जन्मदिन पर विशेष: ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें

By Prabhat Khabar Digital Desk
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जन्मदिन पर विशेष: ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें

आज प्रसिद्ध साहित्यकार ध्रुव गुप्त का जन्मदिन है. उन्हें साहित्य की कई विधा में महारथ हासिल है. वे लगातार लेखन से जुड़े हैं. 1 सितंबर 1950 को बिहार के गोपालगंज में जन्मे ध्रुव गुप्त आईपीएस अधिकारी रहे हैं. आज उनके जन्मदिन पर पढ़ें उनकी कुछ चुनिंदा गजलें :-

एक /
बाहर रह या घर में रह
मेरे दिल, बंजर में रह
सहरा जंगल में मत जा
नींद मेरे बिस्तर में रह
मंज़िल-वंजिल धोखा है
मेरे पाँव, सफ़र में रह
बाहर जितना घूम के आ
कुछ अपने अंदर में रह
हद से बाहर पाँव न दे
अपनी ही चादर में रह
तुमसे दुआ सलाम रहे
दुश्मन मेरे शहर में रह
अपना जीना मरना क्या
क़ातिल मेरे ख़बर में रह
जैसे दिन, जो मौसम हो
तू हर वक़्त नज़र में रह
दो /
हर तरफ़ तेज़ आँधियाँ रखना
बीच में मेरा आशियाँ रखना
धूप छत पर हो हवा कमरे में
लॉन में शोख़ तितलियाँ रखना
चाँद बरसे तसल्लियों की तरह
घर में दो-चार खिड़कियाँ रखना
तुम रहोगे जहाँ ज़मीं है तेरी
मैं जहाँ हूँ, मुझे वहाँ रखना
लफ़्ज़ मिल जाएँ तो बयाँ होगा
होंठ काँपे तो ऊंगलियाँ रखना
बाँह फैले तो तुमको छू आए
फ़ासला इतना दरमियाँ रखना
मेरे लफ़्ज़ों में दर्द दे या रब
मेरे मुँह में मेरी ज़ुबाँ रखना
तीन /
मेरा एक मसअला था, देख लेते
बहुत उलझा पड़ा था, देख लेते
मैं रूठा था सितारों के लिए कब
ज़रा सा तो गिला था, देख लेते
नदी में चांद कांपा देर तक क्यों
हवा का फ़ैसला था, देख लेते
ये जो आकाश था ज़द में हमारे
अभी मौसम खुला था, देख लेते
जो तुम सौ बार गुज़रे थे इधर से
मैं रस्ते में खड़ा था, देख लेते
जो सपना था कभी तो टूटना था
जो सपनों के सिवा था, देख लेते
मेरे जैसा था कोई शख़्स मुझमें
कहां उठकर गया था, देख लेते
चार /
तनहा मंज़र हैं तो क्या
सात समंदर हैं तो क्या
ज़रा सिकुड़ के सो लेंगे
छोटी चादर है तो क्या
चाँद सुकूं तो देता है
ज़द से बाहर है तो क्या
हम भी शीशे के न हुए
हर सू पत्थर हैं तो क्या
हम सा दिल लेकर आओ
जिस्म बराबर है तो क्या
बिजली सब पर गिरती है
मेरा ही घर है तो क्या
डगर-डगर भटकाती है
दिल के अंदर है तो क्या
पाँच /
कुछ दहशत हर बार ख़रीदा
जब हमने अख़बार ख़रीदा
सच पे सौ सौ परदे डाले
सपना एक बीमार ख़रीदा
जींस, भाव, बाज़ार आपके
हमने क्या सरकार ख़रीदा
उसके भीतर भी जंगल था
कल जिसने घरबार ख़रीदा
एक मुश्त में दिल दे आया
टुकड़ा-टुकड़ा प्यार ख़रीदा
इक भोली मुस्कान की ख़ातिर
कितना कुछ बेकार ख़रीदा
प्यार से भी हम मर जाते हैं
आपने क्यों हथियार ख़रीदा
छह /
ख़ुद से बचकर निकल गए होते
अपने दिन भी बदल गए होते
हमको कोई कमी नहीं थी वहाँ
हम अगर सर के बल गए होते
ख़ुद से कुछ राबता रहा अपना
वरना जड़ से उखड़ गए होते
हम न चलते जो फ़ासले लेकर
सबको आदत सी पड़ गए होते
हम भी आवारगी में बच निकले
दुनियादारी में सड़ गए होते
रूह को जाने क्या तलाश रही
दिल तो कब के बहल गए होते
जाने किस आसमान में है ख़ुदा
हमसे मिलता तो लड़ गए होते


