एलीट

स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े हमारी शिक्षा व्यवस्था

Updated:
विज्ञापन
शिक्षा और बिहार का विकास: चुनौतियाँ व समाधान

स्कूल में छात्र, सांकेतिक तस्वीर

बिहार जैसे राज्यों के लिए शिक्षा मानव पूंजी का सबसे बड़ा स्रोत है. भारत और चीन की शिक्षा नीतियों के तुलनात्मक विश्लेषण से बिहार के लिए महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं.

विज्ञापन

-संजय कुमार
, सहायक प्राध्यापक, अर्थशास्त्र, पटना विश्वविद्यालय-

विकासशील देशों और खासकर बिहार जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े राज्यों के लिए शिक्षा का महत्व बहुत अधिक है. प्राकृतिक संसाधनों और पूंजी की सीमित उपलब्धता वाले राज्यों के लिए सबसे बड़ी संपत्ति उनका मानव संसाधन होता है. यदि इसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल के माध्यम से मानव पूंजी में बदला जाये, तो राज्य की उत्पादकता बढ़ती है तथा लोगों की आय, रोजगार और जीवन-स्तर में भी सुधार आता है. वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब द्वारा प्रकाशित नितिन भारती और ली यांग के अध्ययन में भारत और चीन की शिक्षा नीतियों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है.

अध्ययन के अनुसार, चीन ने शिक्षा के क्षेत्र में 'बॉटम-अप' रणनीति अपनाई. उसने सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिक विस्तार किया, फिर माध्यमिक और अंततः उच्च शिक्षा का विकास किया. साथ ही, व्यावसायिक शिक्षा और बड़े पैमाने पर शिक्षकों की नियुक्ति पर विशेष बल दिया. जबकि भारत ने लंबे समय तक 'टॉप-डाउन' रणनीति अपनाई, जिसमें प्राथमिकता उच्च और माध्यमिक शिक्षा को मिली, जबकि प्राथमिक शिक्षा पर अपेक्षित ध्यान काफी देर से दिया गया. इससे भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या तो बढ़ी, पर व्यापक निरक्षरता, कम कौशल और वेतन असमानता जैसी समस्याएं बनी रहीं.

अध्ययन के अनुसार, भारत में वेतन असमानता का करीब 25 फीसदी हिस्सा शैक्षणिक असमानता से जुड़ा है, जबकि चीन में यह केवल पांच से 12 फीसदी के बीच है. बिहार की स्थिति इस व्यापक राष्ट्रीय चुनौती को और स्पष्ट करती है. जनगणना के अनुसार, राज्य की साक्षरता दर लगभग 61.8 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है. महिला साक्षरता की स्थिति अधिक चिंताजनक रही है, हालांकि हाल के वर्षों में इसमें सुधार के संकेत मिले हैं. शिक्षा विभाग के अनुसार, 2023-24 में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 20.86 फीसदी रही. यानी आज भी हर पांच में से एक बच्चा माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले स्कूल छोड़ देता है. शिक्षा की गुणवत्ता का संकट भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

एएसइआर, 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड उन राज्यों में हैं, जहां बच्चों के पढ़ने और गणित के बुनियादी कौशल राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं. दूसरी ओर, केरल जैसे राज्यों में कक्षा पांच के अधिकांश बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ सहजता से पढ़ लेते हैं. इससे स्पष्ट है कि नामांकन बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है; वास्तविक चुनौती गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की है. शिक्षकों की कमी भी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रही है. राष्ट्रीय स्तर पर माध्यमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पद लगातार बढ़े हैं. बिहार के अनेक विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात अब भी संतुलित नहीं है और प्रति छात्र सार्वजनिक शिक्षा व्यय देश के सबसे कम स्तरों में है.

सीमित निवेश का असर विद्यालयों के आधारभूत ढांचे, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और डिजिटल संसाधनों पर साफ दिखाई देता है. फिर भी पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है. हाल के वर्षों में कुछ बेहतर बदलाव भी देखने को मिले हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 ने शिक्षा को कौशल विकास और बहुविषयक अध्ययन से जोड़ने का प्रयास किया है. बिहार सरकार की मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना, साइकिल योजना और पोशाक योजना जैसी पहलों ने स्कूलों में बालिकाओं की उपस्थिति बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी पटना विश्वविद्यालय और आइआइटी, पटना जैसी संस्थाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की है. यानी नीति, निवेश और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का सही समन्वय हो, तो परिवर्तन संभव है.

हालांकि स्कूलों की संख्या बढ़ा देना या योजनाएं शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा. शिक्षा को स्थानीय अर्थव्यवस्था और कौशल विकास से जोड़ना जरूरी है. कौशल विकास योजनाओं और प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना हुई है, पर उद्योगों और स्थानीय रोजगार की जरूरतों के साथ उनका समन्वय अब भी कमजोर है. जब तक शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच मजबूत संबंध नहीं होगा, तब तक युवा आबादी का पूरा लाभ नहीं उठाया जा सकेगा. प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल अक्सर कहा करते थे कि शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन के मिशन के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि शिक्षक इसे मात्र एक नौकरी मानेंगे, तो शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक जायेगी.

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षकों की प्रतिबद्धता, विद्यार्थियों की जिज्ञासा और सरकार की दूरदर्शी नीतियां समान रूप से आवश्यक हैं. बिहार आज देश के सबसे युवा राज्यों में से एक है. यह उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ी संभावना भी. यदि शिक्षा, कौशल, शोध और नवाचार में पर्याप्त निवेश किया जाये, तो यही युवा आबादी राज्य की आर्थिक प्रगति की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है. इसलिए समय की मांग है कि शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाया जाये, शिक्षकों के रिक्त पद शीघ्र भरे जायें, विद्यालयों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए और मानव संसाधन को मानव पूंजी में बदलने के व्यापक लक्ष्य से जोड़ा जाये. यही बिहार को ज्ञान-आधारित और समावेशी अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे ले जाने का सबसे प्रभावी रास्ता होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola