Mughal Harem Stories : जब राजपूत महिलाओं का था हरम पर राज, कई दिनों तक मांस पकाने पर थी रोक
मुगल हरम में राजपूत रानियां
Mughal Harem Stories : मुगल, तुर्क-मंगोल वंश के थे, जिन्हें तुरानी कहकर भी संबोधित किया जाता है. इन्होंने अपने कुल का मान बनाए रखने के लिए अधिकतर शादियां ईरानी और तुर्कानी महिलाओं से की, लेकिन साम्राज्य विस्तार के दौरान इनका संबंध राजपूत रानियों से भी हुआ. राजपूत रानियां जब मुगल हरम पहुंची, तो अपने साथ लेकर आईं, हिंदू संस्कृति और उनकी पूजा विधि. अकबर के काल में सबसे अधिक राजपूत रानियां हरम में पहुंची और उनका प्रभाव भी दिखा. इस प्रभाव ने हरम की परंपराओं, खान-पान और त्योहारों पर असर डाला. हालांकि बाद के दिनों में कट्टरपंथियों को यह पसंद नहीं आया, जिसकी वजह से विवाह कम हुए, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि राजपूत रानियों ने हरम में अपने लिए जगह बनाई. उस जगह पर वे अपने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार ही जीती थीं, जिसका असर हरम की राजनीति पर भी पड़ा.
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Mughal Harem Stories : मुगल हरम में बादशाह के लिए विभिन्न देशों और नस्लों की महिलाएं रहती थीं. यह भी एक सच्चाई है कि मुगल हरम जिसका आकार इतना बड़ा था कि वहां सिर्फ आनंद ही नहीं होता था, वहां साजिशों का दौर भी चलता था और अवसाद और तनाव के पल खूब होते थे. कई बार राजा को प्रभावित करने के लिए औरतें एक दूसरे को नीचा भी दिखाती थीं, लेकिन हरम में चलती उसी की थी, जो राजा की प्रिय हुआ करती थीं. हरम के इतिहास में एक दौर ऐसा भी आया था, जब राजपूत औरतों का यहां वर्चस्व था और उनकी वजह से हरम में कई दिनों तक मांस पकना भी बंद हुआ था.
हरम पर कब था राजपूत महिलाओं का वर्चस्व?

मुगल हरम में ईरानी, तुरानी और भारतीय महिलाएं रहा करती थीं. उनका संबंध विभिन्न क्षेत्रों, जातीय समूहों और धर्मों से था. इस वजह से उनके बीच सांस्कृतिक अलगाव था, बावजूद इसके वे बादशाह की वजह से जुड़ी होती थीं, क्योंकि अंतत: वे सभी बादशाह का प्रेम चाहती थीं. जिस स्त्री को बादशाह का प्रेम मिलता, हरम में उसी की बादशाहत चलती थी. बादशाह को प्रभावित करने की प्रतियोगिता में स्त्रियों के बीच संघर्ष, तनाव और गुटबाजी भी होती थी. इन औरतों के बीच संघर्ष का कारण कई बार दरबार की राजनीति और उनके धर्म भी होते थे.
मुगल साम्राज्य के विस्तार के साथ ही इसमें भारतीय राजाओं और राजकुमारियों का प्रभुत्व भी बढ़ा. राजनीतिक समझौते के तहत हुई शादियां के बाद कई राजपूत औरतें मुगलों के हरम तक पहुंची. हरम में राजपूत रानियों के प्रवेश ने एक ओर जहां मुगल-राजपूत मित्रता को बल दिया, वहीं हरम में राजपूत महिला का प्रभुत्व भी बढ़ाया. अकबर के काल में राजपूत रानियों का प्रभाव हरम में बढ़ा था और उन्होंने अपनी सभ्यता संस्कृति से हरम पर भी खासा प्रभाव डालाा.
राजपूत रानियों का हरम पर क्या हुआ प्रभाव?
अकबर की सबसे प्रिय रानियों में हरकाबाई बाई या जोधाबाई का जिक्र आता है, जिसे मुगल दरबार में मरियम उज जमानी के नाम से जाना जाता था. अकबर की अन्य कई रानियां और उपपत्नियां भी राजपूत थीं. बादशाह अकबर के काल में हरम में सबसे अधिक राजपूत रानियां हुआ करती थीं. इन राजपूत रानियों ने हरम की संस्कृति, परंपराओं, त्योहारों और खानपान पर विशेष प्रभाव डाला था. इतिहासकार किशोरी शरण लाल ने अपनी किताब The Mughal Harem में लिखा है कि इन रानियों की वजह से दीपावली, होली, दशहरा, रक्षाबंधन जैसे त्योहार मुगल महल में मनाए जाने लगे.
ये रानियां अपनी धार्मिक पहचान बनाए रखती थीं जैसे कि वे अपनी पूजा विधि नहीं छोड़ती थीं और पूजा, भजन और यज्ञ करती थीं. जिसकी वजह से हरम की परंपराओं में काफी बदलाव हुआ. त्योहारों के साथ-साथ हरम की रसोई पर भी राजपूत रानियों का प्रभाव दिखा. अब मांसाहार रोज नहीं पकते थे, सप्ताह के कई दिन शाकाहारी भोजन भी बनाए जाने लगे. गौमांस हरम से पूरी तरह प्रतिबंधित हो गया. बादशाह अकबर भी उनकी पूजा विधियों में शामिल होते थे. उन्होंने राजपूतों के प्रति सम्मान दिखाते हुए रिश्तेदारियों को मजबूती दी. राजकुमार दानियाल को उन्होंने परवरिश के लिए उसकी नानी के पास भेजा, जो एक हिंदू महिला थी. इन संबंधों की वजह से मुगल हरम में धार्मिक सहिष्णुता बढ़ी और हिंदू दार्शनिक विचारों व ज्योतिष का भी प्रभाव पड़ा.हालांकि समय के साथ इन प्रभावों को लेकर विवाद भी बढ़ा और अकबर के बाद राजपूत रानियों का महत्व कम होने लगा.
हरम में राजपूत रानियों का महत्व कितना रहा?

किशोरी शरण लाल के अनुसार हरम में राजपूत रानियों का प्रभाव कम और ज्यादा होता रहा, लेकिन यह बात बिलकुल सच है कि जो भी राजपूत राजकुमारी हरम का हिस्सा बनीं, उन्हें एक सम्मान हमेशा मिला. अकबर के बाद के राजपूत राजकुमारियों से मुगलों ने विवाह कम किए. खासकर शाहजहां और औरंगजेब के समय में राजपूत विवाह कम हो गए. राजपूत रानियों का दरबार में दखल बहुत नहीं था, लेकिन उनका महत्व था. इसकी वजह यह थी मुगलों के दो बादशाह जहांगीर और शाहजहां दोनों ही हिंदू राजपूत रानियों के बेटे थे. हालांकि उस वक्त भी कट्टरपंथी मुसलमान मुगलों से राजपूतों की शादी को अच्छा नहीं मानते थे, इसी वजह से अकबर के बाद इस तरह के विवाह कम हो गए.
शाहजहां और औरंगजेब की तो बहुत कम हिंदू रानियां थीं. जहांगीर की पत्नी नूरजहां ने भी राजपूत रानियों के महत्व को कम करने में अहम रोल अदा किया. किशोरी शरण लाल लिखते हैं कि जहांगीर की पत्नी नूरजहां जब से मुगल हरम में आईं, तब से वहां की राजनीति और निर्णयों पर उनका बहुत प्रभाव पड़ने लगा. नूरजहां और उनका परिवार दरबार में अत्यंत प्रभावशाली हो गया. उनके आने के बाद, राजपूत राजकुमारियों से विवाह कम होने लगे और मुगल बादशाहों व राजकुमारों ने ज्यादातर ईरानी और तुर्कानी (मुस्लिम कुलीन परिवारों) की लड़कियों से शादियां कीं.मुगल परिवार खुद तुरानी मूल का था, इसलिए तुर्क एवं फारसी (ईरानी) संस्कृति का असर बढ़ता चला गया. मुगल दरबार और हरम में फारसी भाषा, पहनावा, खान-पान और फारसी शिष्टाचार पूरी तरह हावी हो गया.
क्या मुगलों के पास हरम होते थे?
हां, मुगलों के पास हरम होते थे, जिसमें उनकी मां, दादी, चाची, फुआ, बहनें,पत्नियां सहित अन्य औरतें रहती थीं.
क्या किसी मुगल बादशाह ने अपनी बेटी से शादी की थी?
नहीं किसी भी मुगल बादशाह ने अपनी बेटी से शादी नहीं की थी. बादशाह शाहजहां के बारे में यह अफवाह है कि उसने अपनी बेटी जहांआरा के साथ निकाह किया था. दरअसल मुमताज की मौत के बाद उसकी ही तरह दिखने वाली जहांआरा ने अपनी पिता की बहुत देखभाल की थी, यहां तक कि जब औरंगजेब ने उन्हें कैद कर लिया था, तब भी जहांआरा ने उनकी देखभाल जेल में की थी. उनके प्रगाढ़ रिश्तों को कुछ लोग गलत तरीके से परिभाषित करते हैं.
राजपूतों ने अपनी बेटियों की शादी मुगलों से क्यों की?
राजपूतों ने अपनी बेटियों की शादी मुगलों से राजनीतिक समझौते के तहत की थी, ना कि वे सहर्ष उनके साथ विवाह संबंध बनाना चाहते थे.
मुगलों को 17 बार किसने पराजित किया?
अहोम साम्राज्य जो वर्तमान में असम का हिस्सा है, उसका प्रसिद्ध राज्य था. इसके शासकों ने 1228 से 1826 तक राज किया और मुगलों को पराजित कर उन्हें उस इलाके में प्रवेश से रोका.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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