जोहर. आज है 30 जुलाई. आज से सावन शुरू हो चुका है.देशभर में शिवालयों की घंटियां बज रही हैं. कहीं कांवड़ यात्रा निकल रही है, कहीं जलाभिषेक की तैयारी है. लाखों लोग काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, महाकाल और बैद्यनाथ धाम की ओर बढ़ रहे हैं.लेकिन जरा ठहरिए.अगर कोई आपसे पूछे कि... क्या कभी कश्मीर में भी एक ऐसा शिव धाम था, जिसे लोग काशी के बराबर मानते थे?शायद बहुत कम लोग इसका जवाब दे पाएंगे.क्योंकि इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है.जो सभ्यताएं कभी पूरी दुनिया को रास्ता दिखाती हैं, समय बीतने के साथ उनकी सबसे बड़ी लड़ाई अपने ही लोगों की स्मृति में बने रहने की होती है.आज की सनातन-यात्रा हमें South Kashmir के Anantnag जिले के एक ऐसे स्थान पर लेकर चलती है, जिसका नाम आज बिजबेहडा है, लेकिन जिसे कभी विजेश्वर कहा जाता था. एक ऐसा तीर्थ, जिसका उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है, जिसकी कहानी Rajtarangini में दर्ज है और जिसके बारे में लोककथाएं आज भी सांस लेती हैं.यह केवल एक मंदिर की कहानी नहीं है.यह उस कश्मीर की कहानी है, जिसे अक्सर उसकी प्राकृतिक सुंदरता से याद किया जाता है, लेकिन जिसकी असली पहचान उसकी हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत भी रही है. इस सिलसिले में हमने कश्मीर में सनातन परंपराओं को बचाए रखने के लिए समर्पित 25 वर्षीय Gen Z और कश्मीरी हिंदू, ईशा बहल से बात की. उनकी इस पहल को YouTube और Instagram पर दर्शकों से बहुत ज्यादा समर्थन और प्यार मिला है. आगे की कहानी, उन्हीं की जुबानी...जब कश्मीर में भी बसता था एक काशीबिजबेहडा का प्राचीन नाम था विजेश्वर.'विजेश्वर' यानी विजय के ईश्वर, भगवान शिव.समय बदला. भाषा बदली. कश्मीरी बोली में यह नाम विजब्रोर बना और फिर धीरे-धीरे बदलकर आज का बिजबेहडा हो गया.लेकिन नाम बदलने से इतिहास नहीं बदलता.सभ्यताएं केवल राजाओं के नाम से नहीं बचतीं. वे अपने तीर्थों, नदियों और स्मृतियों से जीवित रहती हैं.विजेश्वर भी ऐसी ही एक स्मृति है.प्राचीन परंपराओं के अनुसार यह केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि पूरा क्षेत्र एक विशाल धार्मिक परिसर था.पूर्व में बहती थी पवित्र वितस्ता (Vitasta), जिसे आज हम झेलम (Jhelum) के नाम से जानते हैं.उत्तर में चक्रेश्वर.पश्चिम में जया देवी और विजया देवी के प्राचीन मंदिर.दक्षिण में हरिश्चंद्र घाट.इन चारों ने मिलकर ऐसा तीर्थ क्षेत्र बनाया, जिसे उस समय कश्मीर के सबसे पवित्र शैव केंद्रों में गिना जाता था.स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां स्थित हरिश्चंद्र घाट पर भगवान शिव का महत्व वही माना जाता था, जो वाराणसी में काशी विश्वनाथ का है.यही कारण है कि विजेश्वर को कई परंपराओं में कश्मीर का काशी कहा गया.इतना ऊंचा मंदिर कि उसकी परछाई भी कथा बन गईआज अगर कोई कहे कि कश्मीर में कभी 11 या 12 मंजिला पत्थर का मंदिर था, तो यह बात कहानी जैसी लग सकती है.लेकिन स्थानीय परंपराएं यही कहती हैं.कहा जाता है कि राजा विजय ने यहां एक ऐसा भव्य मंदिर बनवाया था, जिसकी ऊंचाई इतनी अधिक थी कि सूर्योदय के समय उसकी छाया अवंतीपुर की ओर और सूर्यास्त के समय मार्तंड यानी मटन की दिशा तक जाती दिखाई देती थी.हो सकता है इसमें लोककल्पना भी जुड़ गई हो.लेकिन लोककथाएं हमेशा झूठ नहीं होतीं.वे कई बार इतिहास की भावनात्मक स्मृति होती हैं.जब किसी इमारत की ऊंचाई लोगों की यादों में बची रह जाए, तो समझिए वह केवल स्थापत्य नहीं थी, वह एक युग की पहचान थी.आज जो मंदिर दिखाई देता है, वह मूल मंदिर नहीं है.ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वर्तमान संरचना का पुनर्निर्माण महाराजा गुलाब सिंह के शासनकाल में हुआ. पुराने मंदिर के अवशेषों और पत्थरों का उपयोग कर इसे फिर खड़ा किया गया.यानी आज का मंदिर केवल पत्थरों से नहीं बना.वह इतिहास के टूटे हुए पन्नों से दोबारा लिखा गया है.सम्राट अशोक से लेकर राजतरंगिणी तकइस स्थल का उल्लेख केवल लोककथाओं में नहीं मिलता.प्राचीन परंपराएं बताती हैं कि सम्राट अशोक ने यहां पत्थरों की एक परिधि बनवाई थी और उसके भीतर दो अशोकेश्वर मंदिर स्थापित कराए थे.यदि यह परंपरा सही है, तो इसका अर्थ है कि विजेश्वर की धार्मिक प्रतिष्ठा दो हजार वर्ष से भी अधिक पुरानी हो सकती है.इसके बाद आती है कल्हण की राजतरंगिणी.राजतरंगिणी बताती है कि राजा कलश के समय उनके पिता राजा अनंत का निवास विजेश्वर में था. एक भीषण आग लगी और नगर का बड़ा हिस्सा जलकर नष्ट हो गया.यानी यह केवल तीर्थ नहीं था.यह एक समृद्ध नगर था.जहां लोग रहते थे.व्यापार होता था.विद्या थी.जीवन था.इतिहास केवल युद्धों से नहीं बनता. इतिहास वहां भी बनता है, जहां लोग रोज सुबह उठकर नदी में स्नान करते हैं, मंदिर जाते हैं और अपने बच्चों को शिक्षा दिलाते हैं.वितस्ता केवल नदी नहीं, इतिहास की साक्षी हैकश्मीर की सभ्यता को समझना है, तो वितस्ता को समझना होगा.आज जिसे हम झेलम कहते हैं, वही प्राचीन वितस्ता है.इसी नदी ने ऋषियों को देखा.इसी ने राजाओं को देखा.इसी ने मंदिरों को बनते और टूटते देखा.और शायद इसी ने लोगों को लौटते हुए भी देखा होगा.हर नदी अपने किनारे की कहानी जानती है. वितस्ता भी जानती है कि उसके किनारे कभी कैसी सभ्यता सांस लेती थी.विजेश्वर इसी नदी के किनारे विकसित हुआ.यही कारण था कि यह केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि यात्रियों, विद्वानों और व्यापारियों का भी महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया.एक पत्थर, जिसे 11 लोग मिलकर उठाते थेहर प्राचीन तीर्थ के साथ कोई न कोई लोककथा जुड़ी होती है.विजेश्वर की सबसे प्रसिद्ध कथा है काह-काह पाल.हरे रंग का शंखाकार पत्थर.करीब 50 से 60 किलो वजन.मान्यता थी कि इसे कोई अकेला नहीं उठा सकता.लेकिन अगर 11 लोग एक साथ केवल एक-एक उंगली लगाएं और काह-काह बोलें, तो पत्थर ऊपर उठ जाता था.आज भी इंटरनेट पर इस परंपरा से जुड़े प्रदर्शन के वीडियो मिल जाते हैं.कुछ लोग इसे विज्ञान बताते हैं.कुछ सामूहिक संतुलन.कुछ लोकविश्वास.सच क्या है?शायद आज भी कोई निश्चित उत्तर नहीं है.लेकिन इससे भी दुखद बात यह है कि 1990 के दशक की उथल-पुथल में यह पत्थर ही गायब हो गया.आज उसका कोई पता नहीं है.प्रभात खबर सनातन विशेष : मणिपुर की सनातन यात्रा - 1: जहां सनातन ने किसी पर विजय नहीं पाई, बल्कि एक सभ्यता का हिस्सा बन गयाप्रभात खबर सनातन विशेष : Gen Z Special: Idea of Shiva ही है भारत की सबसे पुरानी कल्चरल यूनिटी का आधारView on Instagramकिसी समाज का सबसे बड़ा नुकसान तब नहीं होता, जब उसकी कोई वस्तु खो जाती है. सबसे बड़ा नुकसान तब होता है, जब उसके साथ जुड़ी कहानी भी खोने लगे.यह केवल शिव का मंदिर नहीं थामंदिर परिसर में भगवान विष्णु की एक प्राचीन प्रतिमा भी सुरक्षित है, जिसे आठवीं या नौवीं शताब्दी का माना जाता है.आज उसे लोहे की रेलिंग से सुरक्षित रखा गया है.यह छोटी सी बात नहीं है.यह बताती है कि कश्मीर की आध्यात्मिक परंपरा कभी संकीर्ण नहीं रही.यहां शिव भी थे.विष्णु भी.शक्ति भी.ज्ञान भी.सनातन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह विविधताओं को साथ लेकर चलता है. नदी बदल सकती है, पर उसका प्रवाह नहीं.पत्थरों में छिपी इंजीनियरिंगमंदिर के पास आज भी एक प्राचीन शिवलिंग मौजूद है.उसके साथ पत्थरों से बनी जल निकासी व्यवस्था भी दिखाई देती है.