आध्यात्म, अदालत और आरोपों में उलझी ईशा फाउंडेशन: आखिर इतना विवाद क्यों?

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आध्यात्म, अदालत और आरोपों में उलझी ईशा फाउंडेशन: आखिर इतना विवाद क्यों?

फोटो AI द्वारा बनाया गया है

योग, ध्यान और 112 फीट ऊंची आदियोगी प्रतिमा के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध ईशा फाउंडेशन की कहानी सिर्फ आध्यात्म तक सीमित नहीं है. पर्यावरणीय मंजूरियों से जुड़े विवाद, अदालतों की सुनवाई, सरकारी फैसलों और हालिया बिहार विवाद, इन सबने समय-समय पर संस्था को सुर्खियों में रखा. इन विवादों की शुरुआत कैसे हुई, आरोप क्या हैं, फाउंडेशन क्या कहता है और अब तक रिकॉर्ड क्या बताते हैं? आइए, पूरी कहानी समझते हैं.

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Isha Foundation Controversy : दक्षिण का कैलाश और सप्तगिरी के नाम से लोकप्रिय तमिलनाडु के कोयंबटूर में वेल्लियांगिरी की पहाड़ियां घूमने के लिए काफी मनोरम है. यहीं है वेल्लियांगिरी अंदावर (भगवान शिव) का स्वयंभू मंदिर , जिसके बारे में कहा जाता है कि यह 7 पहाड़ियों के कठिन ट्रैक का आधार बिंदु (Base Point of a Track) है. इन्हीं पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है, आध्यात्मिक गुरु और ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव का ईशा योग सेंटर और 112 फीट ऊंची आदियोगी प्रतिमा. जहां हर साल हजारों लोग योग और ध्यान के लिए पहुंचते हैं. ईशा योग सेंटर 150 एकड़ (लगभग 6,07,000 वर्ग मीटर) वाले परिसर के साथ समय-समय पर कई विवाद भी जुड़ा रहा है.

ईशा योग केंद्र से जुड़ा क्या है फाउंडेशन का सबसे बड़ा विवाद

सबसे चर्चित विवादों में से एक ईशा फाउंडेशन के निर्माण कार्यों और पर्यावरणीय मंजूरियों को लेकर रहा है. कुछ पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सरकारी अधिकारियों ने आरोप लगाया कि परिसर के कुछ हिस्सों का निर्माण आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरियों (Environmental Clearances) के बिना किया गया, जिससे हाथियों के प्राकृतिक आवागमन के रास्तों और वेल्लियांगिरी पहाड़ियों के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (Sensitive Ecosystem) पर असर पड़ने की आशंका है.

हालांकि, ईशा फाउंडेशन लगातार इन आरोपों से इनकार करता रहा है. संस्था का कहना है कि उसने पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण और जल संरक्षण के क्षेत्र में व्यापक काम किया है तथा उसके सभी निर्माण लागू कानूनों के अनुरूप हुए हैं. इसी विवाद से जुड़ा एक नया पहलू हाल ही में प्रकाशित न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट में सामने आया है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मद्रास हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जिस सरकारी स्पष्टीकरण (Government Clarification) का उल्लेख हुआ, वह कथित तौर पर ईशा फाउंडेशन के एक प्रतिनिधि के अनुरोध के बाद केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी किया गया था.

रिपोर्ट का दावा है कि इस स्पष्टीकरण का इस्तेमाल अदालत के समक्ष उपलब्ध रिकॉर्ड के हिस्से के रूप में हुआ, जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि ईशा फाउंडेशन के पुराने निर्माणों के लिए पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) आवश्यक नहीं थी. हालांकि, रिपोर्ट अदालत के फैसले को गलत नहीं बताती, बल्कि यह सवाल उठाती है कि इस स्पष्टीकरण को जारी करने की सरकारी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी (Transparent) और निष्पक्ष थी.

यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट में उठाए गए सवाल और दावे न्यायालय का अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं. अब तक किसी अदालत ने इस रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं की है. रिपोर्ट मुख्य रूप से सरकारी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाती है, न कि अदालत के अंतिम फैसले को चुनौती देती है. आखिर इस रिपोर्ट में क्या दावा किया गया है और पूरा विवाद किस बारे में है, इसे समझने के लिए देखिए यह इंफोग्राफिक्स.


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फिर चर्चा पहुंची बिहार...

