World's Indigenous Peoples day : मृत्यु के बाद भी आदिवासी अपने पूर्वजों को रखते हैं साथ, अर्पित करते हैं प्रतिदिन भोजन

Edited by Rajneesh Anand
Updated:
विज्ञापन

आदिवासियों की अनोखी परंपरा, एआई इमेज

World Tribal Day: आत्मा अमर है, इसलिए हमारे पूर्वज हमें छोड़कर नहीं जाते, बल्कि सिर्फ उनका शरीर नष्ट होता है. इसी मान्यता के साथ आदिवासी समाज जीता है और अपने पूर्वजों को प्रतिदिन भोजन अर्पित करता है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर उन्हें धन्यवाद देता है. यह परंपरा झारखंड के मुंडा आदिवासी सहित देश की कई जनजातियों में मौजूद है.

विज्ञापन

World Tribal Day : आदिवासी उन लोगों को कहा जाता है जो किसी क्षेत्र के मूल निवासी या सबसे पहले से रहने वाले लोग हैं. भारतीय संविधान में इन लोगों की भाषा, संस्कृति और पहचान को बनाए रखने के कई प्रावधान किए गए हैं. आदिवासी समाज भी यह चाहता है कि उसे अपनी भाषा, संस्कृति और व्यवहारों के साथ जीने दिया जाए. भारत में कुल 705 जनजातियां (2011 की जनगणना के अनुसार) निवास करती हैं, इनके रीति-रिवाज बहुत ही अनोखे है. आदिवासी अपने पूर्वजों को बहुत महत्व देते हैं, यहां तक की मृत्य के बाद भी वे अपने पूर्वजों को खुद से अलग नहीं करते हैं और उन्हें अपने घर में स्थान देते हैं और प्रतिदिन या फिर विशेष अवसरों पर भोजन की व्यवस्था भी करते हैं.

पूर्वजों को भोजन अर्पित करने से दूर होते हैं संकट

आदिवासी समाज यह मानता है कि पूर्वजों की पूजा और उन्हें भोजन अर्पित करने से परिवार पर से संकट दूर होता है और खुशहाली आती है. इसी वजह से आदिवासियों में पूर्वजों को भोजन अर्पित करने की परंपरा है. झारखंड के कई जनजाति समाज में यह परंपरा है कि जब वे भोजन के लिए बैठते हैं, तो अपनी थाली में से कुछ दाने निकालकर उसे अपने पूर्वजों को अर्पित करते हैं. ऐसा करने के पीछे उनकी मान्यता यह है कि पूर्वज हमेशा हमारे साथ रहते हैं और उनकी कृपा से ही उनके परिजनों को भोजन मिल रहा है और उनके जंगल और जमीन सुरक्षित हैं. आदिवासी बुद्धिजीवी वाल्टर कंडुलना बताते हैं कि मैं मुंडा समाज से आता हूं, हमारे यहां पूर्वजों का बहुत महत्व है और झारखंड के प्रत्येक आदिवासी अपने पूर्वजों को बहुत महत्व देता है. हमारे यहां यह परंपरा है कि प्रत्येक भोजन के वक्त परोसे गए भोजन में से कुछ अंश अपने पूर्वजों के लिए निकालें. इसके पीछे का उद्देश्य है पूर्वजों को धन्यवाद देना. विशेष अवसरों पर तो हम पूर्वजों को भोजन अर्पित करते ही हैं, प्रतिदिन भी करते हैं. हालांकि बदलते दौर में यह परंपराएं कम हुईं हैं, लेकिन आदिवासियों का अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान कम नहीं हुआ है.

मृत्यु के बाद भी आदिवासी अपने पूर्वजों को रखते हैं साथ

आदिवासी समाज में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नर्क की कल्पना नहीं हैं. वे यह नहीं मानते हैं कि व्यक्ति मृत्यु के बाद स्वर्ग या नर्क जाता है. आदिवासी समाज मृत्यु के बाद अपने परिजनों को वापस अपने घर ले आते हैं, जिसे छाया बुलाने की परंपरा कहा जाता है. इसमें आदिवासी विधि-विधान के साथ अपने प्रियजन की आत्मा को वापस घर बुलाते हैं. सुखराम पाहन बताते हैं कि हमारे इलाके छाया बुलाने की परंपरा उस दिन निभाई जाती है जिस दिन व्यक्ति की मौत हुई है. इसके लिए मृतक के परिजन और गांव वाले उस जगह पर जाते हैं, जहां मृतक के लिए घर बनाया जाता है. यह वह स्थान होता है, जहां शवयात्रा के दौरान शव को पहली बार रखा जाता है. उस स्थान पर 3 केंदू की डाली और पुआल के जरिए मृतक के लिए घर बनाया जाता है. वहां एक घड़ा रखा जाता है. फिर वहां आग लगा दी जाती है और मृत व्यक्ति को बुलाया जाता है. उसके बाद कोंडा यानी पुरखों के स्थान में आगे की परंपरा की जाती है और आत्मा को घर वापस बुला लिया जाता है. हालांकि यह परंपरा मृत्यु के तीसरे और सातवें दिन भी की जाती है. हर आदिवासी के घर में पूर्वजों के लिए एक स्थान निर्धारित होता है, जिसे‘अदिंङ’ या ‘कोंडा’ कहा जाता है जहां पूजा और अन्य विधियां की जाती हैं.

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

पूर्वजों को किस तरह का भोजन अर्पित करते हैं आदिवासी

आदिवासी प्रतिदिन के भोजन में से ही अपने पूर्वजों को अर्पित करते हैं. उसमें चावल, हंडिया, मुर्गे का मांस और पानी शामिल होता है. इसके अलावा भी जो घर में उपलब्ध सामग्री होती है, उसे पूर्वजों के नाम पर अर्पित किया जाता है. विशेष अवसरों पर पकवान भी अर्पित किए जाते हैं. पूर्वजों को भोजन देने के बाद उनका शु्क्रिया अदा किया जाता है.

ये भी पढ़े: ‘उम्बुल आदेर’ के जरिए मृत्यु के बाद आत्मा को घर वापस बुलाते हैं मुंडा आदिवासी, विदा नहीं करते

सवसार से सरना धर्म कोड तक, जानें क्या है मुंडा समाज में धर्म के मायने

History of Munda Tribes 6 : मुंडा संस्कृति में क्या है पड़हा, कैसे चलती थी पड़हा की सरकार?

विज्ञापन
Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola