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कर्ज की राजनीति व अर्थशास्त्र

Updated at : 23 Feb 2023 7:38 AM (IST)
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कर्ज की राजनीति व अर्थशास्त्र

सरकारों की समाज के प्रति जिम्मेदारी के निर्वहन में जब कराधान आदि से काम नहीं चल पाता है, तो उन्हें कर्ज लेना ही पड़ता है. लेकिन सरकारी कर्ज और जीडीपी के अनुपात को देखें, तो भारत सरकार का कुल कर्ज एवं देनदारियां अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में खासी कम हैं.

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पिछले कुछ दिनों से यह चर्चा है कि सरकार पर कर्ज पहले की तुलना में काफी ज्यादा बढ़ गया है. कांग्रेस का कहना है कि जब 2014 में उन्होंने सत्ता छोड़ी थी, उस समय देश पर 56.7 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो 2022-23 में बढ़कर 152.6 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, यानी यह कर्ज लगभग 96 लाख करोड़ रुपये बढ़ गया है. दुनियाभर में सरकारी कर्ज को देखने का नजरिया अलग किस्म का है.

सरकारी कर्ज को उसके आकार के अनुसार नहीं, बल्कि सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में देखा जाता है. इस हिसाब से देखें, तो 2013-14 में चालू कीमतों पर 112 लाख करोड़ रुपये की जीडीपी के संदर्भ में सरकार का कुल 56.7 लाख करोड़ रुपये का कुल कर्ज और देनदारियां जीडीपी का 50.5 प्रतिशत थी.

वर्ष 2018-19 तक आते-आते यह आंकड़ा 90.8 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो चालू कीमतों पर 189 करोड़ रुपये की जीडीपी का का मात्र 48 प्रतिशत ही था, यानी जीडीपी के प्रतिशत के रूप में सरकार का कर्ज और देनदारियां पहले से 2.5 प्रतिशत बिंदु घट गयी थीं.

वर्ष 2019-20 के वित्त वर्ष में कोरोना का प्रकोप शुरू हुआ, जिसके कारण उत्पादन और कर राजस्व प्रभावित होने लगे. ऐसे में सरकारी कर्ज में मात्र 12 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि के बावजूद जीडीपी के प्रतिशत के रूप में सरकारी कर्ज तीन प्रतिशत बिंदु ज्यादा होकर 51 प्रतिशत तक पहुंच गया. वर्ष 2020-21 पूरी तरह कोरोना प्रभावित था, जिसमें मौद्रिक जीडीपी भी दो लाख करोड़ रुपये घट गयी थी,

लेकिन गरीबों एवं अन्य प्रभावित वर्गों को राहत देने और विभिन्न खर्च बढ़ने से सरकारी कर्ज और देनदारियां 18 लाख करोड़ रुपये बढ़ गयीं. अब यह आंकड़ा जीडीपी के प्रतिशत के रूप में 61 प्रतिशत तक जा पहुंचा. वर्ष 2023-24 के बजट अनुमानों के अनुसार सरकारी ऋण कुल जीडीपी के 56 प्रतिशत तक घट जायेगा. कर्ज निजी हो या सार्वजनिक, इसके साथ उसके ब्याज और मूलधन की देनदारी जुड़ी होती है.

सरकारें लगातार ऋण लेती हैं और यह बढ़ता ही जाता है. गौरतलब है कि 1950-51 में सरकार का कुल कर्ज और अन्य देनदारियां मात्र 2865.4 करोड़ रुपये ही थीं, जो 2022-23 के संशोधित अनुमानों के अनुसार 152.6 लाख करोड़ रुपये हो गयीं. वर्ष 2023-24 के बजट में भुगतान के लिए लगभग 10.8 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान है, जो कुल सरकारी खर्च का 24 प्रतिशत है. साल दर साल बढ़ती अदायगी सरकार के चालू राजस्व से पूरी नहीं हो पाती, इसीलिए अदायगी के लिए भी ऋण लेना पड़ता है.

गौरतलब है कि हर मुल्क की जीडीपी अलग-अलग है. अमेरिका की जीडीपी भारत से कई गुना ज्यादा है तथा कई मुल्कों की जीडीपी भारत से कई गुना कम है. इसलिए हमें हर देश के सरकारी ऋण एवं अन्य देनदारियों को उसकी जीडीपी के अनुपात में देखना पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार 2021 में अमेरिका में सरकारी ऋण जीडीपी का 122 प्रतिशत, जापान का 221.3 प्रतिशत और भारत में मात्र 54.3 प्रतिशत था.