जन्मदिन पर विशेष: ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें
सात /
रंग सारे थे, हम नहीं थे वहाँ
सौ सहारे थे, हम नहीं थे वहाँ
लफ़्ज़ खो आए थे मानी अपने
कुछ इशारे थे, हम नहीं थे वहाँ
रात दरिया में बहुत पानी था
दो किनारे थे, हम नहीं थे वहाँ
गरचे हर दिन तेरी तलाश रही
तुम हमारे थे हम नहीं थे वहाँ
सबकी ज़द्दोजहद में साथ रहे
चाँद-तारे थे, हम नहीं थे वहाँ
जिस जगह फ़ैसला हुआ अपना
लोग सारे थे, हम नहीं थे वहाँ
आठ /
बदन में जो शरारे हैं, रहेंगे
तसव्वुर में सितारे हैं, रहेंगे
रहेगी पाँव में आवारगी भी
जो घर हमने सँवारे हैं, रहेंगे
मेरे असबाब कमरे से निकालो
परिंदे ढेर सारे हैं, रहेंगे
हवा, तारे, अँधेरे, चाँद, जुगनू
जो रातों के सहारे हैं, रहेंगे
जहाँ से आसमाँ अच्छा लगा था
वो जंगल भी हमारे हैं, रहेंगे
मैं गीली आँख रख आया वहाँ पे
जहाँ साये तुम्हारे हैं, रहेंगे
ख़ुदा मालिक रहे ऐसे ज़हाँ का
यहाँ हम से बेचारे हैं, रहेंगे
नौ /
हम हाज़िर हैं हाथ उठाए
सपने जहाँ-जहाँ ले जाए
दरवाज़े पर आँख टँगी है
खिड़की पर लटके हैं साए
सड़कों पर हम खड़े रह गए
सड़कों ने कल धूल उड़ाए
तनहाई में शोर था कितना
चीखो तो आवाज़ न आए
हर कंधे पे बोझ है कितना
कौन कहाँ दो ख़्वाब टिकाए
जिस्म नहीं एहसास हैं केवल
आप छुओ तो हम उड़ जाएँ
उतनी क़ीमत है खुशियों की
हमने जितने दर्द कमाए
दिल सबके शीशे जैसे हों
दर्द उठे तो आँख नहाए
दस /
एक भटकी सदा सा रहता हूँ
आजकल बेपता सा रहता हूँ
घर मेरे दिल में भी रहा न कभी
घर में मैं भी ज़रा सा रहता हूँ
चाँद से रोज़ आँख लड़ती है
मैं भी छत पे पड़ा सा रहता हूँ
कोई पूछो तो मुद्दआ क्या है
मैं जो सबसे ख़फ़ा सा रहता हूँ
मेरी तलाश कर सको तो करो
इन दिनों मैं हवा सा रहता हूँ
ग्यारह /
सारी नज़रों से दरकिनार हुआ
मैं गए वक़्त का अख़बार हुआ
मैं अदाकार तो अच्छा था मगर
मुझसे हटकर मेरा किरदार हुआ
इक इशारे से भी निबट जाता
तुमसे शिकवा तो बेशुमार हुआ
जितने रिश्तों को आज़माया था
सबकी बुनियाद में बाज़ार हुआ
कोई जंगल तो मेरे अंदर था
मैं कभी घर का तलबगार हुआ
उनके आने के बाद भी कितना
उनके आने का इंतज़ार हुआ
बारह /
तूफ़ां में क़ायम मकान है
क़िस्मत हम पर मेहरबान है
सदियों से चलते आए हैं
वह पर्वत है या ढलान है
गरचे सफ़र जुदा है सबका
कुछ तो सबके दरमियान है
दिल गर्दिश में भी लगता था
घर में भी कुछ इत्मीनान है

पाँव में अपने छाले हैं, या

टुकड़ा-टुकड़ा आसमान है
जुदा-जुदा हैं रंग ख़ुशी के
दुख की इक जैसी ज़ुबान है
पास हुए, ना फेल हुए हम
यह भी कोई इम्तिहान है
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