उदार थे इस्राइल की पहली पीढ़ी के नेता

Updated at : 13 Oct 2023 7:55 AM (IST)
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उदार थे इस्राइल की पहली पीढ़ी के नेता

इस्राइल की स्थापना ने एक ऐसे नये देश की उम्मीद जगायी थी, जो अपने अनुभवों और अपने संस्थापकों के आदर्शों के सहारे दुनिया के सामने कुछ अलग पेश करेगा. इसी आदर्शवाद ने भारत को प्रेरित किया और वह इस्राइल को मान्यता देनेवाले तीन देशों में से एक बना.

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गाजा सीमा के निकट इस्राइल के एक छोटे कस्बे स्डेरोट में एक रेव वार्टी पर हुआ हमला हाल के समय में शायद सबसे स्तब्ध करनेवाली घटना है. जिस बर्बरता और आक्रामक तरीके से पार्टी करते लोगों पर सुबह-सुबह हमला हुआ, उसके बाद इस्राइल ने जिस तरह से गाजा पर बमबारी की है, उसे गलत ठहराना मुश्किल हो जाता है. इस्राइल ने ऐसा जवाब देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह सभी गाजावासियों को हमास मानता है, और ये स्वीकार नहीं कर सकता कि कोई पूरा समाज आतंकवादी गुटों का बंधक हो जाए. भारत में आम तौर पर हम सीमा पार से आतंकवादी हमले करने वाले जिहादी गुटों को पाकिस्तानी बताते हैं. बेशक यह पाकिस्तान की जिम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि उसकी जमीन का इस्तेमाल पड़ोसी मुल्क पर हमले के लिए ना हो. लेकिन, उन जगहों का क्या जहां कोई कारगर सरकार ही नहीं है. लंबे कब्जे और लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने की वजह से इस्राइल के प्रति सभ्य समाज का नजरिया बदल गया है. इस्राइल की छवि धूमिल हुई है.

इस्राइल ने यह छवि अपने लिए एक नया देश बनाकर तैयार की थी, जब दो सहस्राब्दियों तक यहां के लोग अपनी जन्मभूमि से निर्वासित रहे. इसकी शुरुआत छठी सदी में हुई, जब उन्हें बेबीलोन से निर्वासित कर दिया गया. इसके बाद निर्वासनों के कई दौर आये, और दुनियाभर में बाहर बसे यहूदी, तकलीफों और अपमान के बीच, हर साल अपने पवित्र योम किप्पर दिवस पर ‘नेक्स्ट इयर इन जेरुशलम’ गाना नहीं भूले. जर्मनी में हुए होलोकॉस्ट और पूर्वी यूरोप में हुए यहूदी जनसंहारों से बचे लोगों ने नया देश बनाने का संकल्प किया, जो समानता के आदर्श पर टिका होगा, और जो इतना शक्तिशाली होगा कि उनके साथ जो हुआ वो दोबारा नहीं हो सके. पूरी दुनिया ने उनकी सराहना की. हालांकि, भारत में कुछ हिंदू राष्ट्रवादियों ने खुलकर हिटलर की प्रशंसा की थी. बाद में इस्राइल के मुस्लिम अरबों को हराने के बाद हिंदू राष्ट्रवादी इस्राइल की तारीफ करने लगे. लेकिन, इस्राइल की उस छवि को धक्का लगा, जब वह मध्य-पूर्व की एक निर्दयी शक्ति बन गया.

उसकी यह निर्दयता हाल के समय में कई बार गाजा में प्रकट हुई है. गाजा पट्टी केवल 41 किलोमीटर लंबा क्षेत्र है, और उसकी चौड़ाई छह से 12 किलोमीटर है, और इसका पूरा क्षेत्र 365 वर्ग किलोमीटर है. वैसे तो यह एक स्वशासित क्षेत्र है, लेकिन इसे एक वर्चुअल जेल भी कहा जाता है, जहां 22 लाख बंदी रहते हैं. इस्राइल के बनाये गये बफर जोन क्षेत्र को भी यदि इसमें शामिल किया जाए, तो यह दुनिया का सबसे गहन आबादी वाला इलाका है. गाजा को इस्राइल की आर्थिक घेराबंदी भी झेलनी पड़ रही है, जिसे अमेरिका का समर्थन है. यह विडंबना ही लगती है कि ये घेराबंदी उन लोगों ने की है, जिन्होंने खुद यूरोप में लंबे समय तक जेल जैसे हालात में जिंदगी बितायी थी. इस्राइल की स्थापना ने एक ऐसे नये देश की उम्मीद जगायी थी, जो अपने अनुभवों और अपने संस्थापकों के आदर्शों के सहारे दुनिया के सामने कुछ अलग पेश करेगा. इसी आदर्शवाद ने भारत को प्रेरित किया और वह इस्राइल को मान्यता देनेवाले तीन देशों में से एक बना. इस्राइल की पहली पीढ़ी के नेता यूरोपीय पूर्वजों से आये थे, जो सामान्यतः उदार और प्रगतिशील थे. इस्राइल के आरंभिक दौर में यह भावना दिखी जब वहां ज्यादातर खेती सहकारिता से होती थी और उनकी जीवनशैली भी सामुदायिक थी. वहां के श्रमिक संगठन हिस्टाद्रुत ने, इस्राइल के संस्थापक डेविड बेन की अगुआई में लेबर पार्टी के राजनीतिक आंदोलन की बुनियाद रखी, और वह इस्राइल में सबसे ज्यादा रोजगार भी देता है. देश के परिवहन, डेयरी, कंस्ट्रक्शन और सेवा क्षेत्र के ज्यादातर हिस्से का स्वामित्व इसी संगठन के हाथ में है.

