क्या औरतें बेपर्दा मस्जिद में कर सकती हैं प्रवेश?

नमाज अदा करती महिला
Women In Mosque : इस्लाम में महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश की मनाही तो नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि अगर महिलाएं मस्जिद जाएं तो हिजाब में जाएं और इस्लामिक नियमों का पालन करते हुए जाएं. उनके लिए बिना पर्दा सार्वजनिक स्थलों फिर चाहे वो मस्जिद ही क्यों ना हो जाना मना है. इस लिहाज से डिंपल यादव का बिना पर्दा मस्जिद में प्रवेश करना गलत है.
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Women In Mosque: समाजवादी पार्टी की नेता डिंपल यादव पर बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के नेता जमाल सिद्दीकी ने मुसलमानों की भावना को आहत करने का आरोप लगाते हुए यह कहा कि उन्होंने मस्जिद में गलत पोशाक में प्रवेश किया है. ऐसा करके उन्होंने मुसलमानों की धार्मिक भावना को आहत किया है. दरअसल सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव की एक तस्वीर वायरल है, जिसमें वे मस्जिद के अंदर बैठक करते नजर आ रहे हैं. बीजेपी के नेता ने यह आरोप लगाया है कि अखिलेश यादव मस्जिद में राजनीतिक बैठक कर रहे हैं, जो कहीं से भी उचित नहीं है. उन्होंने सपा नेता और मस्जिद के मुफ्ती मोहिबुल्लाह नदवी की भी निंदा की है, उन्होंने यह सबकुछ मस्जिद में होने दिया. ऐसे में सवाल यह है कि क्या डिंपल यादव ने सचमुच मस्जिद में प्रवेश के नियमों की अवहेलना की है?
मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश को लेकर क्या है नियम?
इस्लाम के अनुसार मस्जिद में महिलाओं का प्रवेश वर्जित नहीं है. हालांकि महिलाओं के लिए घर पर नमाज बेहतर माना गया है, लेकिन अगर वे जाना चाहें, तो मस्जिद में उनके प्रवेश पर रोक नहीं है. पैगंबर मोहम्मद साहब कहते हैं कि अपनी औरतों को मस्जिद जाने से न रोको. उनके इस बयान से यह स्पष्ट है कि इस्लाम में महिलाओं को मस्जिद जाने की पूरी इजाजत है, लेकिन उन्हें पर्दे में रहने की भी सलाह दी गई है, इस तरह यह बात साबित होती है कि जो महिलाएं मस्जिद जाती हैं, उन्हें हिजाब में रहना जरूरी है. साथ ही किसी तरह का कोई सुगंध भी नहीं लगाना है ताकि उनकी ओर किसी का ध्यान ना जाए.
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भारत में महिलाएं अमूमन घर पर पढ़ती हैं नमाज
भारत में महिलाएं अमूमन घर पर नमाज पढ़ती हैं. उनके लिए मस्जिद में नमाज नहीं होती है. हालांकि शिया मुसलमानों ने महिलाओं के लिए मस्जिद में नमाज का कमरा बनाया है, जहां वे पूरी पर्देदारी के साथ नमाज अदा करती हैं. इस्लामिक नियमों के अनुसार महिला और पुरुष साथ में नमाज अदा नहीं करते हैं. बिरसा एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय की प्रोफसर तजवार इजहार बताती हैं कि हम मस्जिद में जाकर नमाज अदा नहीं करते. हमारे देश में ज्यादातर मस्जिद पुरुषों के लिए बने हैं, जहां महिलाओं को नमाज की इजाजत नहीं है. कुछ मस्जिद ऐसे हैं जहां महिलाएं भी नमाज अदा करती हैं, जैसे दिल्ली का जामा मस्जिद, लेकिन उनके लिए नमाज का कमरा अलग है और वे हिजाब में ही मस्जिद जाती हैं. महिलाओं के मस्जिद जाने पर प्रतिबंध तो नहीं है, लेकिन पर्दे की वजह से उन्हें यह कहा जाता है कि वे घर पर ही नमाज अदा करें.
महिलाएं मस्जिद नहीं जाती हैं : मौलाना तौफीक कादरी
मौलाना तौफीक कादरी कहते हैं कि देश में महिलाओं के मस्जिद जाने पर प्रतिबंध है. उन्हें मस्जिद जाने की इजाजत नहीं है. शिया मुसलमान अपनी औरतों को मस्जिद जाने की इजाजत देते हैं, उनके मस्जिद में औरतों के लिए अलग कमरा होता है, लेकिन सुन्नी मस्जिदों में महिलाएं नहीं जाती हैं. पूरे देश में यही व्यवस्था लागू है. जहां तक बात गैर मुसलमान के प्रवेश का है, तो मस्जिद में धर्म पूछकर प्रवेश नहीं दिया जाता है, कोई भी जो पाक-साफ हो वो मस्जिद में प्रवेश कर सकता है.
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क्या इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद जाने पर प्रतिबंध है?
नहीं. इस्लाम महिलाओं को मस्जिद जाने से नहीं रोकता है.
क्या बिना पर्दा महिलाएं मस्जिद जा सकती हैं?
नहीं. पर्दे के बिना महिलाएं मस्जिद में प्रवेश नहीं कर सकती हैं.
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लेखक के बारे में
By रजनीश आनंद
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.
राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.
रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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