विवाद सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है. उससे पहले और उसके बाद भी ईशा फाउंडेशन से संबंध रखने वाले कई मामले हैं जिसको लेकर विवाद हुआ हैं. जैसा कि आपको इंफोग्राफिक्स में दिखाई दे रहा है.

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जब विवादों की बात छिड़ी है तो हालिया सबसे चर्चित विवाद की बात भी कर लेते हैं. विवाद है संस्था और बिहार सरकार के बीच हुए एक समौझते को लेकर, दरअसल ईशा फाउंडेशन को लेकर दो सरकारी फैसलों पर सवाल उठे. पहला मामला पटना के बांसघाट स्थित आधुनिक शवदाह गृह का था, जिसके संचालन की जिम्मेदारी दस साल के लिए ईशा आउटरीच को एक रुपये के प्रतीकात्मक शुल्क((Nominal Fee) पर दी गई.

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दूसरा मामला मुंगेर का था, जहां योग और वेलनेस सेंटर बनाने के लिए करीब 15 एकड़ सरकारी जमीन 99 साल की लीज पर एक रुपये के टोकन रेट पर देने का प्रस्ताव सामने आया.


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इन दोनों फैसलों पर विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाए. उनका कहना था कि सार्वजनिक जमीन और सरकारी परिसंपत्तियों के आवंटन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और यह स्पष्ट होना चाहिए कि ईशा फाउंडेशन को ऐसी रियायतें किन मानकों के आधार पर दी गईं. हालांकि सरकार ने इन आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि दोनों फैसले सार्वजनिक हित और गैर-लाभकारी सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिए गए हैं. सरकार का तर्क था कि यदि किसी संस्था के माध्यम से बेहतर सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध होती हैं, तो ऐसी साझेदारी जनहित में हो सकती है.

फाउंडेशन को लेकर इतने विवाद क्यों?

उपर के विवाद को लेकर यह कहा जा सकता है कि ईशा फाउंडेशन की कहानी सिर्फ योग, ध्यान और आध्यात्मिकता की नहीं है. इसके साथ पर्यावरण, सरकारी नीतियों, न्यायिक प्रक्रियाओं और राजनीति से जुड़े सवाल भी बराबर चलते रहे हैं. एक तरफ फाउंडेशन का दावा है कि उसके सभी निर्माण और गतिविधियां कानून के दायरे में हैं और उसका काम पर्यावरण संरक्षण व जनकल्याण के लिए है. दूसरी ओर, पर्यावरण कार्यकर्ताओं, विपक्षी दलों और कई मीडिया संस्थानों ने समय-समय पर निर्माण, सरकारी रियायतों और निर्णय लेने की प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं.

इनमें से कई विवाद अदालतों तक पहुंचे, जहां कुछ मामलों में ईशा फाउंडेशन को राहत मिली और न्यायालयों ने उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर फैसले दिए. वहीं कुछ मुद्दों पर बहस आज भी आमतौर पर होने वाली चर्चा का हिस्सा है. इसलिए इस पूरे विवाद को किसी एक दावे या एक पक्ष की नजर से नहीं, बल्कि अदालतों के फैसलों, सरकारी दस्तावेजों, आरोपों और फाउंडेशन के जवाब, इन सभी को साथ रखकर देखना जरूरी है.हालांकि, जब इन मामलों को लेकर प्रभात खबर ने ईशा फाउंडेशन का पक्ष जानने के लिए संस्था की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध संपर्क नंबरों पर बातचीत की, तो फोन रिसीव करने वाले प्रतिनिधि ने कहा कि वे इस विषय पर संस्था का आधिकारिक पक्ष रखने के लिए अधिकृत व्यक्ति नहीं हैं. उन्होंने इस मामले पर कोई टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि अधिकृत प्रतिनिधि ही इस संबंध में प्रतिक्रिया दे सकते हैं.

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डिस्क्लेमर : यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों, रिकॉर्ड, मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में अंतिम निष्कर्ष देना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों और दावों का संतुलित प्रस्तुतीकरण करना है.


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गौतम कुमार

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By गौतम कुमार

दैनिक भास्कर से शुरू हुआ ये कारवां अब प्रभात खबर तक आ पहुंचा है. पढ़ाई और पत्रकारिता की बारीकियां सीखने का सफर अभी जारी है, किताबों से भी सीख रहा हूं, लोगों से भी और खबरें तो है हीं..

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