ePaper

नये कृषि कानूनों में सुधार की दरकार

Updated at : 06 Oct 2020 5:51 AM (IST)
विज्ञापन
नये कृषि कानूनों में सुधार की दरकार

मंडी शुल्क से मुक्त होने के कारण व्यापारियों और कंपनियों को मंडी से बाहर खरीद के लिए प्रोत्साहन मिलेगा. सो मंडी का महत्व ही नहीं रहेगा. किसान भी मंडी से बाहर बिक्री के लिए बाध्य होगा.

विज्ञापन

डॉ. अश्विनी महाजन, एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

ashwanimahajan@rediffmail.com

केंद्र सरकार 5 जून, 2020 को कृषि से संबंधित तीन अध्यादेश लेकर आयी. इन तीनों अध्यादेशों को संसद के मानसून सत्र में विधेयकों के रूप में प्रस्तुत कर, लोकसभा और राज्यसभा से अनुमोदित कर दिया गया. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये विधेयक अब कानून बन गये हैं. इनमें पहला अधिनियम है, ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020’. इसका उद्देश्य आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर कृषि व्यापार को उदार एवं सुगम बनाना है. बहुत पहले से अधिकांश कृषि जिंसों को आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में रखा जाता रहा है, ताकि लोग उसका अनुचित भंडारण न कर सकें और कीमतों में वृद्धि को रोका जा सके.

यह तब के लिए ठीक था, जब देश में कृषि खाद्य पदार्थों जैसे अनाज, दालें, तिलहन, खाद्य तेल, आलू, प्याज आदि का अभाव था. व्यापारी इस अभाव का लाभ उठाते हुए खाद्य पदार्थों को बाजार में आने से रोककर कीमतें बढ़ा देते थे. यह कानून कृषि विकास के लिए बाधक बन रहा था. आज जब कृषि उत्पादन सरप्लस में है, तो आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव कर अनाज, दालें, तिलहन, खाद्य तेलों, आलू, प्याज इत्यादि को आवश्यक वस्तु से बाहर करने का सोचा गया, ताकि इन वस्तुओं का बड़ी मात्रा में निजी क्षेत्र द्वारा भंडारण किया जा सके.

दूसरा अधिनियम है ‘किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020’. इस अधिनियम के तहत, अब कृषि उत्पादों की खरीद-फरोख्त कृषि मंडी से बाहर भी हो सकेगी. अभी तक के प्रावधानों के अनुसार, किसान अपनी फसल को सरकार द्वारा नियंत्रित कृषि उत्पाद मार्केटिंग कमेटी (एपीएमसी) मंडी में लाता था, जहां आढ़तियों और व्यापारियों के माध्यम से उसे बेचा जाता था.

सरकार या निजी व्यापारी मंडी से ही कृषि वस्तुओं की खरीद करते थे. सरकार का तर्क है कि नयी व्यवस्था में किसानों को मध्यस्थों से छुटकार मिलेगा और खुले बाजार में बेचते हुए उन्हें मंडी शुल्क और मध्यस्थों को कमीशन भी नहीं देना पड़ेगा. इससे किसान को उपज के बदले ज्यादा पैसा मिलेगा. हालांकि सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि कृषि उत्पादों की सरकारी खरीद पूर्व की भांति एपीएमसी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर जारी रहेगी, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा.

तीसरा अधिनियम है ‘किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा समझौता अधिनियम, 2020’. इस अधिनियम में कृषि उत्पाद के लिए निजी कंपनियों अथवा व्यक्तियों द्वारा किसानों के साथ संविदा खेती (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) की व्यवस्था की गयी है. यह एक प्रगतिशील कदम है, लेकिन विवाद की स्थिति में किसानों को सही समाधान मिलने में व्यवस्थागत समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, क्योंकि प्रस्तावित विवाद समाधान तंत्र किसानों के लिए बहुत जटिल है.

विवाद निबटान में सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) की भूमिका महत्वपूर्ण बतायी गयी है. यह सही व्यवस्था नहीं है, क्योंकि किसान की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह कंपनियों के शोषण का शिकार हो सकता है. इसके लिए किसान न्यायालय की स्थापना होनी चाहिए. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे अधिकांश किसान एक से दो एकड़ भूमि पर ही खेती करते हैं और हमारी जोत का औसत आकार एक एकड़ से भी कम है. ऐसे में किसान का कंपनियों की ताकत के सामने खड़ा रह पाना संभव नहीं. यह एक गैर-बराबरी की व्यवस्था है, जिसमें सुधार करना होगा.

जहां कई राजनीतिक दल और किसान संगठन इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं, वहीं यह भी माना जा रहा है कि नवीन कृषि कानूनों को लेकर सरकार की नीयत सही है. ‘किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020’ का भाव यह है कि मध्यस्थों से बचाकर किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिले, लेकिन इस संबंध में संशय यह है कि मंडी शुल्क से मुक्त होने के कारण व्यापारियों और कंपनियों को स्वाभाविक रूप से मंडी से बाहर खरीद के लिए प्रोत्साहन मिलेगा.

सो मंडी का महत्व ही नहीं रहेगा. किसान भी मंडी से बाहर बिक्री के लिए बाध्य होगा. ऐसे में बड़ी खरीदार कंपनियां किसानों का शोषण कर सकती हैं. कई लोगों का यह भी मानना है कि जब कानून बन ही रहे हैं और मंडी के बाहर खरीद को अनुमति दी जा रही है, तो किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी हो और उससे कम पर खरीद गैर-कानूनी घोषित हो.

यह भी कहा जा रहा है कि गैर कृषि औद्योगिक उत्पादों को कंपनियां स्वयं द्वारा निर्धारित अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) पर बेचती हैं, जो उनकी उत्पादन लागत से कहीं ज्यादा होती है. ऐसे में किसानों को कम से कम अपनी लागत आधारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अपना उत्पाद बेचने की सुविधा होनी चाहिए. चूंकि किसान की सौदेबाजी की क्षमता बहुत कम होती है, उसके लिए सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करना चाहिए.

नये प्रावधानों के अनुसार जब कोई खरीदार अपना पैन कार्ड दिखा कर किसान से खरीद कर सकता है, तो किसानों के उत्पाद का भुगतान भी तुरंत होना चाहिए या सरकार को उसके भुगतान की गारंटी लेनी चाहिए. किसान के पास अपनी उपज की बिक्री के लिए कई विकल्प होने चाहिए. यदि किसी बड़ी कंपनी या कुछ कंपनियों का प्रभुत्व हो जायेगा, तो गरीब किसान की सौदेबाजी की शक्ति समाप्त हो जायेगी. सरकार द्वारा पूर्व में 22 हजार मंडियों की स्थापना की बात कही गयी थी. इसे यथाशीघ्र पूरा किया जाना चाहिए, ताकि किसान के पास अपनी उपज को बेचने के लिए अधिक विकल्प हों.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

विज्ञापन
डॉ अश्विनी

लेखक के बारे में

By डॉ अश्विनी

डॉ अश्विनी is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola