Mughal Harem Stories : मुगल हरम में बुढ़ापा मौत से बदतर, मरने के लिए अकेले कमरे में छोड़ दी जाती थीं औरतें

Edited by Rajneesh Anand
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मुगल हरम में बूढ़ी औरतें

Mughal Harem Stories : बुढ़ापे के बारे में एक कहावत प्रचलित है-ना नारी रिझे, ना रिपु डरे, ना आदर करे नरेश. कुल मिलाकर यह कहा जा रहा है कि बुढ़ापा वह स्थिति है, जिसमें शारीरिक आकर्षण खत्म हो जाता है और इंसान की शक्ति भी खत्म हो जाती है. इस वजह से ना कोई उसकी ओर आकर्षित होता है और ना शत्रु और राजा सम्मान करते हैं. बस इसी स्थिति की शिकार मुगल हरम की औरतें भी बुढ़ापे में हो जाती थीं. उस वक्त विज्ञान ने इतनी तरक्की भी नहीं की थी, इसलिए उनका इलाज भी सही तरीके से नहीं पाता था. परिणाम यह होता था कि वे उपेक्षित हो जाती थीं और अकेली रह जाती थीं.

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Mughal Harem Stories : मुगल हरम की शान ऐसी थी कि महिलाओं को सोने के बने कपड़े गिफ्ट मिलते थे और वे हीरे और जवाहारात से लदी होती थीं. बादशाह जब उनके कमरे में आते और उससे खुश होते तो उसपर करोड़ों रुपए लुटा सकते थे. यह तो बात हुई किसी औरत की जवानी की, लेकिन वही औरत जब बूढ़ी हो जाती थी या बादशाह की मौत उससे पहले हो जाती थी तब क्या होता था? मुगल हरम के बारे में ऐसी कई कहानियां प्रचलित हैं, जिसमें यह कहा जाता है कि हरम में बुढ़ापा श्राप की तरह था.

बुढ़ापा कई बार मौत से बदतर क्यों हो जाता था?

किशोरी शरण लाल अपनी किताब में The Mughal Harem में लिखते हैं-पुराने समय में बुढ़ापे की सबसे बड़ी समस्या बीमारी थी. उस समय इलाज के बहुत कम और सीमित तरीके थे. इलाज की दवाइयां विकसित नहीं थी, इस वजह से आम बीमारियां भी जानलेवा हो जाती थीं. टीबी, बुखार, हैजा, लू लगना, गठिया, पथरी, लकवा जैसी बीमारियां होने पर इलाज नहीं हो पाता था. बीमार औरतों का इलाज तो कराया जाता था, लेकिन वो पर्याप्त नहीं होते थे, जिस वजह से बुढ़ापा और उससे संबंधित बीमारियां उनके लिए मौत से बदतर हो जाती थीं.

हालांकि यह स्थिति हर औरत की नहीं थी. जो खास औरतें होती थीं, उनका खास ख्याल रखा जाता था और उनका सम्मान भी बहुत होता था. बूढ़ी औरतें हरम में राजकुमारों का ख्याल रखती थीं, झगड़े निपटाती थीं और बादशाह की प्रिय भी बनी रहती थीं.

हरम में बूढ़ी औरतों के साथ क्या होता था?

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हरम में बूढ़ी औरत

हरम को बुढ़ापे के लिए सही जगह नहीं माना जाता था. हरम आनंद और की जगह था, जहां जवान महिलाएं बादशाह के साथ जीवन का लुत्फ उठाती थीं. वहां बुढ़ापे और बीमारी के लिए जगह नहीं थी. जो औरतें बीमार हो जाती थीं उन्हें बीमारखाने में पहुंचा दिया जाता था. अगर इलाज से वो सही हो गईं, तो ठीक अन्यथा वो मर जाती थीं. उनकी खातिरदारी उस तरह नहीं की जाती थी कि वे मुगल हरम के लिए बहुत जरूरी हों.

किशोरी शरण लाल लिखते हैं कि आम तौर पर हरम में मौत को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था, बशर्ते कि वह किसी खास या बेहद प्रिय व्यक्ति की मौत ना हो. अगर कोई बीमार होता तो उसे बीमार खाना नामक कमरों में ले जाते थे; अगर ठीक हो गया तो ठीक, नहीं तो किसी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था. यानी यह माना जा सकता है कि मुगल काल में जवानी के दिन तो बेहतरीन होते थे, लेकिन बुढ़ापा उपेक्षा और बदहाली में गुजरता था.

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हरम में पति से पहले मौत क्यों बेहतर मानी जाती थी?

मुगलों में पर्दा प्रथा का पालन बहुत ही कड़ाई से किया जाता था. इस वजह से भी महिलाओं का उचित इलाज नहीं पाता था. मुगलकाल के इटालियन चिकित्सक मनुची ने लिखा है कि महिलाएं सिर्फ अपनी नाड़ी बाहर कर इलाज करती थीं. कई बार तो रूमाल में पसीने को भिगा कर भेजा जाता था और पसीने की गंध से यह पता करना पड़ता था कि बीमार स्त्री क कौन से बीमारी है. इस वजह से उन्हें सही इलाज नहीं मिलता था और वे बीमार होकर कई बार मर भी जाती थीं.

किशोरी शरण लाल लिखते हैं कि कोई भी इलाज या दान बूढ़ी और बीमार महिलाओं का जीवन नहीं बचा सकता था. इसलिए उन्हें उपेक्षित होना पड़ता था. विदेशी यात्री विलियम फिंच ने लिखा है कि विधवा होना और वृद्ध होना बहुत दुखद और अकेला जीवन था. इसलिए कहा जाता था कि स्त्री के लिए सबसे अच्छा यही था कि वह अपने पति से पहले मर जाए.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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