संताल आदिवासी थे शिबू सोरेन, समाज मरांग बुरू को मानता है अपना सर्वोच्च देवता

Edited by Rajneesh Anand
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शिबू सोरेन

Shibu Soren Religion : शिबू सोरेन संताल आदिवासी थे, जो झारखंड की सबसे बड़ी आबादी वाली जनजाति है. संताल आदिवासी भी बाकी आदिवासियों की तरह प्रकृति पूजक होते हैं और मरांग बुरू को अपना सर्वोच्च देवता मानते हैं, इनके यहां अंतिम संस्कार के नियम बहुत ही सादगी के साथ किए जाते हैं, कोई आडबंर नहीं होता है. जहां तक गुरुजी की बात है, तो वे एक बेहद ही सहज-सरल व्यक्ति थे और उन्होंने आदिवासियों के जीवन की सबसे बड़ी खूबी सामूहिकता यानी पूरे समाज के बारे में विचार करना इसे अपनाया और आजीवन वे पूरे समाज के लिए संघर्ष करते रहे.

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Shibu Soren Religion : झारखंड के महानायक और आदिवासियों के सर्वमान्य नेता शिबू सोरेन के 81 वर्ष में निधन के बाद पूरा देश उनके बारे में जानने का इच्छुक है. शिबू सोरेन एक राजनेता बाद में थे वे पहले एक आंदोलनकारी थे, जिन्होंने आदिवासियों के हक और अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और सबके दिशोम गुरु यानी पथ प्रदर्शक बने. शिबू सोरेन के जीवन से जुड़ी छोटी-बड़ी चीजों के बारे में लोग जानना चाहते हैं, इसी क्रम में एक सवाल पूछा जा रहा है कि गुरुजी शिबू सोरेन का धर्म क्या था?

संताल आदिवासी थे शिबू सोरेन

दिशोम गुरु शिबू सोरेन संताल आदिवासी थे. आदिवासी यानी देश के सबसे पुराने वासी. संताल आदिवासी झारखंड के आदिवासियों में जनसंख्या के लिहाज से सबसे बड़ी जनजाति है. संताल आदिवासी ऑस्ट्रो-एशियाई भाषा परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित हैं और संताली भाषा बोलते हैं. संताल आदिवासी झारखंड के अलावा, बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा और त्रिपुरा में भी निवास करते हैं.

संताल आदिवासी प्रकृति पूजक हैं और मरांग बुरू उनके सर्वोच्च देवता

संताल आदिवासी भी अन्य आदिवासियों की तरह प्रकृति पूजक हैं. ये मरांग बुरू को अपना सर्वोच्च देवता मानकर उसकी पूजा करते हैं. संताल आदिवासी यह मानते हैं कि मरांग बुरू ने ही इस सृष्टि की रचना की है और वही इसके पालनकर्ता हैं. मरांग बुरू को नदी, पहाड़ों और जंगलों के रूप में पूजा जाता है. संताल आदिवासी जाहेर थान में अपनी पूजा करते हैं, जो उनके लिए एक पवित्र स्थल होता है और पूजा सामूहिक तौर पर की जाती है. संतालों के धर्मगुरु सोमाई किस्कू बताते हैं कि मरांग बुरू हमारे सर्वोच्च देवता हैं हम उनकी सर्वोच्चता में विश्वास करते हैं, उनके अलावा भी हमारे कुछ देवता और देवी हैं, जिनकी पूजा होती है. संताली भाषा की असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ दुमनी माई मुर्मू बताती हैं कि मरांग बुरू हमारे सर्वोच्च देवता है. संताली जाहेर थान में जाहेर आयो की पूजा भी करते हैं, जो देवी का स्वरूप हैं. जाहेर थान में पत्थर और सखुआ का पेड़ होता है और उसकी पूजा की जाती है.

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संताल आदिवासियों में अंतिम संस्कार की विधि

संताल आदिवासियों में अंतिम संस्कार के रूप में ज्यादातर जलाने की परंपरा मौजूद है, लेकिन स्थान विशेष और परिस्थिति विशेष में दफनाने की परंपरा भी है. जैसे कि अगर किसी बच्चे की मौत हो, किसी गर्भवती स्त्री की मौत हो तो उसे दफनाया जाता है. इसी वजह से गुरुजी शिबू सोरेन के पार्थिव शरीर को जलाया जा रहा है. उनका पुत्र उन्हें अग्नि प्रदान करेगा. धर्मगुरु सोमाई किस्कू बताते हैं कि हमारे यहां ज्यादातर जलाने की परंपरा है. बड़ा बेटा आग देता है, लेकिन गुरुजी का बड़ा बेटा तो जीवित है नहीं इसलिए हेमंत सोरेन या बसंत सोरेन में से कोई उन्हें अग्नि देगा. उसके बाद उनकी अस्थि नदी में प्रवाहित होगी. शुद्धता के लिए तेल नहान की परंपरा होती है और उसके बाद श्राद्धकर्म होता है.डाॅ दुमनी माई मुर्मू बताती हैं कि हमारे यहां जब किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की मौत होती है तो गाजे-बाजे का प्रयोग शवयात्रा में होता है. शव को जलाया जाता है या तो उसे दफनाया जाता है. उसके बाद शुद्धता के लिए तेल नहान की विधि होती है, जिसमें घर के स्त्री-पुरुष स्नान करते हैं और फिर ‘उम्बुल आदेर’ यानी आत्मा को घर बुलाने की विधि होती है. उसके बाद दशकर्म यानी भंडान होता है, जिसमें परिवार और गांव के लोगों के लिए भोज की व्यवस्था होती है.

प्रबुद्ध संताली रजनी मुर्मू बताती हैं कि हमारे समाज में अंतिम संस्कार को लेकर कोई कठोर नियम नहीं हैं. घर से शव को निकाल दिये जाने के बाद घर और परिवार की महिलाएं नदी पर स्नान के लिए जाती हैं, उसी तरह पुरुष अंतिम संस्कार के बाद स्नान करते हैं और घर में शुद्धिकरण होता है. उसके बाद सबकुछ शुद्ध मान लिया जाता है. अंतिम संस्कार में भी बाध्यता नहीं है कि आपको जलाना है या दफनाना है आपकी मर्जी पर है. हां, ज्यादातर लोग शव को जलाते हैं, जहां तक श्राद्धकर्म की बात है, तो वो परिवार के पास जब संसाधन होगा सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं, इसमें कोई टाइम लिमिट नहीं है, लेकिन जल्दी करना लोग चाहते हैं.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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