झारखंड में नक्सलियों के गढ़ रहे दुरूप गांव की दूध उत्पादन से बदल रही पहचान, Medha Dairy से जगी उम्मीद

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Jharkhand News : लातेहार जिले की दूरूप पंचायत, जो कभी नक्सलियों का गढ़ हुआ करती थी, आज यहां के किसान खेती के साथ-साथ दूध उत्पादन कर पंचायत को अलग पहचान देने की कोशिश कर रहे हैं. महुआडांड़ प्रखंड के दुरूप गांव में मेधा डेयरी के द्वारा दूध उत्पादकों के दूध लिया जा रहा है. इससे लोग काफी खुश हैं.

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Jharkhand News : लातेहार जिले की दुरूप पंचायत, जो कभी नक्सलियों का गढ़ हुआ करती थी, आज यहां के किसान खेती के साथ-साथ दूध उत्पादन कर पंचायत को अलग पहचान देने की कोशिश कर रहे हैं. महुआडांड़ प्रखंड के दुरूप गांव में मेधा डेयरी के द्वारा देसी नस्ल की गाय और भैंस के दूध उत्पादकों के घरों से दूध लिया जा रहा है. इससे लोग काफी खुश हैं. इनके लिए रोजगार की उम्मीद जगी है. मेधा डेयरी से फिलहाल 10 किसान 70 से 80 लीटर दूध रोज बेच रहे हैं. अधिक दूध उत्पादन के लिए जर्सी नस्ल के मवेशी रखने का विचार है. सप्ताहभर पहले बिहार से दूरूप गांव में दो मुर्रा नस्ल का पशु लाया गया है.

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घने जंगलों में बसा है दुरूप गांव

दुरूप गांव प्रखंड मुख्यालय से 20 किमी दूर है. गांव की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 726 है. पंचायत की जनसंख्या पांच हजार के आसपास है. दुरूप संघन जंगल के बीच बसा है. इस क्षेत्र की भौगोलिक बनावट के कारण ज्यादातर भूमि वन क्षेत्र है. गांव में रोजगार का जरिया कृषि और पशु पालन है. इस पंचायत में पलायन भी एक गंभीर समस्या है. सभी लोगों के पास कृषि योग्य समतल जमीन नहीं रहने से गांव के किसान शाले, लुरगुमी, बरदौनी, गांवों में लीज पर जमीन लेकर मकई और मूंगफली की खेती करते हैं. दर्जनो ऐसे पशुपालक हैं, जो देसी नस्ल की गाय एवं भैंस रखकर दूध उत्पादन करते हैं.

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मेधा डेयरी से पशुपालकों में जगी उम्मीद

पशुपालक शिवशंकर यादव ने कहा कि मेधा डेयरी फार्म से जुड़ने के लिए पिछले साल से चर्चा कर रहे थे. अब मेधा डेयरी से जुड़ जाने से महुआडांड़ में दूध बेचना बंद कर रहें है. डेयरी फार्म द्वारा दूध लेने से मेहनत का उचित मूल्य मिल रहा है और पूर्व की अपेक्षा दूध बेचने में परेशानी भी नहीं हो रही है. गणेश यादव ने कहा कि अब प्रतिदिन की दिनचर्या भी बदल गयी है. पहले तो रोज सुबह से दूध निकालते थे, फिर महुआडांड़ जाकर बेचते थे. दिनभर समय देने के बाद मूल्य मिलता था. गर्मी मौसम में दूध खराब होने पर पैसा भी नहीं मिलता था. अब दूध बेचने के लिए कहीं दौड़ नहीं लगाना पड़ेगा. गर्मी में दूध खराब भी नहीं होगा. मेधा डेयरी के माध्यम से दूध ले लिया जाता है. दूध जांच करके उचित दाम दस दिन में सीधे लाभुक के खाते में पैसे का भुगतान कर दिया जा रहा है.

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दूध उत्पादन से जुड़े हैं मुस्लिम परिवार

पशुपालक रहुल्ला अंसारी ने कहा कि दूरूप के लगभग 5 मुस्लिम परिवार ऐसे हैं, जो दूध उत्पादन से जुड़े हैं. हमारे पास देसी नस्ल के मवेशी हैं. मेधा डेयरी के माध्यम से गांव में दूध लिया जा रहा है. दूध उत्पादक के लिए अन्य लोग भी प्रोत्साहित हो रहे हैं. सरकार गांव में दूध उत्पादकों अच्छे नस्ल की मवेशी खरीदने में मदद करे तो रोजगार का नया जरिया बढ़ेगा. पशुपालक बेहतर नस्ल के मवेशी लाकर अधिक दूध उत्पादन कर पाएंगे. पशुपालक रमेश यादव ने कहा कि ब्याज पर पैसे लेकर बक्सर से मवेशी लाये हैं. 1,10.000 रुपया लगा है. दोनों मुर्रा नस्ल के दुधारू मवेशी हैं. एक मवेशी से दो टाइम मिलाकर 8 लीटर दूध मिलेगा. यहां किसान गरीब हैं.

पशुपालकों में जगी उम्मीद

रामकिशुन यादव, संतोष यादव, बहादुर यादव, राजेंद्र यादव, सत्यनारायण यादव, संतोष यादव, लतिफुल अंसारी, सफरूल अंसारी अन्य किसानों का कहना है कि अधिक दूध उत्पादन होने पर मेधा डेयरी फार्म यहीं शुरू होगा. हम जैसे सैकड़ों पशुपालकों के जीवन में काफ़ी मददगार साबित होगा. इस माध्यम से किसान आगे चलकर पशु ऋण, चारा, लोन आदि की सुविधा ले सकते हैं.

रिपोर्ट : वसीम अख्तर, महुआडांड़, लातेहार

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