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Independence Day 2025 : आजादी के आंदोलन को याद करने का दिन

Updated at : 15 Aug 2025 6:11 AM (IST)
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Independence day celebration

स्वतंत्रता दिवस

Independence Day 2025 : स्वतंत्र भारत की मांग करने वाले प्रथम व्यक्ति बालगंगाधर तिलक थे. उन्होंने कहा था कि 'स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.' तिलक ने अंग्रेजों से आजादी को पहला लक्ष्य बताया. उनका मानना था कि सामाजिक कुप्रथाओं से मुक्ति पाने के अभियान को आजादी मिलने तक टाला जा सकता है.

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-सुब्रत मुखर्जी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय-

Independence Day 2025 : स्वतंत्रता दिवस का यह ऐतिहासिक दिन स्वतंत्रता संग्राम को और उसमें भाग लेने वाले हमारे सेनानियों को याद करने का अवसर है. उन्नीसवीं सदी में भारत का राजनीतिक विमर्श सामाजिक मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित था, जिसे राममोहन राय ने सबसे प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया. भारत के सामाजिक पिछड़ेपन को देखते हुए उनका विचार था कि पृथ्वी की सबसे उन्नत सभ्यता से भिड़ंत भारत के लिए अच्छी होगी, क्योंकि इससे देश में वैज्ञानिक नजरिया, सहिष्णुता और कानून के राज की सोच विकसित होगी. बंकिम चंद्र चटर्जी का ‘आनंदमठ’ (1882) भारत में ब्रिटिश राज के विरोध में लिखा गया था.


इंडियन एसोसिएशन (1876) के गठन के बाद ब्रिटिश राज के खिलाफ भारतीयों के राजनीतिक विचार व्यक्त होने लगे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) की स्थापना के बाद इस विमर्श को और गति मिली. स्वतंत्र भारत की मांग करने वाले प्रथम व्यक्ति बालगंगाधर तिलक थे. उन्होंने कहा था कि ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.’ तिलक ने अंग्रेजों से आजादी को पहला लक्ष्य बताया. उनका मानना था कि सामाजिक कुप्रथाओं से मुक्ति पाने के अभियान को आजादी मिलने तक टाला जा सकता है. वह भारतीय समाज के अंतर्विरोधों और कमियों को जानते थे. ऐसे में, उनका मानना था कि अगर सामाजिक कुप्रथाओं को मिटाने पर जोर दिया गया, तो देश को स्वतंत्रता मिलने में काफी देर हो जायेगी.


जहां तक कांग्रेस की बात है, तो उसका नेतृत्व 1927 तक ब्रिटिशों से पूर्ण स्वतंत्रता की बजाय डोमिनियन स्टेट के दर्जे की मांग कर रहा था. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका का दर्जा तब डोमिनियन स्टेट का ही था. डॉ. भीमराव आंबेडकर भी इस मांग से सहमत थे, क्योंकि उसमें वंचित वर्गों की सुरक्षा का भरोसा था. लेकिन 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने डोमिनियन स्टेट के दर्जे पर कांग्रेस की सर्वसम्मति पर न सिर्फ सवाल उठाया, बल्कि स्वतंत्रता के साथ-साथ ब्रिटिशों से संबंध विच्छेद कर लेने की भी मांग की. डोमिनियन स्टेट दरअसल एक शाही प्रणाली थी, जिसमें संभ्रांत वर्गों का समाज के दूसरे समुदायों पर वर्चस्व होता था. जवाहरलाल नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस के विचारों से सहमति जतायी. लेकिन महात्मा गांधी अब भी डोमिनियन स्टेट के पक्ष में थे. उनका तर्क था कि डोमिनियन स्टेट और स्वतंत्रता के बीच तुलना कर या डोमिनियन स्टेट के बजाय ब्रिटिशों से स्वतंत्रता की मांग कर हम भीषण गलती करेंगे.