मुद्रा कोष के पास चीन का आंकड़ा नहीं है, पर अन्य अनुमानों के अनुसार यह 79.2 प्रतिशत था. केवल जर्मनी का कर्ज-जीडीपी अनुपात भारत से थोड़ा कम 46.3 प्रतिशत था. कोरोना काल में सभी देशों में सरकारी कर्ज में वृद्धि हुई थी. इसका कारण यह था कि कोरोना के दौरान न केवल जीडीपी सिकुड़ गयी थी, बल्कि सरकारी राजस्व भी बहुत घट गया था. साथ ही, समाज के कमजोर वर्गों को सहायता और राहत देने के लिए सरकारों का खर्च भी बढ़ गया था.

सरकारों की समाज के प्रति जिम्मेदारी के निर्वहन में जब कराधान आदि से काम नहीं चल पाता है, तो उन्हें कर्ज लेना ही पड़ता है. लेकिन सरकारी कर्ज और जीडीपी के अनुपात को देखें, तो भारत सरकार का कुल कर्ज एवं देनदारियां अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में खासी कम हैं. यही नहीं, अधिकतर छोटी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भी भारत का उधार इस हिसाब से काफी कम है.

यह अनुपात स्थिति सामान्य होने पर फिर पहले की तरह कम हो सकता है. यह तो सही है कि जनकल्याण ही नहीं, पूंजी निर्माण के लिए भी सरकारों को ऋण लेना पड़ता है और टैक्स-जीडीपी अनुपात बढ़ाने की कठिनाइयों के चलते, समय की जरूरतों के साथ-साथ सरकारी कर्ज बढ़ता भी जाता है. ऐसे में आर्थिक विश्लेषकों और नीति-निर्माताओं की चिंता यह होती है कि सरकारी बजट पर इसका प्रभाव कैसे कम किया जाए.

ब्याज की अदायगी सरकारी बजट पर प्रभाव डालती है. इस वर्ष भी ब्याज और मूल की अदायगी पर हमारे कुल सरकारी खर्च का 24 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल हो रहा है. सरकारी ऋण के ब्याज और मूल अदायगी के इस बोझ को कम करने का एक ही मार्ग है- ब्याज दरों में कमी. यह सर्वविदित ही है कि भारत में ब्याज दरें अमेरिका और यूरोपीय देशों की तुलना में खासी अधिक रही हैं. भारत में सरकारी बॉन्डों पर सरकार को लगभग सात प्रतिशत ब्याज चुकाना पड़ता है. गौरतलब है कि मोटे तौर पर यह ब्याज दर रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित ‘बैंक दर’ पर निर्भर करती है.

सामान्य तौर पर ‘बैंक दर’ ऊंचा रहने का प्रमुख कारण महंगाई (मुद्रास्फीति) की ऊंची दर होती है. महंगाई की ऊंची दर के कारण ‘बैंक दर’ को ऊंचा रखने की मजबूरी इसलिए होती है कि बचतकर्ताओं को दी जाने वाले ब्याज में महंगाई की भी भरपाई करनी पड़ती है. आज चूंकि महंगाई की दर लगभग छह प्रतिशत के आसपास है, बैंक दर 6.5 प्रतिशत बनी हुई है. इसलिए सरकार अपने बॉन्ड ऊंची ब्याज दर पर ही जारी कर सकती है.

लेकिन यदि महंगाई दर कम हो जाए, तो सरकार नये ऋण कम ब्याज पर ले सकती है. इससे सरकारी ऋण का बोझ कम हो सकता है. पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान जब महंगाई दर तीन प्रतिशत के आसपास पहुंच गयी थी, उस समय सरकार ने न केवल कम ब्याज पर बॉन्ड बेचा था, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए भी काफी कम ब्याज पर कर्ज भी लिया गया था.

कई मामलों में पुराने कर्ज चुका कर नये ऋण कम ब्याज पर लिये जा सके थे. ऐसे में सरकार पर ऋण का बोझ कम हो गया था. कहा जा सकता है कि सरकारी कर्ज के बोझ को कम करने हेतु ब्याज दरों में कमी और उसके लिए महंगाई पर अंकुश लगाना जरूरी होगा.

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डॉ अश्विनी

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By डॉ अश्विनी

डॉ अश्विनी is a contributor at Prabhat Khabar.

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