POK Protests Explained : क्यों जल रहा है पीओके, भारत से पाकिस्तान गए शरणार्थी क्यों बने हैं विवाद की वजह?

Edited by Rajneesh Anand
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पीओके में प्रदर्शन

POK Protests :1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ, उस वक्त कश्मीर ने खुद को आजाद घोषित किया था, बाद में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि कश्मीर के राजा हरिसिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज( Instrument of Accession ) पर साइन किया था. इस दस्तावेज के साइन होने के बाद कश्मीर भारत का अंग तो बन गया, लेकिन जम्मू- कश्मीर पर पाकिस्तान की गंदी नजर हमेशा रही. 1947-48 के युद्ध और सीजफायर की वजह से जम्मू-कश्मीर का कुछ हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है. पाक अधिकृत उसी जम्मू-कश्मीर में 29 सिंतबर से अशांति है और स्थानीय लोग अपनी 38 मांगों के समर्थन में सड़क पर हैं. आइए समझते हैं क्या है पूरा मामला:-

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POK Protests : पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में 29 सितंबर से शुरू हुआ प्रदर्शन अभी जारी है. इस प्रदर्शन के दौरान अबतक 9 लोगों की मौत हुई है, जिनमें 3 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं. पीओके में जो प्रदर्शन हो रहा है उसकी वजह कोई हालिया घटनाएं नहीं हैं,बल्कि इसकी जड़ें काफी पुरानी हैं और पिछले दो साल में यह काफी मजबूत हुईं हैं. 2023 में बिजली बिल की बढ़ती दरों और सस्ते अनाज की मांग को लेकर यह प्रदर्शन शुरू हुआ था. अब इस प्रदर्शन का उद्देश्य स्थानीय लोगों को सुविधाएं देने और उनके लिए जीवन आसान बनाने से जुड़ गया है.

पीओके(POK) में क्यों हो रहा है प्रदर्शन

पाक अधिकृत कश्मीर यानी पीओके में अभी जो अशांति फैली हुई है, उसकी शुरुआत 29 सितंबर से हुई है. पीओके के लोग अपनी कुछ मांगों के लिए सड़क पर उतरे हैं, उनका नेतृत्व संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है. इस कमेटी में छात्र, व्यापारी और नौकरीपेशा लोग शामिल हैं. वे अपने विभिन्न मांगों को लेकर सड़क पर उतरे हैं. 29 सितंबर को इन्होंने यहां बंद बुलाया था, लेकिन पुलिस ने उनके खिलाफ एक्शन लिया जिसकी वजह से स्थिति खराब हो गई और 9 लोगों की मौत भी हुई. पीओके में जो प्रदर्शन हो रहा है उसकी शुरुआत लगभग दो साल पहले हुई थी, जब बिजली बिल की दरों में वृद्धि और सब्सिडी वाली गेहूं की मांग को लेकर लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था.

पीओके (POK) में प्रदर्शन की वजह क्या है?

POK Protests
क्यों जल रहा है पीओके

पीओके में रहने वाले कश्मीरियों को ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तान सरकार उनके साथ न्याय नहीं कर रही है और उनके हक की चीजों पर उनसे ज्यादा हक किसी और का है और इसी वजह से वे आंदोलन कर रहे हैं. प्रदर्शनकारियों की कुल मांगे हैं, जिनमें से सबसे प्रमुख मांग है 12 विधानसभा सीटों को समाप्त करना जो जम्मू-कश्मीर के उन प्रवासियों के लिए आरक्षित हैं, जो पीओके में नहीं बल्कि पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहते हैं. पीओके के लोगों का कहना है कि पाकिस्तान सरकार इन सीटों का दुरुपयोग करती है और यहां से ऐसे लोग चुनकर आते हैं, पाकिस्तान सरकार की कठपुतली होते हैं और उन्हें यहां के स्थानीय लोगों की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं होता है. यहां के मंगला डैम से सबसे अधिक विद्युत उत्पादन होता है, लेकिन यहां के लोगों को महंगी दर पर बिजली मिलती है.यहां के लोग एलिट क्लास के लोगों को मिलने वाले विशेषाधिकार का भी विरोध करते हैं, जिसके तहत उन्हें अपनी गाड़ियों के लिए अनलिमिटेड ईंधन मिलता है.

पीओके में कैसे चलता है शासन, कितनी हैं विधानसभा की सीटें

पाक अधिकृत कश्मीर की जनसंख्या 2017 की जनगणना के अनुसार 40 लाख थी, जो अनुमानत बढ़कर 45 लाख के करीब हो गई होगी. कहने के लिए पीओके स्वायत्त क्षेत्र है, लेकिन यहां का पूरा संचालन पाकिस्तानी संसद से होता है. हालांकि यहां एक प्रधानमंत्री होता है और पीओके के अपनी विधानसभा भी है. इस विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, जिनमें से सामान्य सीट 33 है. 12 सीट उन रिफ्यूजी कश्मीरियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान में बसे हुए हैं. महिलाओं के लिए 5, उलेमा और सूफीवादियों के लिए 1, विदेश में बसे कश्मीरियों के लिए 1 और टेक्नोक्रेट्‌स के लिए 1 सीट रिजर्व हैं. यहां की विधानसभा प्रदेश के कार्यों को स्वरूप देती है, लेकिन विदेश मामलों और सेना के कार्य पाकिस्तान से संचालित होते हैं. यहां जो बिजली उत्पादन होता है, उसपर भी पाकिस्तान सरकार का ही नियंत्रण होता है.

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जम्मू-कश्मीर से पीओके की ओर किसने पलायन किया था?

मुसलमानों ने पीओके की ओर पलायन किया था.

जम्मू-कश्मीर का कुछ हिस्सा पीओके कैसे बन गया?

1949 में जब भारत-पाकिस्तान युद्ध में सीजफायर हुआ, तो पाकिस्तानी आर्मी को कश्मीर के पूरे क्षेत्र से बाहर नहीं किया गया, जिसकी वजह से भारत के कश्मीर का कुछ हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में रह गया.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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