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जानलेवा हो चला वायु प्रदूषण

भारत की सभ्यता प्रदूषण फैलाने की नहीं रही है, बल्कि हम प्राकृति के साथ सामंजस्य बिठा कर चलनेवाले लोग हैं. अगर लोगों को मरने और बीमार होने से रोकना है, तो हमें अधिक सतर्क और जागरूक होना होगा.

By वंदना शिवा
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जानलेवा हो चला वायु प्रदूषण
जानलेवा हो चला वायु प्रदूषण
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देश के कई शहरों में पर्यावरण की समस्या आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ रही है. वायु प्रदूषण से हर साल हमारे देश में हजारों असामयिक मौतें होती हैं और हर आयु वर्ग के लोग प्रदूषण जनित समस्याओं का शिकार हो रहे हैं. सड़कों पर गाड़ियों की बढ़ती संख्या और औद्योगिक प्रदूषण के चलते अनेक शहरों की वायु गुणवत्ता बुरी तरह से प्रभावित हुई है.

प्रदूषकों के अतिसूक्ष्म कणों, हानिकारकों गैसों और रसायनों से आबोहवा में जहर घुल रहा है. इसकी चपेट में आने से लोग कैंसर, अस्थमा, चर्मरोग जैसी अनेक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. खेती में पेस्टिसाइड और जहरीले रसायनों के इस्तेमाल से तैयार होनेवाली उपज स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद है. सामान्य तौर पर होनेवाली मौतों के अलावा जो मौतें हो रही हैं, उसका एक बड़ा कारण मानव निर्मित पर्यावरणीय समस्या ही है.

जैव ईंधनों से होनेवाले प्रदूषण को रोकने के लिए अभी तक ठोस प्रयास नहीं हुए हैं. वहीं देश में बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए आर्थिक गतिविधियां, आवागमन, औद्योगिक उत्पादन का बढ़ना भी स्वाभाविक है, उसके समानांतर प्रदूषण की समस्या भी बढ़ रही है. प्रदूषण के स्रोत और उसके कारकों के बारे में हम सभी को पता है, लेकिन उसका समाधान तभी हो पायेगा, जब हम उसकी गंभीरता को समझते हुए समुचित और सही दिशा में प्रयास करेंगे.

अभी नेपाल में एक कार्यक्रम में मैंने इस विषय पर अपनी बात रखी. धरती का स्वास्थ्य और हमारा स्वास्थ्य एक ही है, अगर एक का स्वास्थ्य खराब होगा, तो उसका असर दूसरे पर भी पड़ेगा. अगर हम धरती के स्वास्थ्य को हानि पहुंचायेंगे, तो वह हानि हमारे स्वास्थ्य पर भी होगी. चाहे बढ़ते पेस्टिसाइड और हानिकारक रसायनों से होनेवाला कैंसर हो या फिर वायु प्रदूषण से होनेवाला अस्थमा. इस ग्रह पर जीवन को बचाने के लिए हमें धरती मां पर आक्रमण रोकना पड़ेगा.

यह गांधी का देश है, जहां जीवन और विचारों में सादगी की बात होती है. हमारे यहां घरों में बने भोजन का चलन रहा है और हथकरघा उद्योगों से हम अपने जरूरी सामानों को तैयार करते रहे हैं. उससे किसी प्रकार का कोई प्रदूषण नहीं होता. लेकिन, हमारे रहन-सहन में आ रहे बदलाव के साथ समस्याएं भी बढ़ रही हैं. फैक्ट्रियों से उत्पादन से वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण होना स्वाभाविक है.

हम खादी वाले लोग हैं, हमने आजादी की लड़ाई में संकल्प लिया था कि हम कपड़ा खुद तैयार करेंगे, मिलों में तैयार कपड़े का इस्तेमाल नहीं करेंगे. हमें सोचना होगा कि जो भी चीजें फैक्ट्रियों से आती हैं, वह प्रदूषण करके आती हैं और जो चीजें हाथों से निर्मित होती हैं, वे प्रदूषण से मुक्त होती हैं. हमारे देश में हैंडलूम, हैंडीक्राफ्ट की संस्कृति को ऊपर रखा गया था.