माना जा रहा था कि इस्राइल एक प्रगतिशील, समाजवादी और लोकतांत्रिक देश होगा. अपने आरंभिक वर्षों में इस्राइल ने बड़ी बहादुरी से मुश्किलों का सामना किया और लियॉन उरिस जैसे बहुत से लेखकों ने इस्राइली लोगों के इस नये जज्बे को दर्ज किया. उनकी 1957 में आयी 600 पन्नों की मास्टरपीस कृति ‘एक्सोडस’ ने तहलका मचा दिया था और उन्हें खूब शोहरत मिली. इसमें पिछली शताब्दी की शुरुआत से लेकर 1948 में इस्राइल के गठन तक के दौर में यूरोप में यहूदियों की बहादुरी को दर्ज किया गया है. एक्सोडस एक देश की कहानी होने के साथ-साथ अरी बेन कनान की मर्मस्पर्शी प्रेम कहानी भी थी, जो एक इस्राइली स्वतंत्रता सेनानी थे और जिन्हें अमेरिकी नर्स किटी फ्रीमोंट से प्यार हो जाता है, जो एक यहूदी देश के लिए उनके संघर्ष में शामिल होती हैं. एक्सोडस पर 1958 में एक फिल्म भी बनी थी. ऑटो प्रीमिंगर की इस फिल्म में पॉल न्यूमैन ने अरी बेन कनान की भूमिका निभायी थी. इस किताब और फिल्म ने इस्राइली लोगों के जुझारू और अपराजेय होने को मिथक की तरह स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभायी.

इस्राइली सेना की बहादुरी वाली वह चमक अब उसके अत्याधुनिक हथियारों से सज्जित एक ताकतवर सेना बनने, और अमेरिका के लगातार समर्थन के साथ धीरे-धीरे धुंधली पड़ गयी है. अब वह मामूली सामर्थ्य के साथ ताकतवर शत्रु पर विजय पाने वाला देश नहीं रहा. अब तक लड़ी गयी चारों बड़ी लड़ाइयों में उसने बड़ी आसानी से संख्या बल में कहीं बड़ी अरब की सेनाओं को बड़े आराम से मात दी है. ऐसे प्रतिद्वंदियों के सामने लंबे समय तक हीरो बने रहना मुश्किल है. अब फिलिस्तीनियों का संघर्ष ऐसे लोगों का संघर्ष बन गया है जो अपनी पहचान, अपनी आजादी और अपनी बहुत पुरानी जमीन का एक हिस्सा हासिल करना चाहते हैं, जिसे वे अपना कह सकें. ठीक उसी तरह, जिस तरह यहूदियों ने 1948 के पहले इस्राइल के लिए संघर्ष किया था. लेकिन, इस्राइल के लगातार जारी कब्जे और 1967 के बाद वेस्ट बैंक के हिस्से पर रोजाना दखल किये जाने, और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की अवहेलना कर दुनिया को मुंह चिढ़ाते हुए, वहां लगातार बस्तियां बसाते जाना एक संकीर्ण मानसिकता का विद्रूप चेहरा और अहंकारपूर्ण बर्ताव है. इस्राइल अब पहले जैसा पराक्रमी और दुख झेलनेवाला योद्धा नहीं रहा, अब वह लगातार एक ऐसा अहंकारी देश बन चुका है जो एक अन्य पुराने देश को पैरों तले कुचलना चाहता है. इस्राइल के बारे में अब यह एक दुखद सच्चाई है कि बेंजामिन नेतन्याहू सच बन चुके हैं और अरी बेन कनान एक गाथा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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मोहन गुरुस्वामी

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By मोहन गुरुस्वामी

मोहन गुरुस्वामी is a contributor at Prabhat Khabar.

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