भरोसा ही पूंजी : AI के जमाने में पत्रकारिता और ईमानदारी की अहमियत

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एआई के दौर में पत्रकारिता

एआई के दौर में पत्रकारिता

एआई ने पत्रकारिता को काफी चुनौतीपूर्ण बना दिया है. उसके प्रभाव से गलत सूचनाओं का प्रसार इतनी तेजी से होता है कि मुख्यधारा की पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों के सामने सूचनाएं आम लोगों तक कैसे पहुंचाएं, इसे लेकर चुनौतिपूर्ण स्थिति बन गई है. पत्रकारिता के भविष्य और उसके मूल सिद्धांतों पर केंद्रित यह आलेख asiandispatch.net पर प्रकाशित हुई है. इसके लेखक हैं-सैयद नजाकत और निरत भटनागर. इसका हिंदी अनुवाद प्रभात खबर में प्रकाशित किया जा रहा है.

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पत्रकारिता का काम मशीनों के खिलाफ रेस जीतना नहीं है. यह वह काम है, जिसमें इंसान पूरी ईमानदारी से सच्चाई का विवरण देता है. एक समय था जब जानकारी सोच-समझकर आगे बढ़ाई जाती थी. खबरें घोड़ों, जहाजों और प्रिंटिंग प्रेस की रफ्तार से फैलती थीं, जो 1440 के दशक में गुटेनबर्ग के आविष्कार के बाद शुरू हुईं. 1850 के दशक में, जर्मनी में जन्मे ब्रिटिश एंटरप्रेन्योर जूलियस रॉयटर ने दुनिया के पहले मॉडर्न न्यूज नेटवर्क में से एक बनाया, जो ब्रसेल्स, बेल्जियम और आचेन, जर्मनी के बीच स्टॉक की कीमतें ले जाने के लिए कबूतरों का इस्तेमाल करने के लिए मशहूर था.

1920 के दशक में रेडियो आया, 1930 के दशक में टेलीविजन टावर आए, जो आवाजें और तस्वीरें सीधे हमारे घरों तक ले आए. इन आविष्कारों के बावजूद किसी घटना और उसकी व्याख्या के बीच, हमेशा कुछ समय होता था, कहने का आशय यह है कि घटना और उसे लोगों तक पहुंचने के बीच कुछ समय होता था. पत्रकारिता के काम में जुटे लोग पहले तथ्यों का सत्यापन करते थे. इतिहासकार उसमें संदर्भ जोड़ते थे. समाज के पास प्रतिक्रिया देने से पहले मतलब समझने का समय था. ये जो समय थे, वे खबर पहुंचाने में देरी नहीं थे. वे ऐसे पल थे जिसमें जर्नलिज्म अपना सबसे जरूरी काम करता था, वह था सूचनाओं का सत्यापन.

यह आलेख दो ऐसे लोगों ने लिखा है जिन्होंने पिछला दशक एक ही प्रॉब्लम के विभिन्न पहलुओं पर बिताया है. एक ने रिपोर्टिंग करने में और दूसरे ने न्यूजरूम के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को आगे बढ़ाने में सालों बिताए हैं. इन दोनों ने इस बात पर अध्ययन किया है कि कैसे समाज उन इंस्टीट्यूशन पर भरोसा करने लगती हैं या चुपचाप भरोसा करना बंद कर देती हैं, जो उनकी ओर से बोलने का दावा करते हैं.

दोनों दृष्टिकोणों से देखने पर एक बात साफ हो गई है कि वे जरूरी ठहराव अब गायब हो चुके हैं, जिसमें पत्रकार सूचना का सत्यापन करते थे. बावजूद इसके हमने अभी तक ऐसी कोई नई व्यवस्था नहीं बनाई है जो उस सुरक्षा और भरोसे की जगह ले सके, जो पहले ये ठहराव प्रदान करते थे.