हमने खाने-पीने की चीजों को कभी बड़ी फैक्ट्रियों में नहीं आने दिया. खाने-पीने के सामान को खुद अपने हाथों से बनाया. हाथों से बने मसालों से अचार बनाओगो, तो उससे प्रदूषण का कोई सवाल ही नहीं उठता. लेकिन जब वह फैक्ट्री में बनेगा, तो उसमें रसायनों का इस्तेमाल होगा. हमने किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित किया है.

लोग मान चुके हैं कि बिना रसायन के गुड़ नहीं बना सकते. हमारा कहना है कि हमारे दादा-नाना कैसे गुड़ बनाया करते थे. उनसे समय में रसायनों का इस्तेमाल नहीं होता था. जहां गुड़ बनता है, वहां मीठी खुशबू आती है. उसमें एक बूंद भी पानी का इस्तेमाल नहीं होता, क्योंकि गन्ने का रस वाष्पित होकर गुड़ बन जाता है. इससे न तो पानी का प्रदूषण होता है और न ही वायु का प्रदूषण. गन्ने को निचोड़ने से बचा अवशेष ईंधन के काम आ जाता है, तो अतिरिक्त ईंधन की भी जरूरत नहीं होती.

लोगों को इससे रोजगार मिलता और खाने के लिए बेहतर चीजें भी. इसी गन्ने से चीनी भी तैयार होती है. चीनी मिल में पहले खूब पानी इस्तेमाल किया जाता है. मिलों के आसपास का पानी दूषित हो जाता है. प्रदूषित पानी भूजल में जहर घोल रहा है. जहां-जहां शुगर मिलें हैं, वहां चिंताजनक प्रदूषण है.

अन्य प्रकार की औद्योगिक गतिविधियों से भी जल और हवा का प्रदूषण बढ़ रहा है. फैक्ट्रियों से बड़े पैमाने पर औद्योगिक कचरा निकलता है, वह पर्यावरण के लिए घातक ही है. फैक्ट्रियों के पास औद्योगिक कचरा आसपास रहनेवालों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है. आप चीनी मिलों के बगल से गुजरें, तो बहुत ज्यादा बदबू आती है. इस तरह से तैयार होनेवाली चीनी स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है. चीनी खाने से तमाम तरह की बीमारियां होती हैं.

हथकरघा से तैयार होनेवाले उत्पाद वायु मंडल को प्रदूषित नहीं करते, बल्कि वह हर प्रकार से फायदेमंद भी हैं. जुलाहों द्वारा कपड़ा तैयार करने के दौरान कोई प्रदूषण नहीं होता, लेकिन वही कपड़ा जब टेक्सटाइल मिल में तैयार होता है, तो उससे प्रदूषण होता है. फैक्ट्रियों से निकलनेवाले कचरे और रसायन से नदियों का जल दूषित हो रहा है.

उससे जलीय जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर खतरा है, तो मानव का जीवन में उसके प्रभाव से नहीं बचा है. कहने का तात्पर्य है कि हमें अपने जीवनयापन के पारंपरिक तौर-तरीकों की तरफ लौटने की जरूरत है. अन्यथा जिस तरह से प्रदूषण बढ़ रहा है, वह पर्यावरणीय समस्याओं को गंभीर बनाता जायेगा और अंतत: इसके प्रभाव से कोई अछूता नहीं रहेगा. भारत की सभ्यता प्रदूषण फैलाने की नहीं रही है, बल्कि हम प्राकृति के साथ सामंजस्य बिठा कर चलनेवाले लोग हैं. अगर लोगों को मरने और बीमार होने से रोकना है, तो हमें अधिक सतर्क और जागरूक होना होगा.(बातचीत पर आधारित).

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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