार्थना के धुन,
उत्सव गीत.
कोई न पूछे
मेरे शिशु का पिता कौन है?
संबधों को पिछली रात पोतों में भरकर बहा दिया था
खारे समुद्र में
रवाना होते जहाजों में स्टील की कील, जंजीरें
क्रूस और हथौड़ा
मेरा येसु/शिशु खिलखिला रहा है.

मैं अनपढ़

वह पति है मेरा
पढ़ा पंडित
मैं अनपढ़ गंवार.

वह एक तकिये दूर है ,
सर्दी जुकाम सब पट जाती है
साथ रहने से
पर ज्ञान नहीं पटी संसर्ग में उनके.

काश तुम स्याही होते ,
तो मैं रुई बन सोख लेती
सारे ज्ञान तेरे
पर न तुम तरल थे,
न मैं अवशोषक.

तेरा मुझसे तन-मन का रिश्ता था,
अगर अक्षरों वाला होता,
तो मैं भी लिख पाती नाम तुम्हारी पाति पर
उंगलियों से तुम्हारी छाती पर.

वह मुझे सगे-संबंधी सब से मिलाता है
पर अक्षरों से कभी नहीं मिलाया उसने.
उसके हाथ में कलम देख ललचती रही
वह टेबुल कुर्सी पर बैठ लिखता, पढ़ता, बढ़ता रहा.
मैं चूल्हे में पकती पकाती,
करची हाथों से हिलाती,
पूरी पक गयी हूं
बहुत थक गयी हूं.

न्यूटन का तीसरा नियम

तुम मेरे लिए शरीर मात्र थे
क्योंकि मुझे भी तुमने यही महसूस कराया.
मैं तुम्हारे लिए आसक्ति थी,
तो तुम मेरे लिए प्रार्थना कैसे हो सकते हो?

मैं तुम्हें आत्मा नहीं मानती,
क्योंकि तुमने मुझे अंत:करण नहीं माना.
तुम आस्तिक धरम-करम मानने वाले,
मैं नास्तिक!
न भौतिकवादी, न भौतिकीविद
पर फिर भी मानती हूं
न्यूटन का तीसरा नियम
क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया होती है
और हम विपरीत दिशा में चलने लगे…

परिचय :

डॉ अनामिका अनु

पी एचडी- लीमनोलॉजी (इंस्पायर अवॉर्ड, डीएसटी)
स्नातकोत्तर- वनस्पतिविज्ञान (विश्वविद्यालय स्वर्ण पदक)
प्रकाशन- हंस, कथादेश,पाखी,बया,वागार्थ,परिकथा,माटी, जानकीपुल( वेब पत्रिका),समालोचन, पोषम पा इत्यादि.

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