AI ने बढ़ाई पत्रकारिता की चुनौतियां

पत्रकारिता की अगर परिभाषा दी जाए, तो अपने सबसे अच्छे रूप में पत्रकारिता एक सार्वजनिक सेवा है. लोकतंत्र के लिए इसकी अहमियत उतनी ही है, जितनी स्वच्छ पानी और निष्पक्ष अदालतों की. जब 2015 में DataLEADS की स्थापना हुई, तो इसे एक ऐसे मंच के रूप में देखा गया, जो एक साथ न्यूजरूम, डेटा लैब, प्रशिक्षण संस्थान और इनक्यूबेटर का काम करे. इस मंच का उद्देश्य यह समझना था कि ओपन डेटा और डिजिटल तकनीकें सूचना के प्रवाह को किस तरह बदल रही हैं. इसकी सोच बहुत सरल थी,जहां यह समझने की कोशिश की जा रही थी कि पत्रकारिता को आने वाले वर्षों में जीवित रहना है, तो उसे नए कौशल, नए उपकरण और अपने मूल उद्देश्य की स्पष्ट समझ की जरूरत होगी.

अच्छी पत्रकारिता हमेशा दो मूल सिद्धांतों पर टिकी रही है:-

पहला, रिपोर्टिंग लोगों की वास्तविक परिस्थितियों और जमीनी सच्चाइयों को सामने लाए.

दूसरा, वह सत्य और ईमानदारी पर आधारित हो, न कि केवल सुविधा, तेजी या लोकप्रियता पर.

यदि पत्रकारिता के इन दोनों सिद्धांतों को हटा दिया जाए, तो जो बचता है वह देखने में पत्रकारिता जैसा लग सकता है, लेकिन वास्तव में पत्रकारिता नहीं होगा.

हालांकि इन आदर्शों की वजह से पत्रकारों को कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है. ऐसी दो पुरानी समस्याएं हैं जिनका उल्लेख जरूरी है. यह इसलिए नहीं कि एआई उन्हें निश्चित रूप से और खराब कर देगा, बल्कि इसलिए कि आज हम एआई को कैसे विकसित और नियंत्रित करते हैं, उसी पर निर्भर करेगा कि भविष्य में पत्रकारिता मजबूत होगी या कमजोर.

पहली समस्या है एपिस्टेमिक कैप्चर : इसका मतलब है कि किसी मुद्दे की कहानी और व्याख्या उन लोगों द्वारा तय की जाती है जो सत्ता, पैसे या संस्थानों के करीब होते हैं, न कि उन लोगों द्वारा जो उस समस्या को रोजमर्रा की जिंदगी में जी रहे होते हैं.

दूसरी समस्या है पैराशूट पत्रकारिता : इस समस्या में होता यह है कि कोई रिपोर्टर किसी अनजान इलाके में जाता है, एक-दो दिन में खबर लिखता है और वहां की परिस्थितियों को पूरी तरह समझे बिना लौट आता है.

इन दोनों समस्याओं का परिणाम एक जैसा होता है. जिन लोगों पर किसी कहानी का सबसे अधिक असर पड़ता है, वही लोग उसकी प्रस्तुति और व्याख्या में सबसे कम शामिल हो पाते हैं.

डेटा आधारित पत्रकारिता भी अक्सर इस समस्या का शिकार होती है. आंकड़े दूर बैठकर इकट्ठा किए जा सकते हैं और उन्हें बहुत अधिकारपूर्ण तरीके से पेश किया जा सकता है, लेकिन उनमें लोगों के वास्तविक अनुभव शामिल नहीं होते हैं.

किसी जिले का स्वास्थ्य संकट एक चार्ट बनकर रह जाता है. किसी समुदाय का दुख सिर्फ एक प्रतिशत में बदल जाता है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि जो रिपोर्टर किसी जगह पर समय बिताता है, वह जानता है कि आंकड़े किन सवालों का जवाब देते हैं और किनका नहीं. वह यह भी समझता है कि लोग किन सरकारी आंकड़ों पर भरोसा नहीं करते और किसी इंटरव्यू की कौन-सी खामोशी असल कहानी कह रही है.जो रिपोर्टर वहां गया ही नहीं, वह इन बातों को कभी नहीं समझ सकता, चाहे उसकी स्प्रेडशीट कितनी भी व्यवस्थित क्यों न हो.