अपनी प्रखर बौद्धिकता से गांधी यह देख पा रहे थे कि कांग्रेस की युवा पीढ़ी में वाम विचारों के प्रति समर्थन बढ़ रहा है. दरअसल महाराष्ट्र के कपड़ा श्रमिकों के कारण पार्टी में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव दिख रहा था. उन्होंने यह भी पाया कि पार्टी में भगत सिंह के हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के विचारों से प्रभावित होने वाले लोग भी थे. इस कारण उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को अगले अध्यक्ष के रूप में नामित किया, ताकि कांग्रेस नये विचारों को आत्मसात कर सके और पार्टी में एकजुटता बनी रहे. वह आश्वस्त थे कि कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालते ही नेहरू युवाओं को जोड़ेंगे और उन्हें अपनी जिम्मेदारी के प्रति प्रेरित-प्रोत्साहित करेंगे.


जब देश में साइमन कमीशन आया, तब कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के अलावा उदारवादियों ने उसका बहिष्कार किया, क्योंकि न तो उसमें कोई भारतीय प्रतिनिधि शामिल था और न ही उसने भारत को डोमिनियन स्टेट का दर्जा देने की बात कही. पर 1928 की नेहरू रिपोर्ट में भारत की आजादी के बजाय आश्चर्यजनक रूप से डोमिनियन स्टेट के दर्जे की मांग थी. महात्मा गांधी की रणनीति कारगर साबित हुई थी. लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिये जाने के खिलाफ एकाएक पूरे देश में शोक और गुस्से की लहर दौड़ पड़ी. नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में (31 दिसंबर, 1929-एक जनवरी, 1930) पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया और गांधी ने इसे अनुमोदित किया. इस प्रस्ताव में भारत में ब्रिटिश शासन के दुष्प्रभावों को रेखांकित किया गया था. पूरे देश में तिरंगा लहराये और देशभक्ति के गीत गाये जाने लगे. देशवासियों ने आजादी के लिए मिलकर काम करने का प्रण लिया. उसी वर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, जो बेहद सफल रहा. लेकिन उस आयोजन से मुस्लिमों और ईसाइयों की दूरी बताती थी कि अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति काम कर रही थी. महात्मा गांधी ने उसी साल नमक सत्याग्रह शुरू किया. मार्च 1939 में जब सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब उन्होंने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर कहा कि पूर्ण स्वराज पर जोर देने का समय आ गया है. नेताजी सुभाष को लगा था कि वैश्विक संकटों के कारण ब्रिटिशों पर आजादी के लिए दबाव बनाने का यही उचित समय है. लेकिन गांधी ने उनके सुझाव को खारिज कर दिया. उनका मानना था कि अभी ब्रिटिशों के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू करने का वक्त नहीं आया है.


वर्ष 1940 की गर्मियों में लिनलिथगो ने घोषणा की कि दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद भारत को डोमिनियन स्टेट का दर्जा दिया जायेगा. पर गांधी जी ने उसे खारिज करते हुए कहा कि बहुत देर हो चुकी है, और अब पूर्ण स्वराज से कम कुछ भी मंजूर नहीं है. फिर 1942 में गांधी जी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन शुरू हुआ, जो अंतत: भारत की आजादी के रूप में सामने आया. गौर करने की बात यह है कि 1929 में पूर्ण स्वराज की जो मांग की गयी थी, वह बाद के वर्षों में कभी मंद नहीं पड़ी. भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ, लेकिन 26 जनवरी के ऐतिहासिक दिन को याद रखने के लिए भारतीय संविधान को 1950 में उसी दिन लागू किया गया, और वह दिन गणतंत्र दिवस के रूप में याद किया जाने लगा.


ग्रैनविल ऑस्टिन के मुताबिक, भारतीय संविधान की तीन खास विशेषताएं हैं-एकता का विचार, विभाजन के बीच जो सबसे अधिक चिंता का विषय था, मुख्यधारा के राष्ट्रीय आंदोलन को साकार करने के लिए सामाजिक क्रांति, और एक अनिश्चित भूगोल में लोकतंत्र को सुरक्षित रखना. आजादी के बाद से अभी तक दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र ने वैज्ञानिक अनुसंधान, अस्पृश्यता निवारण और गरीबी उन्मूलन के क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धि हासिल की है तथा विविध क्षेत्रों में सुधार की प्रक्रिया अब भी निरंतर जारी है. भारत को विकसित राष्ट्र बनाने, लोकतंत्र के आधार को और व्यापक करने तथा स्वतंत्रता को सभी भारतीयों के लिए वास्तविक तथा अर्थपूर्ण बनाने की दिशा में कदम उठाये जा रहे हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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