बांग्लादेश की राह पर है नेपाल, केपी ओली के इस्तीफे से खतरा बढ़ा, 4 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा विवाद
नेपाल में विरोध प्रदर्शन
Nepal News : पड़ोसी देश नेपाल युवाओं के गुस्से की आग में जल रहा है. सोशल मीडिया पर बैन तो इस गुस्से का ट्रिगर प्वाइंट बना है, प्लाॅट पहले से तैयार हो रहा था. नेपाल में जिस तरह राजनीतिक अस्थिरता रहती है, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी की समस्या से जनता त्रस्त है, वैसे में सोशल मीडिया बैन ने आंदोलन के ट्रिगर को दबा दिया. परिणाम सबके सामने है, अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर नेपाल में आगे क्या होने वाला है?
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Nepal News : पड़ोसी देश नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को लेकर युवाओं का गुस्सा फूटा है और वे सड़क पर हैं. सोमवार को विरोध प्रदर्शन के दौरान यहां 19 लोगों की मौत हो गई है. जेन जेड के प्रदर्शन के बाद वहां की सरकार ने देर रात सोशल मीडिया पर से प्रतिबंध को हटा दिया, लेकिन विरोध तब भी नहीं थमा. अंतत: प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. ऐसी सूचना है कि उनसे आर्मी चीफ ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए इस्तीफा देने का आग्रह किया था. बैन हटाने के बाद प्रधानमंत्री केपी ओली ने कहा था कि जेनरेशन जेड का जो विरोध प्रदर्शन हुआ, उसके लिए स्थिति की ‘अस्पष्टता’ जिम्मेदार है. उन्होंने विरोध प्रदर्शन को अप्रिय स्थिति बताया और कहा कि हमने जिस प्रकाश सोशल मीडिया को व्यवस्थित तरीके से रजिस्टर्ड करने की कोशिश की, उसे हमारे युवा समझ नहीं पाए, एक अस्पष्ता की स्थिति बनी. इसी अस्पष्टता ने इतने लोगों की जान ले ली.
नेपाल में युवा अभी भी सड़क पर हैं और गृह, स्वास्थ्य और कृषि मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है. ऐसी सूचना भी है कि आंदोलन के समर्थन में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के 21 सांसद इस्तीफा देंगे. अब जो स्थिति बन रही है, उसे देखकर तो यही लग रहा है कि जेन जी का यह आंदोलन नेपाल में बड़े बदलाव की कहानी लिखेगा. पूरे घटनाक्रम के प्रमुख प्वाइंट्स को समझें:-
सोशल मीडिया पर बैन क्यों लगाया गया
नेपाल सरकार ने सोशल मीडिया पर छह सितंबर को बैन लगाया था. इस बैन के पीछे वजह यह बताई गई कि इनकी वजह से देश में अशांति फैलाई जा रही है और लोकतंत्र को नुकसान हो रहा है. फेक न्यूज को बढ़ावा देने का भी आरोप सोशल मीडिया पर लगा था.
जेन जेड ने क्यों किया विरोध प्रदर्शन
जेन जेड का आरोप है कि सरकार अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगा रही है और लोगों पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है. युवाओं का कहना है कि सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम कस नहीं पा रही है और युवाओं पर प्रतिबंध लगा रही है. युवाओं की समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है. युवा बेरोजगारी की समस्या से परेशान हैं, देश में गरीबी है और सरकार में बैठे लोग ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे हैं.

नेपाल में जारी हिंसा के बारे में बात करते हुए साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी ने कहा कि नेपाल में जो कुछ हो रहा है उसकी पृष्ठभूमि पहले से तैयार हो रही थी. सोमवार 8 सितंबर को जितने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ, उसकी उम्मीद सरकार को नहीं थी, जनता का गुस्सा फूटा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जनता देश की राजनीतिक अस्थिरता से त्रस्त है. पहले यहां राजशाही थी, फिर संवैधानिक राजशाही हुई और फिर रिपब्लिक शासन व्यवस्था हुई. बावजूद इसके सरकार स्थिर नहीं रहती है. राजनीतिक पार्टियों के बीच खींचतान चलती है, परिणाम यह होता है कि सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती हैं. 2015 से अबतक नेपाल में 11 बार 15 प्रधानमंत्री बदले हैं, इस स्थिति से जनता में नाराजगी थी. भ्रष्टाचार और बेरोजगारी भी आंदोलन के पीछे की बड़ी वजह है. केपी ओली की सरकार और उनके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, कई ऐसे केस सामने आए हैं, जिसमें मंत्री और उनके परिजन सुविधाभोगी जीवन जी रहे हैं, जबकि जनता परेशान है. उसपर सोशल मीडिया बैन कर सरकार ने विरोध के ट्रिगर को दबा दिया.
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सोशल मीडिया से सैकड़ों नेपालियों का चल रहा व्यवसाय
नेपाल में कई छोटे व्यापारी और ई काॅमर्स बिजनेस सोशल मीडिया पर बेस्ड थे. एप्स पर बैन होने से इन लोगों को बड़ा नुकसान हुआ. कई ऐसे युवा भी हैं, जो बेरोजगारी की वजह से इन एप्स के जरिए पैसे कमा रहे थे, उनमें भी काफी नाराजगी देखी गई, उसपर सरकार ने अचानक से इन एप्स को बंद कर दिया. रजिस्ट्रेशन की जो प्रक्रिया की जा रही थी, उसके लिए समय नहीं दिया गया.
केपी ओली के इस्तीफे के बाद क्या होगा?
युवाओं के आंदोलन के बाद केपी ओली की सरकार भारी दबाव में थी. युवाओं का आंदोलन काठमांडू से निकलकर दूसरे शहरों में भी फैलने लगा है. जिस तरह की सूचनाएं आ रही हैं, युवाओं का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ है. वे लगातार अपना प्रदर्शन कर रहे हैं. राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने आंदोलन को समर्थन देने का संकेत दे दिया है, ऐसी परिस्थिति में प्रधानमंत्री केपी ओली पर दबाव बहुत ज्यादा था और अंतत: उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया. इसकी वजह यह है कि देश में स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है. युवाओं का गुस्सा नियंत्रित नहीं हो रहा है, वे सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं और यह भी सूचना आई कि वित्तमंत्री की बुरी तरह पिटाई कर दी गई है. प्रोफेसर धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि केपी ओली ने जिस तरह से तानाशाही रवैया रखा था, उनके लिए यह बहुत मुश्किल घड़ी थी. नेपाल में आंदोलनों का इतिहास रहा है और उसके बाद सरकारें बदलती भी रही हैं. प्रधानमंत्री केपी ओली पर भारी दबाव था जिसकी वजह से उन्होंने इस्तीफा दिया है. अभी आगे क्या होगा इसपर कुछ कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी, सोशल मीडिया पर से बैन हटाने का फैसला सही है, लेकिन कुछ और ऐसे फैसले लेने होंगे, जो जनता को संतुष्ट कर सके. अन्यथा परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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