छह वर्ष में ही स्काईरूट ने भारत को बना दिया तीसरा स्पेश पावर, पढ़ें प्रवीण कौशल का आलेख

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Skyroot Vikram-1, Photo- ANI

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इस उपलब्धि का एक रणनीतिक पक्ष भी है. आज भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का मूल्य लगभग 8.4 अरब डॉलर है, जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का लगभग दो प्रतिशत है. सरकार का अनुमान है कि यह अर्थव्यवस्था 2033 तक लगभग 44 अरब डॉलर और 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है.

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जुलाई 18, 2026 की सुबह. श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सात-मंजिले इमारत जितना ऊंचा रॉकेट विक्रम-1 उड़ान भरता है. लगभग पंद्रह मिनट की उड़ान के बाद वह पृथ्वी से लगभग 450 किमी ऊपर कक्षा में छह पेलोड सफलतापूर्वक स्थापित कर देता है. इसे बनाने वाली कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस न तो कोई सरकारी संस्था है, न कोई पुरानी रक्षा कंपनी, और न ही इसकी स्थापना को अभी एक दशक पूरा हुआ है. इस प्रक्षेपण के साथ ही भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा देश बन गया, जहां एक निजी कंपनी ने अपने दम पर रॉकेट का डिजाइन तैयार किया, उसका निर्माण किया और उसे सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में पहुंचाया.

मई 2020 में भारत सरकार ने घोषणा की थी कि सरकारी एकाधिकार वाले अंतरिक्ष क्षेत्र निजी भागीदारी के लिए खोल दिया जायेगा. केवल छह वर्षों में स्काईरूट एयरोस्पेस ने वह उपलब्धि हासिल कर ली. स्वतंत्र भारत के इतिहास में अंतरिक्ष क्षेत्र पूरी तरह सरकार के अधिकार क्षेत्र में रहा. इसरो ही प्रक्षेपण यानों का निर्माण करता था, उपग्रह बनाता था और प्रक्षेपण स्थलों का संचालन करता था. निजी कंपनियां अधिक-से-अधिक पुर्जे बनाकर इसरो से ठेका मिलने की उम्मीद कर सकती थीं. यह व्यवस्था केवल अंतरिक्ष क्षेत्र तक सीमित नहीं थी. दूरसंचार, कोयला, विमानन और बैंकिंग जैसे अनेक क्षेत्रों में भी दशकों तक यही सोच हावी रही कि कुछ क्षेत्र इतने रणनीतिक या पूंजी-प्रधान हैं कि उन्हें निजी हाथों में नहीं सौंपा जा सकता.

ऐसी सोच की वास्तविक कीमत तुरंत दिखाई नहीं देती. उसकी कीमत अनुपस्थिति के रूप में सामने आती है. उन इंजीनियरों की पूरी पीढ़ी, जो रॉकेट बनाना चाहती थी, जिसके पास सपने देखने के लिए केवल एक ही नियोक्ता था. वह पूंजी, जो दस अलग-अलग नवाचारों को जन्म दे सकती थी, केवल एक ही दिशा में लगती रही और वह प्रतिस्पर्धा, जिससे नवाचार जन्म लेता है, कभी विकसित ही नहीं हो सकी.

स्काईरूट के संस्थापक इंजीनियर पवन कुमार चंदाना और नागा भारथ डाका इस सच्चाई को समझते थे. दोनों इसरो में वैज्ञानिक थे. चंदाना भारत के सबसे शक्तिशाली प्रक्षेपण यान जीएसएलवी मार्क-III पर काम कर चुके थे, जबकि डाका उन एवियोनिक्स प्रणालियों के विशेषज्ञ थे, जो उड़ान के दौरान रॉकेट को अपनी स्थिति पहचानने और आवश्यकता पड़ने पर मार्ग सुधारने में सक्षम बनाती हैं. जून 2018 में, जब भारत में किसी निजी कंपनी द्वारा अपना स्वयं का रॉकेट बनाना लगभग असंभव कल्पना माना जाता था, तब दोनों ने अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरियां छोड़ दीं. उन्होंने केवल दस लोगों की टीम और 15 लाख डॉलर की प्रारंभिक पूंजी के साथ स्काईरूट की शुरुआत की.

आठ वर्षों बाद, 16 करोड़ डॉलर से अधिक निवेश जुटाने के बाद, उसी साहसिक निर्णय का परिणाम आज पृथ्वी की कक्षा में पहुंचा हुआ एक सफल रॉकेट है. चंदाना और डाका की तकनीकी क्षमता इसरो में दशकों से हुए सार्वजनिक निवेश और प्रशिक्षण का परिणाम थी. इसरो द्वारा विकसित सत्तर से अधिक तकनीकों का औपचारिक रूप से निजी उद्योग को हस्तांतरण किया जा चुका है, जिससे स्काईरूट जैसी कंपनियां शून्य से शुरुआत करने के बजाय सरकारी अनुसंधान के आधार पर आगे बढ़ सकीं. सरकारी निवेश ने प्रतिभा तैयार की और नीति सुधारों ने उसे अवसर दिया. विक्रम-1 इसी संगम का परिणाम है. रॉकेट का नाम विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है.

इस उपलब्धि का एक रणनीतिक पक्ष भी है. आज भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का मूल्य लगभग 8.4 अरब डॉलर है, जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का लगभग दो प्रतिशत है. सरकार का अनुमान है कि यह अर्थव्यवस्था 2033 तक लगभग 44 अरब डॉलर और 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. जब तक यह क्षेत्र केवल एक सरकारी विभाग तक सीमित था, तब तक यह विकास संभव ही नहीं था. आज भारत में 300 से अधिक निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप सक्रिय हैं, जबकि पांच वर्ष पहले इनकी संख्या मुट्ठी भर थी. यह क्षेत्र पहले ही लगभग एक लाख लोगों को रोजगार दे रहा है.

जिन देशों को कृषि, आपदा प्रबंधन और संचार के लिए उपग्रहों की आवश्यकता है, लेकिन वे स्वयं श्रीहरिकोटा जैसा प्रक्षेपण केंद्र नहीं बना सकते, वे इसके जरिए छोटे उपग्रहों को सस्ते और विश्वसनीय ढंग से प्रक्षेपित कर सकते हैं. यह केवल एक व्यावसायिक अवसर नहीं, एक भू-राजनीतिक अवसर भी है और भारत इसे सबसे पहले प्राप्त करने की स्थिति में है. बेशक, इससे भविष्य की सफलता की गारंटी नहीं मिलती. स्काईरूट को अभी यह सिद्ध करना होगा कि वह केवल एक सफल प्रक्षेपण ही नहीं, बल्कि लगातार और विश्वसनीय प्रक्षेपण कर सकती है, स्थापित वैश्विक कंपनियों के साथ लागत के स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती है और अंतरराष्ट्रीय ग्राहक तथा बीमा कंपनियां अपने महंगे पेलोड इसे भरोसे के साथ सौंप सकते हैं. ये सभी वास्तविक चुनौतियां हैं. इसे कंपनी भी स्वीकार करती है. बहरहाल, भारत अंतरिक्ष में 1969 में ही पहुंच चुका था, लेकिन 18 जुलाई, 2026 ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत ने यह भी सीख लिया है कि अपनी ही संभावनाओं के मार्ग में खड़ी अनावश्यक बाधाओं को कैसे हटाया जाए.


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प्रवीन कौशल

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By प्रवीन कौशल

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