यह जो अंतर है, उसमें जो चीज खो जाती है, वह सटीकता नहीं बल्कि ईमानदारी है. किसी खबर पर लोगों का भरोसा इसलिए बनता है क्योंकि लोगों को महसूस होता है कि पत्रकार वास्तव में उस जगह गया, वहां के लोगों की बातें सुनीं और फिर उसने आम लोगों तक वह सूचना पहुंचाई. यही सच्ची लगन और ईमानदारी है, जो किसी खबर को विश्वसनीय बनाती है. यह कोई दिखावा या अतिरिक्त सजावट नहीं थी, बल्कि वही चीज थी जो किसी कहानी को भरोसेमंद बनाती है.

इसी सोच को बचाए रखने के लिए DataLEADS जैसी संस्थाएं वर्षों से काम कर रही हैं. उन्होंने सिर्फ बड़े शहरों के पत्रकारों को ही नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों और देशों के पत्रकारों को भी प्रशिक्षण दिया है. उन्होंने स्थानीय और क्षेत्रीय न्यूजरूमों में डेटा और एआई से जुड़ी क्षमताएं विकसित कीं. साथ ही अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं में ऑनलाइन सत्यापन (फैक्ट-चेकिंग) नेटवर्क बनाए, ताकि अफवाहों और गलत सूचनाओं को फैलने से रोका जा सके. यह काम भले ही बहुत आकर्षक ना रहा हो, लेकिन इसके पीछे जो सोच है, वह बहुत मजबूत है.

वर्तमान दौर में पूरी दुनिया में सूचना का पूरा ढांचा बदल गया है. आज के समय में स्पीड का काफी महत्व है. यानी जैसे कोई घटना होती है, उसे आम लोगों तक पहुंचान जरूरी हो गया है. 1990 के दशक की शुरुआत में जब इंटरनेट आम लोगों तक पहुंचा, तो यह बदलाव बहुत तेजी से होने लगा.

1998 में गूगल ने दुनिया की सूचनाओं को व्यवस्थित करना शुरू किया. 2004 में फेसबुक ने लोगों के रिश्तों को ऑनलाइन नेटवर्क में बदल दिया. 2005 में यूट्यूब ने हर व्यक्ति को अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने का मंच दे दिया. 2006 में ट्विटर (अब X) ने सार्वजनिक बातचीत को रियल-टाइम में बदल दिया. वहीं स्मार्टफोन और 2007 में आए आईफोन ने पूरी डिजिटल दुनिया को हमारे हाथों में ला दिया.

भारत ने भी इस बदलाव को शिद्दत से महसूस किया. बहुत से लोगों को अपना पहला मोबाइल फोन आज भी याद होगा. 1995 में भारत में पहली मोबाइल कॉल हुई थी. उस समय मोबाइल फोन लग्जरी माने जाते थे और कॉल करना बहुत महंगा था. लेकिन सिर्फ दो दशकों के अंदर राजनीति, व्यापार, पत्रकारिता और यहां तक कि दोस्ती भी मोबाइल फोन की स्क्रीन पर आ गई.

इस बदलाव से कुछ नुकसान भी हुए

पहले समाज के पास तथ्यों का एक साझा आधार होता था, जिस पर लोग बहस कर सकते थे. अब वह साझा मंच टूटकर लाखों व्यक्तिगत सोशल मीडिया फीड्स में बंट गया है. एक ही घर में रहने वाले दो लोग पूरी तरह अलग-अलग सूचनाएं देख सकते हैं, अलग-अलग डर महसूस कर सकते हैं और सच के अलग-अलग संस्करणों पर विश्वास कर सकते हैं.

