रद्द हो जाएगा अमेरिका-ईरान शांति समझौता ! ट्रंप के बयान के क्या हैं मायने

मध्य पूर्व में तनाव कम करने के लिए हुआ अमेरिका-ईरान शांति समझौता अब खतरे में है. दोनों देशों ने एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन के आरोप लगाए हैं.
Iran US War Peace Deal Controversy : अमेरिका-ईरान के बीच 17 जून को हुआ समझौता रद्द होता दिख रहा है. समझौते के 60 दिन के अंदर होने वाली बातचीत से अब अमेरिका ने भी इनकार कर दिया है. ईरान पहले ही इनकार कर चुका है. तुर्की के अंकारा में आयोजित NATO समिट 2026 में मीडिया से बातचीत में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत करना समय की बर्बादी थी. इससे पहले ईरान ने कहा था कि अगर अमेरिका धमकियां देना बंद नहीं करता है, तो आखिरी दौर की बातचीत नहीं होगी. दोनों देशों ने जंग खत्म करने के लिए 14 शर्तों के साथ इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर साइन किया था. इसके बाद माना जा रहा था कि यह तनाव खत्म हो जायेगा, लेकिन अब हालात और बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच क्या हुआ था शांति समझौता?
बुधवार (8 जुलाई) को जब होर्मुज जलडमरूमध्य में कमर्शियल जहाजों पर ईरान ने हमले किए, तो अमेरिका ने भी जवाबी कार्रवाई की. इसके बाद से ही खाड़ी क्षेत्र में हड़कंप मच गया है. इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) को लेकर, जो अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य टकराव के बाद गंभीर संकट में है.
क्य़ा है इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग
खाड़ी क्षेत्र में हुए हालिया सैन्य टकराव के चलते दोनों देशों के बीच हुए समझौते पर क्या असर होगा, इसे समझने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि अमेरिका और ईरान के बीच 14 बिंदुओं वाले एमओयू में क्या कुछ है. इसके साथ साथ हमें यह भी समझना होगा कि समझौते पर हस्ताक्षर के बाद से दोनों देशों ने किन गतिविधियों को अंजाम दिया है. क्योंकि समझौते का भविष्य इसी पर टिका है. बाकी दूसरे कई अहम पहलू के साथ, इस समझौते में अगले 60 दिनों में अंतिम निर्णय पर पहुंचने के लिए आगे बातचीत भी शामिल हैं. जो अब कठिन लग रहा.क्योंकि हालिया गोलाबारी के चलते यह बातचीत को पटरी से उतरती दिख रही है.
अमेरिका-ईरान के बीच हुए समझौते के 14 बिंदु
- दोनों देश सैन्य अभियान रोक देंगे.
- ईरान के बंदरगाहों से अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को खत्म करेगा. व्यापार में में आ रही बाधाओं को 30 दिनों के भीतर खत्म करेगा.
- अंतिम समझौते के 30 दिनों के भीतर ईरान के नजदीकी इलाकों (खाड़ी क्षेत्र) से अमेरिकी सेनाओं वापस किया जायेगा.
- ईरान के तेल, ऊर्जा उत्पादों और पेट्रोकेमिकल्स पर लगे अमेरिका और वैश्विक प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जायेगा.
- दूसरे देशों के वित्तीय संस्थानों में फंसे ईरान के 24 अरब अमेरिकी डॉलर (24 Billion USD) के फ्रीज फंड को अनफ्रीज किया जायेगा.
- तानाव के कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिए अमेरिका और वैश्विक सहयोगियों की मदद से ईरान के आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब अमेरिकी डॉलर का फंड तैयार किया जायेगा.
- ईरान की क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता का अमेरिका सम्मान करेगा और उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा.
- ईरान लिखित में देगा कि वह कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनायेगा या दूसरे देश से हासिल नहीं करेगा.
- अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में ईरान के समृद्ध यूरेनियम के भंडार (Enriched Uranium Stockpiles) के प्रबंधन और डाउनब्लेंडिंग (संवर्द्धन कम करने) पर चर्चा को आगे बढ़ाया जायेगा.
- दोनों देशों के बीच अंतरिम शांति समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) से मंजूरी दिलायी जायेगी.
- व्यावसायिक जहाजों के सुरक्षित आने-जाने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बिना किसी शुल्क के खोला जायेगा.
- राजनयिक संबंधों को सुधारने के लिए दोनों देशों में एक-दूसरे के दूतावासों को फिर से शुरू किया जायेगा.
- बातचीत के दौरान क्षेत्र में किसी प्रकार का नया प्रतिबंध नहीं लगाया जायेगा. न ही नये मिलिट्री बेस बनाये जायेंगे या उसका विस्तार किया जायेगा.
- दोनों देश 60 दिन के भीतर अंतिम और स्थायी समझौता करेंगे.
सैन्य टकराव के चलते अमेरिका और ईरान के रिश्तों में खटास
खाड़ी क्षेत्र में बीते कुछ दिनों में हुए सैन्य टकराव के चलते अमेरिका और ईरान के बीच रिश्तों में दारार बढ़ी है, जबकि समौझते के चलते इसे कम या खत्म होना चाहिए था. इसकेउलट, अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में कमर्शियल जहाजों पर हुए हमलों का हवाला देते हुए ईरान को दी गयी तेल प्रतिबंधों में ढील वापस ले ली. इसके तुरंत बाद अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान में 80 से अधिक सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले कर दिये.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने अमेरिकी हमले को युद्धविराम समझौते का उल्लंघन करार देते हुए कहा कि जब तक अमेरिकी हमले और धमकियां जारी रहेंगी, तब तक स्थायी शांति के लिए चल रही राजनयिक बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी.
मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबाव के लिए होती है बयानबाजी : प्रो त्रिपाठी
मध्य पूर्व में जारी तनाव के मौजूदा हालात और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के मतलब को और विस्तार से जानने के लिए प्रभात खबर ने साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ धनंजय त्रिपाठी से बात की. प्रो त्रिपाठी ने कहा कि इस तरह की बयानबाज़ी अक्सर खुद को अधिक प्रभावशाली और मजबूत पक्ष के रूप में पेश करने की रणनीति होती है. ऐसे बयान बड़े समझौतों या महत्वपूर्ण वार्ताओं से पहले दबाव बनाने के उद्देश्य से दिए जाते हैं. इसका मकसद यह परखना भी होता है कि सामने वाले पर कितना दबाव बनाया जा सकता है. डॉ त्रिपाठी कहते हैं कि इस तरह का बयान इससे पहले भी ट्रंप कई बार दे चुके हैं, जिनका बाद में कोई ठोस आधार नहीं निकला. इसलिए उनके इस बयान को जरूरत से ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है, हालांकि सतर्क रहना भी उतना ही जरूरी है. डॉ त्रिपाठी का कहना है कि इस तरह की सैन्य टकराव की घटनाएं संभावित समझौतों से पहले भी देखने को मिल चुकी हैं. उनके मुताबिक, संभव है कि समझौते के कुछ अहम बिंदुओं पर दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पा रही हो. यही वजह है कि समय-समय पर तीखी बयानबाज़ी या सीमित सैन्य कार्रवाई जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, ताकि बातचीत में दबाव बनाया जा सके.
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