अभिषेक का जल किस दिशा में जाएगा, यह हजार साल पहले सोच लिया गया था.आज जब हम आधुनिक इंजीनियरिंग पर गर्व करते हैं, तब यह देखकर आश्चर्य होता है कि उस समय के शिल्पकार जल प्रबंधन को कितनी बारीकी से समझते थे.मंदिर केवल पूजा की जगह नहीं होते. वे अपने समय के विज्ञान, वास्तुकला और समाज के जीवित दस्तावेज होते हैं.जहां पूजा भी थी, शिक्षा भीइतिहासकारों के अनुसार विजेश्वर केवल धार्मिक केंद्र नहीं था.यह शिक्षा का भी महत्वपूर्ण केंद्र था.दूर-दूर से विद्यार्थी यहां आते थे.विद्वान रहते थे.शास्त्रार्थ होते थे.ज्ञान का आदान-प्रदान होता था.आज जब हम कश्मीर को केवल पर्यटन या संघर्ष के नजरिए से देखते हैं, तब यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि कभी यही घाटी भारत की ज्ञान परंपरा का भी प्रमुख केंद्र थी.कश्मीर को केवल संघर्ष से पढ़ेंगे, तो आधा कश्मीर ही समझ पाएंगे. पूरा कश्मीर समझना है, तो उसके मंदिर, मठ, शारदा और वितस्ता को भी पढ़ना होगा.फिर समय बदल गया...इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है कि सत्ता बदली और उसके साथ सांस्कृतिक परिदृश्य भी बदल गया.स्थानीय परंपराओं के अनुसार कश्मीर के अनेक मंदिरों की तरह विजेश्वर मंदिर को भी गंभीर क्षति पहुंची.समय, संघर्ष और उपेक्षा ने भी अपना असर छोड़ा.लेकिन इतिहास की एक खूबी होती है.वह पूरी तरह मिटता नहीं.कभी किसी पत्थर में बच जाता है.कभी किसी शिलालेख में.कभी किसी लोकगीत में.और कभी किसी बुजुर्ग की स्मृति में.खंडहर हमेशा हार की कहानी नहीं कहते. कई बार वे उस वैभव का प्रमाण होते हैं, जिसे समय भी पूरी तरह मिटा नहीं सका.सावन में यह कहानी क्यों याद रखनी चाहिए?सावन का अर्थ केवल जल चढ़ाना नहीं है.सावन का अर्थ अपनी जड़ों तक लौटना भी है.जब हम शिव को याद करते हैं, तो केवल प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों को ही नहीं, उन भूले हुए शिव धामों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने सदियों तक भारत की आध्यात्मिक चेतना को जीवित रखा.विजेश्वर ऐसा ही एक तीर्थ है.आज उसके शिखर नहीं बचे.उसकी ऊंचाई नहीं बची.उसकी पुरानी भव्यता भी नहीं बची.लेकिन उसकी कहानी अभी भी बची हुई है.और जब तक कहानी बची है, तब तक उम्मीद भी बची है.जिस सभ्यता के पास अपनी स्मृतियां बची रहती हैं, उसका भविष्य भी जीवित रहता है.अंत में...अगर कभी कश्मीर जाएं, तो केवल डल झील मत देखिए.केवल पहलगाम और गुलमर्ग मत देखिए.थोड़ा समय निकालकर बिजबेहडा भी जाइए.वितस्ता के किनारे खड़े होकर कल्पना कीजिए कि कभी यहां घंटियां बजती होंगी.ऋषि चलते होंगे.विद्यार्थी शास्त्र पढ़ते होंगे.यात्री दूर-दूर से आते होंगे.और एक विशाल शिव मंदिर इस पूरी घाटी की पहचान रहा होगा.शायद तब आपको समझ आएगा कि विरासत केवल वह नहीं होती, जिसे हम कैमरे में कैद कर लें.विरासत वह होती है, जिसे हम अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प लें.और शायद यही सनातन-यात्रा का उद्देश्य भी है.भूले हुए तीर्थों को फिर से याद करना.क्योंकि इतिहास का सबसे कठिन सवाल यह नहीं कि क्या बचा है.असली सवाल यह है कि हमने क्या भूल दिया है.प्रभात खबर UPSC पर खास कवरेज कर रहा है, ताकि आपको एक्सपर्ट गाइडेंस के लिए कहीं और न जाना पड़े. UPSC परीक्षाओं से जुड़ी सभी ताजा जानकारी के लिए हमारे साथ जुड़े रहें.प्रभात खबर UPSC Exclusive : UPSC : एक ख्वाब, कई इम्तिहानप्रभात खबर UPSC Exclusive Interview : आखिर UPSC इतना डरा क्यों रहा है? पटना वाले Eduteria का Exclusive Interviewप्रभात खबर UPSC Exclusive Interview : UPSC : 'Tina Dabi जहां भी होती, उसी समर्पण के साथ मेहनत करती'- Khan Sir का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू