शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का ही हिस्सा, पढ़ें प्रभु चावला का आलेख

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सोनम वांगचुक

सोनम वांगचुक

देश में ऐसे मुद्दों की कमी नहीं है, जो जनता में आक्रोश पैदा कर सकें. किसान अब भी अनिश्चितताओं की शिकायत करते हैं. युवा परीक्षा और रोजगार को लेकर चिंतित हैं. भ्रष्टाचार के आरोप लगातार सामने आते हैं. फिर भी इनमें से किसी मुद्दे ने वैसी राष्ट्रव्यापी जनसक्रियता पैदा नहीं की, जिसे पहले की पीढ़ियां लगभग स्वाभाविक मानती थीं. जब सार्वजनिक असंतोष अन्य सभी क्षेत्रों में जीवित दिखाई देता है, तब सड़कें खामोश क्यों हैं? क्या असहमति सार्वजनिक चौक-चौराहों से निकलकर डिजिटल स्क्रीन पर पहुंच गयी है?

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Peaceful Protest in Democracy: एक समय सरकारें सड़कों से उतना ही डरती थीं, जितना चुनावी मतपेटियों से. दिल्ली का रामलीला मैदान और जंतर-मंतर, मुंबई का शिवाजी पार्क और चेन्नई का मरीना बीच केवल सार्वजनिक स्थल नहीं थे. वे लोकतंत्र के ऐसे मंच थे, जहां जनता का गुस्सा राजनीतिक वैधता प्राप्त करता था. इनमें से किसी एक स्थान पर भी बड़ी सभा राष्ट्रीय विमर्श को बदल सकती थी, सरकारों को अस्थिर कर सकती थी और सत्ता में बैठे लोगों को सुनने के लिए मजबूर कर सकती थी. ये स्थल आज भी वहीं हैं. जो चीज गायब होती दिख रही है, वह है नागरिकों की उन्हें भर देने की इच्छा. परीक्षा-पत्र लीक और चुनावी मुद्दों को लेकर चला लंबा आंदोलन, जिसमें बाद में सोनम वांगचुक भी शामिल हुए, एक बार फिर इस विचित्र परिवर्तन की ओर ध्यान आकर्षित करता है.

कई सप्ताहों तक विरोध प्रदर्शन, भूख हड़ताल और विपक्ष के कुछ वर्गों की एकजुटता के बावजूद, यह आंदोलन उस स्वतःस्फूर्त जनभागीदारी को आकर्षित करने में संघर्ष करता रहा है, जो कभी किसी शिकायत को राष्ट्रीय आंदोलन में बदल देती थी. यह खामोशी चौंकाने वाली रही है. नागरिक समाज संकोच करता दिखा है, बुद्धिजीवी बड़े पैमाने पर दूर रहे हैं और टीवी तथा सोशल मीडिया पर नियमित आक्रोश व्यक्त करने वाले लोगों ने भी अपने गुस्से को सड़कों पर उतरकर व्यक्त करने की बहुत कम इच्छा दिखाई है. क्या यह एक और आंदोलन की विफलता है? या यह भारतीय लोकतंत्र के चरित्र में आये किसी गहरे बदलाव का संकेत है?

देश में ऐसे मुद्दों की कमी नहीं है, जो जनता में आक्रोश पैदा कर सकें. किसान अब भी अनिश्चितताओं की शिकायत करते हैं. युवा परीक्षा और रोजगार को लेकर चिंतित हैं. भ्रष्टाचार के आरोप लगातार सामने आते हैं. फिर भी इनमें से किसी मुद्दे ने वैसी राष्ट्रव्यापी जनसक्रियता पैदा नहीं की, जिसे पहले की पीढ़ियां लगभग स्वाभाविक मानती थीं. जब सार्वजनिक असंतोष अन्य सभी क्षेत्रों में जीवित दिखाई देता है, तब सड़कें खामोश क्यों हैं? क्या असहमति सार्वजनिक चौक-चौराहों से निकलकर डिजिटल स्क्रीन पर पहुंच गयी है? या भारत ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां लोकतंत्र का संचालन सार्वजनिक विमर्श की बजाय चुनावों और सोशल मीडिया के माध्यम से अधिक होने लगा है? तकनीक ने नि:संदेह राजनीति की भाषा बदल दी है.

पहले की पीढ़ियां बैनर लेकर मार्च करती थीं, आज की पीढ़ी स्मार्टफोन लेकर चलती है. एक हैशटैग किसी जुलूस से अधिक दूर तक पहुंच सकता है और छोटा वीडियो किसी सार्वजनिक सभा से अधिक लोगों तक पहुंच जाता है. आर्थिक परिवर्तन भी इस व्यवहारगत बदलाव में योगदान दे सकता है. भारत अब शिकायतों से अधिक आकांक्षाओं वाला देश बन चुका है. बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग करियर, शिक्षा, व्यापार और आर्थिक प्रगति में व्यस्त है. आंदोलन समय लेता है, अनिश्चितता पैदा करता है और कभी-कभी टकराव को भी जन्म देता है. समृद्धि अक्सर राजनीतिक व्यवहार को संयमित करती है. पर क्या इसने संगठित सार्वजनिक कार्रवाई की प्रवृत्ति को भी कमजोर कर दिया है?

युवा पीढ़ी का व्यवहार एक और पहेली पेश करता है. वे तीव्र प्रतिस्पर्धा, अनिश्चित रोजगार और भारी पेशेवर दबाव का सामना कर रहे हैं. उनके पास संगठित होने और विरोध करने के पर्याप्त कारण हैं. फिर भी विश्वविद्यालय परिसरों में वह वैचारिक उथल-पुथल शायद ही दिखाई देती है, जिसने कभी राष्ट्रीय राजनीति को आकार दिया था. लगता है, आदर्शवाद ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के आगे जगह छोड़ दी है. और राजनीति लोगों को प्रेरित करने में विफल हो रही है. वर्तमान नेतृत्व की गुणवत्ता और विश्वसनीयता भी जांच के दायरे में है. प्रत्येक सफल जनांदोलन के केंद्र में ऐसी नैतिक शक्ति रही है, जो दलगत राजनीति से ऊपर उठती थी.

महात्मा गांधी ने प्रतिरोध को नैतिक मिशन में बदल दिया. जयप्रकाश नारायण ने राजनीतिक असंतोष को लोकतांत्रिक अभियान का रूप दिया. अन्ना हजारे भी थोड़े समय के लिए इसलिए सफल हुए, क्योंकि लाखों लोगों ने उनके आंदोलन को नैतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा. उतना ही महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निरंतर राजनीतिक प्रभुत्व. उनकी संवाद क्षमता, कल्याणकारी योजनाएं और व्यक्तिगत लोकप्रियता ने उन्हें व्यक्तिगत नीतियों पर आलोचना के बावजूद बड़ी संख्या में मतदाताओं का विश्वास बनाये रखने में मदद की है. कुछ निर्णयों से असहमत होने के बावजूद अनेक नागरिक अभी तक मानने को तैयार नहीं कि कोई अधिक प्रभावशाली राष्ट्रीय विकल्प सामने आया है.

लोकतंत्र केवल सत्ता में बैठे लोगों से असंतोष पर नहीं चलता. वह उन लोगों पर विश्वास पर भी निर्भर करता है, जो सत्ता में आने की इच्छा रखते हैं. यही बदलती हुई वास्तविकता शायद समझाती है कि राहुल गांधी अब राष्ट्रीय राजधानी में विशाल प्रदर्शनों पर निर्भर रहने के बजाय छात्रों, किसानों, मजदूरों और स्थानीय समुदायों के साथ प्रत्यक्ष संवाद को प्राथमिकता देते हैं. नागरिक समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. कभी सेवानिवृत्त न्यायाधीश, पूर्व नौकरशाह, शिक्षाविद, लेखक और कलाकार जन आंदोलनों को बौद्धिक वैधता और नैतिक शक्ति प्रदान करते थे. आज उनमें से कई इस भूमिका से दूर दिखाई देते हैं.

यह थकान, सावधानी, बढ़ते ध्रुवीकरण या सार्वजनिक विश्वास में कमी का परिणाम है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है. पर स्पष्ट है कि आज के आंदोलन उस व्यापक सामाजिक गठबंधन को बनाने में संघर्ष करते हैं, जिसने कभी उन्हें मजबूती दी थी. इसका यह अर्थ नहीं कि भारतीय राजनीतिक रूप से उदासीन हो गये हैं. चुनावों में भागीदारी अब भी प्रभावशाली है, राजनीतिक बहस जीवंत है और नागरिक सरकारों की गहन जांच करते रहते हैं. लोकतंत्र की ऊर्जा समाप्त नहीं हुई है. उसने केवल अपनी अभिव्यक्ति बदल ली है.

मतदान लोकतंत्र की नींव है, पर चुनाव ही नागरिकों और सरकारों के बीच संवाद का एकमात्र माध्यम नहीं बन सकते. शांतिपूर्ण विरोध भी उतना ही वैध लोकतांत्रिक साधन है, क्योंकि वह सत्ता में बैठे लोगों को याद दिलाता है कि चुनावी जीत सुनना बंद कर देने का लाइसेंस नहीं है. लोकतंत्र केवल तब कमजोर नहीं होते, जब संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं. वे तब भी असुरक्षित हो जाते हैं, जब नागरिक सार्वजनिक जीवन से पीछे हट जाते हैं. अधिक चिंताजनक प्रश्न यह है कि क्या देश धीरे-धीरे ऐसे विश्वसनीय नेताओं की कमी का सामना कर रहा है, जो इन शिकायतों को सामूहिक लोकतांत्रिक आवाज में बदलने के लिए तैयार हों. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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प्रभु चावला

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By प्रभु चावला

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