History of Munda Tribes 6 : मुंडा जनजाति पड़हा सरकार के जरिए चलाते हैं अपनी व्यवस्थाएं, जानिए खासियत
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 28 Nov 2025 9:16 AM
मुंडा संस्कृति में पड़हा, AI Image
History of Munda Tribes : झारखंड के छोटानापुर में जब मुंडा के गांव किलि के हिसाब से बसने लगे तो, पड़हा की शुरुआत हुई. एक पड़हा के लोग सामाजिक और प्रशासनिक रूप से जुड़े होते थे, इसलिए उनका एक राजा भी होता था. पड़हा राजा के बाद महाराजा होते थे, इतिहास में जिस मदरा मुंडा का जिक्र है, वह मुंडाओं के महाराजा ही थे.
History of Munda Tribes : मुंडा जनजाति के इतिहास को जब हम समझने की कोशिश करते हैं, तो यह पाते हैं कि मुंडा शब्द कई जिम्मेदारियों और रुतबे का सूचक है. एक ओर जहां मुंडा गांव का प्रधान होता है वहीं दूसरी ओर मुंडा एक जनजाति का भी नाम है. संभवत: इसी वजह से मुंडा जनजाति के लोगों का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है. अपनी जिम्मेदारियों की वजह से ही शायद मुंडा जनजाति ने अपनी परंपराओं और शासन व्यवस्था को बनाए रखा, जिनमें से एक है पड़हा और उसकी शासन व्यवस्था.
मुंडा संस्कृति में क्या है पड़हा?
मुंडा समाज शुरुआत में 21 किलि में बंटा, जिसे क्लान या कबीले के रूप में समझा जा सकता है. लेकिन जैसे-जैसे किलि में सदस्यों की संख्या बढ़ती गई कई नए किलि आपसी सहमति से बनने लगे. (वर्तमान में मुंडाओं के 103 किलि से भी अधिक हैं.) जनसंख्या में वृद्धि के बाद आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पा रही थी, तब एक ही किलि के लोगों ने दूसरे गांव बसाए. लेकिन उनका कब्रिस्तान अभी भी एक ही था और वे पूजा भी साथ ही करते थे. सिर्फ उनके खेत और गांव अलग थे. लेकिन जैसे-जैसे गांव की बीच दूरी बढ़ी कब्रिस्तान और पूजा स्थान भी अलग होने लगे, लेकिन सामाजिक और प्रशासनिक मामलों में वे एक ही समुदाय के रूप में बंधे हुए थे. ऐसे ही गांवों के समूह को पड़हा कहा जाता है. अमूमन पड़हा में 3,5,7 गांव शामिल होते थे. एक पड़हा में गांवों की संख्या हमेशा विषम संख्या में ही होती थी.
वंश के आधार पर तय होता था पड़हा राजा
पड़हा राजा एक पड़हा का प्रधान होता है. उसकी नियुक्ति निश्चित तौर पर शुरुआत में उसकी योग्यता और सक्षमता के अनुसार आम सहमति से हुई होगी, क्योंकि मुंडा गांव में शासन व्यवस्था सहमति के आधार पर ही चलती थी. लेकिन एक बार जिस परिवार से पड़हा राजा चुन लिया गया था, उसके वंशज ही इस पद को धारण करते थे.अगर कोई ऐसी परिस्थिति बनती थी जिसमें पड़हा राजा अपने पद पर नहीं बना रह सकता था, तो उसके परिवार से ही किसी व्यक्ति को आम सहमति से पड़हा राजा चुनने की व्यवस्था थी. पड़हा राजा किलि के आम सदस्य की तरह ही होता था, बस उसके पास समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ विशेष अधिकार होते थे.
कैसे चलती थी पड़हा की सरकार?

मुंडा समाज में त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था थी. इसमें सबसे निचले स्तर पर गांव का मुंडा होता था. उसके पास गांव को सुरक्षित और सुव्यवस्थित रखने के अधिकार थे. चूंकि उस काल में कर वसूलने जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी इसलिए गांव का मुंडा मुख्यत: आपसी विवाद और जीवन से जुड़े अन्य मसलों का निराकरण करता था. जब कभी कोई ऐसा मामला सामने आता, जिसमें मुंडा के स्तर से विवाद का निराकरण संभव नहीं था, तब मामला पड़हा राजा के पास पहुंचता था. अगर पड़हा राजा के पास समस्या का समाधान हो गया, तब तो ठीक अन्यथा मसला फिर आगे महाराजा के पास पहुंचता था.
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पड़हा में शासन व्यवस्था आदर्श स्थिति में थी : मीनाक्षी मुंडा
मुंडाओं की शासन पद्धति के बारे में बात करते हुए कोल्हान विश्वविद्यालय में मानवशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर मीनाक्षी मुंडा बताती हैं कि मुंडा समाज में जो त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था थी वह आज भी काफी हद तक नजर आती है. हालांकि समय के साथ इसमें काफी बदलाव हो गए हैं और पंचायत चुनाव के बाद तो स्थिति और भी अलग हो गई है. लेकिन पुरानी व्यवस्था की बात करें तो पड़हा में शासन व्यवस्था आदर्श स्थिति में थी और सबकुछ आम सहमति से ही होता था. अगर ऐसी स्थिति बनती थी कि निष्पक्ष फैसले की संभावना कम होती थी, जैसे मुंडा या पड़हा राजा से संबंधित कोई मसला हो, तो उसे आगे लेकर जाया जाता था. लेकिन फैसले में न्याय को सर्वोपरि माना जाता था. हां, पड़हा की शासन व्यवस्था में महिलाओं की कोई भूमिका नहीं होती थी. पड़हा का प्रधान राजा यानी पुरुष होता था, इसलिए वही सबकुछ तय करता था.

पड़हा राजा की सहायता के लिए उसके कुछ सहयोगी भी होते थे, जो गांव के वरिष्ठ लोग होते थे और जिनका गांव में सम्मान होता था. नागवंशियों के शासन की शुरुआत के बाद इस शासन पद्धति में कुछ बदलाव भी देखे गए, हालांकि उन्होंने भी इस व्यवस्था से ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की थी.
मुंडा-मानकी व्यवस्था और पड़हा राजा व्यवस्था में सिर्फ नाम का फर्क : गुंजल इकिर मुंडा
संस्कृतिकर्मी गुंजल इकिर मुंडा बताते हैं कि मुंडा शासन व्यवस्था में दो पद्धति चलती थी-मुंडा-मानकी व्यवस्था और पड़हा राजा व्यवस्था. दोनों में फर्क सिर्फ नाम का है, क्योंकि दोनों के क्षेत्र अलग हैं. गांव का प्रधान मुंडा सबसे निचले स्तर का राजा था और वह विवादों के निपटारे और गांव की व्यवस्था के लिए जिम्मेदार था. उस वक्त लोगों के बीच जिस तरह के विवाद होते होंगे मसलन एक किलि में शादी या खेती से संबंधित विवाद उनका निपटारा वह करता होगा. उससे बड़े विवादों के लिए मानकी या पड़हा राजा और फिर महाराजा होता था. जब विवाद गांव से निकलकर पड़हा राजा के पास जाता था, तो उसकी शिकायत लेकर गांव का मुंडा पड़हा राजा के पास जाता था और संबंधित पक्ष को भी जाना होता होगा. चूंकि इस परंपरा के बारे में कुछ भी लिखित नहीं है, इसलिए परंपराओं से यही जाहिर होता है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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