लेकिन इस बदलाव के फायदे भी हुए हैं. अब किसी छोटे शहर में बैठा एक व्यक्ति भी अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है. पॉडकास्ट, न्यूजलेटर और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स ने उन आवाजों को भी मंच दिया है जिन्हें पहले मुख्यधारा का मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देता था. इसलिए यह नई दुनिया सिर्फ खराब नहीं हुई है, बल्कि पहले से ज्यादा खुली और साथ ही ज्यादा अव्यवस्थित भी हो गई है।

फिर 2022 में ChatGPT आया और एक बड़ा बदलाव हुआ. अब मशीनें केवल सूचना पहुंचा नहीं रही थीं, बल्कि खुद सूचना तैयार भी करने लगी थीं. इससे पत्रकारिता को कई फायदे मिले. एआई इंटरव्यू का अनुवाद कर सकता है, लंबे शोध का सार निकाल सकता है और हजारों पन्नों के दस्तावेज कुछ मिनटों में खंगाल सकता है. पहले संसद की कार्यवाही या ऑडिट रिपोर्ट समझने में कई दिन लग जाते थे, लेकिन अब वही काम बहुत जल्दी हो सकता है. इससे पत्रकारों को रिपोर्टिंग के मानवीय हिस्से जैसे लोगों से मिलना, सवाल पूछना और चीजों को समझना के लिए अधिक समय मिल सकता है.

लेकिन चैट जीपीटी बड़ा खतरा भी पैदा करती है. जो उपकरण अच्छी सामग्री को बेहतर बना सकते हैं, वे लगभग बिना लागत के नकली और भ्रामक सामग्री भी तैयार कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर स्वास्थ्य क्षेत्र को लें. पहले स्वास्थ्य से जुड़ी गलत जानकारी (मिसइन्फॉर्मेशन) इंसान इंटरनेट या सोशल मीडिया पर शेयर कर देते थे. कई बार व्हाट्सएप पर ऐसी बातें फैलती थीं जो लोगों को डराती थीं या गलत जानकारी देती थीं. कोविड-19 महामारी के दौरान यह समस्या और बढ़ गई. तब सोशल मीडिया कंपनियों और फैक्ट-चेकिंग संस्थाओं ने गलत सूचनाओं की जांच (डिजिटल वेरिफिकेशन) को गंभीरता से लेना शुरू किया. इसके लिए विशेष टीमें बनाई गईं जो वायरल हो रही जानकारियों की सच्चाई जांचती थीं. हालांकि इन टीमों पर काम का दबाव था, फिर भी समस्या एक हद तक नियंत्रित थी, क्योंकि गलत जानकारी इंसान ही बना और फैला रहे थे. यानी गलत सूचनाओं की संख्या और गति इतनी नहीं थी कि उन्हें संभाला ना जा सके. लेकिन 2023 के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई. अब एआई के जरिए कुछ ही मिनटों में नकली समाचार, नकली शोध पत्र, फर्जी उद्धरण और डीपफेक वीडियो तैयार किया जा सकता है. इसकी गति इतनी तेज है कि न्यूजरूम और फैक्ट-चेकिंग संस्थाएं उनकी जांच नहीं कर पातीं हैं.

सत्यापन का काम केवल कठिन नहीं हुआ है, उसकी प्रकृति ही बदल गई

पहले सवाल होता था-क्या यह जानकारी झूठी है? अब सवाल यह बन गया है-क्या किसी जानकारी को सच साबित करना भी संभव है? जब लोग इतनी अधिक और विरोधाभासी सूचनाओं से घिर जाते हैं, तो वे अपने दोस्तों, परिवार और भरोसेमंद लोगों के छोटे-छोटे समूहों तक सीमित हो जाते हैं. लेकिन ऐसे समूह अकसर ऐसे इको चैंबर बन जाते हैं, जहां लोग केवल वही बातें सुनते हैं जो उनकी पहले से बनी धारणाओं से मेल खाती हैं.

पत्रकारिता का भविष्य

आज के समय में बड़ा सवाल यह है कि पत्रकारिता का भविष्य अधिक और तेजी से खबरें बनाने में नहीं, बल्कि भरोसे को फिर से स्थापित करने में है.जैसा कि लेखक फ्रांसेस्को मार्कोनी ने लिखा है, लगभग दो शताब्दियों तक पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वह किसी खबर को सबसे पहले उजागर करती थी. किसी बड़ी खबर का स्कूप या एक्सक्लूसिव होना उसकी सबसे बड़ी पूंजी थी.

लेकिन एआई ने पत्रकारिता की इस ताकत को लगभग खत्म कर दिया है. अब मशीनें भी तेजी से सामग्री तैयार कर सकती हैं.फिर भी एक चीज है जिसे एआई नहीं बदल सकता और वह है प्रामाणिकता. एआई इस बात का झूठा दावा नहीं कर सकता कि वह सच में कहीं गया था, किसी की बात सुनी थी और जिस वक्त घटना घट रही थी वह वहां मौजूद था. आज के दौर में अच्छी दिखने वाली सामग्री बनाना आसान हो गया है, इसलिए सबसे महत्वपूर्ण अब यह है कि कोई व्यक्ति अपनी ईमानदारी और मेहनत का भरोसेमंद सबूत दे सके. जब कोई काम आसानी से नकली साबित ना किया जा सके, तभी उसका महत्व है.

एआई के सही प्रयोग के लिए प्रशिक्षण

एआई पत्रकारिता के सिद्धांतों और उसके मूल स्वरूप को ध्वस्त ना करें, इसी सोच के आधार पर DataLEADS पत्रकारों को एआई से जुड़े प्रशिक्षण दे रहा है, ताकि वे एआई का सही उपयोग कर सकें और उस पर पूरी तरह निर्भर न हो जाएं. इसी तरह First Check अभियान ने स्वास्थ्य संबंधी सूचनाओं की जांच के लिए ऐसे नेटवर्क बनाए हैं जो स्थानीय परिस्थितियों और जमीनी हकीकत को समझते हैं, न कि दूर बैठकर केवल अनुमान लगाते हैं. इसी तरह Sinceriti नामक सामुदायिक मंच भी काम करता है. इसका मानना है कि सच्ची निष्ठा और ईमानदारी को पहचानने और साबित करने के लिए भी एक व्यवस्था की जरूरत होती है.

यह बात खास तौर पर उन पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है जो छोटे शहरों, कस्बों और दूरदराज इलाकों से रिपोर्टिंग करते हैं. जब नकली और भ्रामक जानकारी हर जगह फैलने लगती है, तो लोग और संपादक उन्हीं नामों और संस्थानों पर भरोसा करने लगते हैं जिन्हें वे पहले से जानते हैं. इसका नुकसान यह होता है कि क्षेत्रीय पत्रकार, पहली पीढ़ी के पत्रकार और स्थानीय स्ट्रिंगर, जो वास्तव में उस कहानी के बीच रहकर काम करते हैं, पीछे छूट जाते हैं क्योंकि उनके पास बड़े मीडिया संस्थानों की पहचान नहीं होती. यदि भरोसे के इस संकट को दूर नहीं किया गया, तो इसका फायदा फिर उन्हीं लोगों को मिलेगा जो पहले से सत्ता और प्रभाव के करीब हैं. यही वह स्थिति है जिसे एपिस्टेमिक कैप्चर कहा गया है.

इस परिस्थिति में आने वाले दशक की सबसे बड़ी चुनौती ऐसा सिस्टम बनाना है जो ईमानदार पत्रकारों और उनकी रिपोर्टिंग को उनकी योग्यता के आधार पर पहचान और विश्वसनीयता दिला सकें, चाहे वे किसी बड़े मीडिया संस्थान से जुड़े हों या नहीं. एक समय भारत में किसी बहस को खत्म करने के लिए लोग पूछते थे-क्या यह अखबार में छपा है? यह सवाल केवल अखबार के बारे में नहीं था. इसका मतलब था कि लोग उस प्रक्रिया पर भरोसा करते थे जिसके तहत किसी सूचना को जांच-परखकर जनता तक पहुंचाया जाता था.आज एक बार फिर उसी भरोसे को फिर से बनाने की जरूरत है, क्योंकि भविष्य में सबसे महत्वपूर्ण संस्थाएं वे नहीं होंगी जो सबसे तेज सूचना पहुंचाएं, बल्कि वे होंगी जो भरोसा, प्रामाणिकता और ईमानदारी को बनाए रख सकें.



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सैयद नजाकत-निरत भटनागर

लेखक के बारे में

By सैयद नजाकत-निरत भटनागर

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